POSH Act पर बॉम्बे हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: कंपनी अपनी ‘खुद की अपीलीय अथॉरिटी’ नहीं बना सकती, बैंक की पूरी कार्रवाई रद्द

POSH Act पर बॉम्बे हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: कंपनी अपनी ‘खुद की अपीलीय अथॉरिटी’ नहीं बना सकती, बैंक की पूरी कार्रवाई रद्द

कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न (POSH Act) से जुड़े मामलों में बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक अहम फैसला सुनाते हुए स्पष्ट कर दिया है कि कोई भी नियोक्ता (Employer) अपनी ओर से अलग अपीलीय अथॉरिटी बनाकर अपील की सुनवाई नहीं करा सकता। अदालत ने कहा कि POSH Act की धारा 18 और नियम 11 को साथ पढ़ने पर ऐसा कोई अधिकार नियोक्ता को नहीं मिलता। यदि कोई संस्था ऐसा करती है तो वह कानून की मूल भावना के खिलाफ होगा।

यह फैसला यूनियन बैंक ऑफ इंडिया के एक कर्मचारी अशोक उपाध्याय की याचिका पर आया, जिन्होंने POSH Act के तहत उनके खिलाफ हुई कार्रवाई और बाद में लगाए गए जुर्माने को चुनौती दी थी। हाईकोर्ट ने पाया कि बैंक द्वारा गठित आंतरिक अपीलीय अथॉरिटी कानून के अनुरूप नहीं थी और इसी आधार पर पूरी प्रक्रिया को अवैध करार देते हुए विवादित आदेशों को रद्द कर दिया।

क्या था पूरा मामला?

मामले की शुरुआत कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न की शिकायत से हुई थी। यूनियन बैंक की आंतरिक शिकायत समिति (Internal Complaints Committee) ने शुरुआती जांच के बाद अशोक उपाध्याय को दोषमुक्त माना था।

इसके बाद शिकायतकर्ता ने एक अपील दाखिल की। याचिकाकर्ता का आरोप था कि बैंक की आंतरिक अपीलीय अथॉरिटी ने उन्हें बिना नोटिस दिए और बिना सुनवाई का अवसर दिए मामले की दोबारा जांच का आदेश दे दिया।

दूसरी जांच समिति ने इस बार उन्हें दोषी ठहराया और उनके खिलाफ जुर्माना लगा दिया। इसी कार्रवाई को उन्होंने बॉम्बे हाईकोर्ट में चुनौती दी।

कोर्ट ने कानून की व्याख्या कैसे की?

जस्टिस जी. एस. कुलकर्णी और जस्टिस डॉ. नीला गोखले की खंडपीठ ने POSH Act की धारा 18 और POSH नियमों के नियम 11 का विस्तार से विश्लेषण किया।

अदालत ने कहा कि धारा 18 स्पष्ट रूप से बताती है कि अपील लागू सेवा नियमों के अनुसार सक्षम कोर्ट या ट्रिब्यूनल के समक्ष की जाएगी। वहीं जहां ऐसे सेवा नियम लागू नहीं हैं, वहां नियम 11 के तहत निर्धारित अपीलीय व्यवस्था अपनाई जाएगी।

कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा कि इन प्रावधानों में कहीं भी नियोक्ता को अपनी पसंद से अपीलीय अथॉरिटी गठित करने का अधिकार नहीं दिया गया है। यदि ऐसा अधिकार मान लिया जाए तो यह कानून में ऐसी व्यवस्था जोड़ने जैसा होगा जिसे विधायिका ने जानबूझकर शामिल नहीं किया।

बैंक की पूरी प्रक्रिया को बताया गैरकानूनी

सुनवाई के दौरान बैंक यह नहीं बता सका कि किस कानूनी प्रावधान के तहत उसे अपनी आंतरिक अपीलीय अथॉरिटी बनाने का अधिकार मिला था।

हाईकोर्ट ने कहा कि जिस अपीलीय अथॉरिटी ने दोबारा जांच का आदेश दिया, उसके पास शुरू से ही अधिकार-क्षेत्र नहीं था। इसलिए उसके आधार पर हुई पूरी कार्रवाई कानूनी रूप से टिक नहीं सकती।

अदालत ने माना कि इस गलत प्रक्रिया से केवल याचिकाकर्ता ही नहीं, बल्कि शिकायतकर्ता को भी नुकसान हुआ क्योंकि पूरे मामले को ऐसे मंच पर सुना गया जिसे कानून मान्यता नहीं देता।

सार्वजनिक संस्थानों को भी दी सख्त चेतावनी

फैसले में बॉम्बे हाईकोर्ट ने सार्वजनिक संस्थानों को भी महत्वपूर्ण संदेश दिया। अदालत ने कहा कि सरकारी बैंक और अन्य सार्वजनिक संस्थानों को कानून की व्याख्या करते समय अतिरिक्त सावधानी बरतनी चाहिए।

कोर्ट के अनुसार, यदि संस्थाएं अपनी सुविधा के अनुसार कानूनी प्रावधानों की गलत व्याख्या करेंगी तो इससे व्यवस्था में अव्यवस्था पैदा हो सकती है और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित होगी।

इसी आधार पर अदालत ने यूनियन बैंक द्वारा गठित आंतरिक अपीलीय अथॉरिटी की कार्रवाई को अवैध ठहराते हुए उसके आदेश और उसके बाद लगाए गए जुर्माने को रद्द कर दिया।

यह फैसला POSH Act के तहत अपील की प्रक्रिया को लेकर महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न के मामलों में कानून द्वारा तय अपीलीय व्यवस्था का पालन करना अनिवार्य है और नियोक्ता अपनी अलग अपील प्रणाली नहीं बना सकते।