सरकारी कर्मचारी को मिलने वाली LTC या CGHS जैसी सुविधाओं पर सरकारी पैसा खर्च होता है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि कर्मचारी और उसके परिवार से जुड़ी हर जानकारी RTI के जरिए सार्वजनिक की जा सकती है। दिल्ली हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में साफ किया है कि सरकारी फंड का इस्तेमाल अपने आप किसी व्यक्ति की निजी जानकारी को सार्वजनिक करने का आधार नहीं बन जाता। कोर्ट ने कहा कि अगर मांगी गई सूचना किसी कर्मचारी या उसके परिवार के निजी मामलों से जुड़ी है और उसे सार्वजनिक करने के पीछे कोई ठोस बड़ा जनहित नहीं दिखाया गया है, तो RTI कानून के तहत ऐसी जानकारी देने से इनकार किया जा सकता है।
RTI में मांगी गई थी परिवार की यात्रा और मेडिकल जानकारी
यह मामला नागरिक उड्डयन महानिदेशालय यानी DGCA के एक कर्मचारी से जुड़ा है। याचिकाकर्ता ने कर्मचारी की LTC से संबंधित कई तरह की जानकारियां मांगी थीं।
इनमें कर्मचारी के आश्रित परिवार के सदस्यों के लिए बुक किए गए टिकट, LTC सेटलमेंट फॉर्म, परिवार के सदस्यों द्वारा ली गई CGHS मेडिकल सुविधाओं का विवरण, मेडिकल बिल, परिवार घोषणा फॉर्म और आश्रितों के साथ की गई LTC यात्राओं से जुड़ी जानकारी शामिल थी।
DGCA के केंद्रीय जन सूचना अधिकारी यानी CPIO ने RTI एक्ट की धारा 8(1)(j) का हवाला देते हुए जानकारी देने से इनकार कर दिया। इस प्रावधान के तहत ऐसी निजी जानकारी को सार्वजनिक करने से छूट मिल सकती है, जिसका किसी सार्वजनिक गतिविधि या हित से सीधा संबंध न हो या जिसके खुलासे से निजता का अनावश्यक उल्लंघन होता हो।
पहली अपीलीय अथॉरिटी ने भी CPIO के फैसले को बरकरार रखा। इसके बाद मामला केंद्रीय सूचना आयोग यानी CIC पहुंचा। CIC ने भी दूसरी अपील खारिज कर दी और जानकारी को तीसरे पक्ष की निजी सूचना मानते हुए कहा कि इसके खुलासे के लिए कोई बड़ा जनहित स्थापित नहीं किया गया है।
‘सरकारी पैसा लगा है’ वाली दलील क्यों नहीं चली?
हाईकोर्ट में याचिकाकर्ता की ओर से तर्क दिया गया कि LTC और CGHS जैसी सुविधाओं में सरकारी धन खर्च होता है। इसलिए इससे संबंधित जानकारी सार्वजनिक हित में सामने आनी चाहिए।
लेकिन कोर्ट ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया।
जस्टिस अमित महाजन ने स्पष्ट किया कि RTI कोई असीमित अधिकार नहीं है। कानून में कुछ ऐसी सूचनाओं को भी सुरक्षा दी गई है, जो व्यक्ति की निजता से संबंधित हैं। खास तौर पर तब, जब उनका किसी सार्वजनिक गतिविधि या व्यापक सार्वजनिक हित से सीधा संबंध न हो।
कोर्ट ने इस मामले में एक महत्वपूर्ण अंतर पर जोर दिया। अगर याचिकाकर्ता सिर्फ यह जानना चाहता कि DGCA ने LTC या मेडिकल रीइम्बर्समेंट पर कुल कितना सरकारी पैसा खर्च किया, तो सवाल अलग हो सकता था।
लेकिन यहां मांगी गई जानकारी इससे कहीं आगे जाती थी। इसमें परिवार के पहचाने जा सकने वाले सदस्यों की यात्रा, उनके मेडिकल इलाज, मेडिकल खर्च और कर्मचारी द्वारा अपने आश्रितों के बारे में दी गई घोषणाओं जैसी निजी जानकारियां शामिल थीं।
हाईकोर्ट ने परिवार की निजता को क्यों माना अहम?
कोर्ट ने कहा कि इस तरह की जानकारी अपने स्वभाव से ही कर्मचारी के निजी मामलों से जुड़ी है। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि इसमें कर्मचारी के परिवार के ऐसे सदस्य भी शामिल हैं, जो खुद इस विवाद के पक्षकार नहीं हैं और तीसरे पक्ष के तौर पर उनकी निजता प्रभावित हो सकती है।
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि सिर्फ सरकारी पैसे के इस्तेमाल का हवाला देकर ऐसी निजी जानकारी सार्वजनिक नहीं की जा सकती। इसके लिए यह दिखाना जरूरी होगा कि सूचना के खुलासे के पीछे ऐसा बड़ा जनहित मौजूद है, जो निजता की सुरक्षा से ऊपर हो।
यानी सरकारी खर्च में पारदर्शिता और किसी व्यक्ति की निजी जिंदगी की जानकारी सार्वजनिक करना एक ही बात नहीं है। RTI कानून दोनों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश करता है।
वैवाहिक विवाद के बीच RTI के इस्तेमाल पर भी कोर्ट की सख्ती
मामले की सुनवाई के दौरान अधिकारियों की ओर से एक और महत्वपूर्ण तथ्य सामने रखा गया। बताया गया कि याचिकाकर्ता की शादी संबंधित DGCA कर्मचारी की बहन से हुई थी और दोनों पक्षों के बीच वैवाहिक विवाद चल रहा था। इसी विवाद के कारण तलाक की कार्यवाही भी शुरू हो चुकी थी।
याचिकाकर्ता ने यह भी कहा था कि जानकारी का इस्तेमाल विजिलेंस शिकायतों पर आगे बढ़ने के लिए किया जाना है। लेकिन हाईकोर्ट ने माना कि यह दावा अपने आप RTI के तहत ऐसी जानकारी हासिल करने का स्वतंत्र अधिकार पैदा नहीं करता, जो कानून के तहत गोपनीयता की छूट में आती है।
कोर्ट ने साफ किया कि RTI व्यवस्था को निजी हिसाब-किताब बराबर करने या व्यक्तिगत और वैवाहिक विवादों को आगे बढ़ाने का माध्यम नहीं बनाया जा सकता। खासकर तब, जब मांगी गई जानकारी किसी तीसरे पक्ष के निजी जीवन से जुड़ी हो।
इसी आधार पर दिल्ली हाईकोर्ट ने याचिका खारिज कर दी और कर्मचारी से जुड़ी निजी जानकारी का खुलासा नहीं करने के CPIO और CIC के फैसले को सही ठहराया।
Case Title: SACHIN KUMAR DAKSH v. DIRECTOR-ADMIN AND FINANCE & ANR


