परिसीमन विधेयक पर NDA का बड़ा दांव! क्या मॉनसून सत्र में बदल जाएगा देश का चुनावी नक्शा?

परिसीमन विधेयक पर NDA का बड़ा दांव! क्या मॉनसून सत्र में बदल जाएगा देश का चुनावी नक्शा?

देश की राजनीति में इन दिनों एक बड़ा सवाल तेजी से चर्चा में है—क्या केंद्र सरकार आगामी मॉनसून सत्र में परिसीमन विधेयक और उससे जुड़े संविधान संशोधन को संसद से पारित कराने में सफल हो जाएगी? विपक्षी दलों में जारी उठापटक और संभावित टूट के बीच सत्ता पक्ष का आत्मविश्वास पहले से कहीं ज्यादा बढ़ा हुआ नजर आ रहा है। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि सरकार अब उन संवैधानिक बदलावों को आगे बढ़ाने की तैयारी में है, जिनका असर आने वाले वर्षों में देश की चुनावी राजनीति पर गहरा पड़ सकता है।

सूत्रों के मुताबिक, एनडीए नेतृत्व को भरोसा है कि संसद के आगामी सत्र तक वह संविधान संशोधन के लिए जरूरी दो-तिहाई समर्थन जुटाने की स्थिति में पहुंच सकता है। यही वजह है कि परिसीमन और महिला आरक्षण जैसे मुद्दे एक बार फिर राष्ट्रीय बहस के केंद्र में आ गए हैं।

महिला आरक्षण और परिसीमन क्यों बने सरकार की प्राथमिकता?

केंद्र सरकार जिन बड़े सुधारों पर काम कर रही है, उनमें महिला आरक्षण और परिसीमन सबसे अहम माने जा रहे हैं। प्रस्तावित व्यवस्था के तहत लोकसभा और विधानसभा सीटों के नए परिसीमन के साथ महिला आरक्षण को लागू करने का रोडमैप तैयार किया जा सकता है।

सरकार का तर्क है कि 1971 की जनगणना के बाद देश की आबादी में भारी वृद्धि हुई है, लेकिन लोकसभा सीटों की संख्या उसी अनुपात में नहीं बढ़ी। ऐसे में प्रतिनिधित्व के संतुलन को बनाए रखने के लिए परिसीमन को जरूरी कदम बताया जा रहा है।

दूसरी ओर विपक्षी दलों का मानना है कि सीटों की नई संरचना भविष्य में राजनीतिक समीकरणों को बदल सकती है। इसी वजह से यह मुद्दा केवल प्रशासनिक नहीं बल्कि राजनीतिक रूप से भी बेहद संवेदनशील माना जा रहा है।

दो-तिहाई बहुमत का गणित कितना मजबूत?

लोकसभा की प्रभावी संख्या 540 मानी जाए तो किसी संविधान संशोधन को पारित कराने के लिए लगभग 360 वोटों की जरूरत होगी। एनडीए के पास फिलहाल 293 सांसदों का समर्थन बताया जा रहा है।

राजनीतिक चर्चाओं में तृणमूल कांग्रेस और शिवसेना (यूबीटी) के कुछ सांसदों के संभावित अलग होने की अटकलें लगाई जा रही हैं। अगर ऐसा होता है तो एनडीए का आंकड़ा और मजबूत हो सकता है। हालांकि उपलब्ध आंकड़ों के आधार पर भी सरकार अभी दो-तिहाई बहुमत के लक्ष्य से कुछ दूरी पर दिखाई देती है।

इसी बीच सत्ता पक्ष के कुछ नेताओं का दावा है कि आने वाले हफ्तों में कई विपक्षी दलों के भीतर और बड़े राजनीतिक बदलाव देखने को मिल सकते हैं। हालांकि इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।

‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ भी एजेंडे में

परिसीमन के साथ-साथ भाजपा लंबे समय से ‘एक देश, एक चुनाव’ की अवधारणा को आगे बढ़ाने की पक्षधर रही है। पार्टी का मानना है कि लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ होने से प्रशासनिक खर्च कम होगा और चुनावी प्रक्रिया अधिक व्यवस्थित बनेगी।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि सरकार आवश्यक संख्या बल जुटाने में सफल होती है, तो आने वाले वर्षों में भारतीय चुनावी व्यवस्था में बड़े बदलाव देखने को मिल सकते हैं।

विपक्ष की चिंता और सरकार का जवाब

विपक्षी दलों का कहना है कि परिसीमन की प्रक्रिया का इस्तेमाल राजनीतिक लाभ के लिए किया जा सकता है। कुछ नेताओं ने आशंका जताई है कि निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं में बदलाव से कई राज्यों और दलों के राजनीतिक समीकरण प्रभावित हो सकते हैं।

वहीं सरकार लगातार यह कह रही है कि यह प्रक्रिया संविधान के दायरे में और जनसंख्या आधारित प्रतिनिधित्व को बेहतर बनाने के उद्देश्य से की जाएगी। सरकार का दावा है कि बढ़ती आबादी और बदलते सामाजिक-आर्थिक परिदृश्य को देखते हुए यह सुधार अब टाला नहीं जा सकता।

फिलहाल सबकी नजरें संसद के मॉनसून सत्र पर टिकी हैं। वहीं यह भी ध्यान रखने वाली बात है कि सरकार के समर्थन जुटाने को लेकर जो दावे किए जा रहे हैं, वे फिलहाल राजनीतिक सूत्रों और मीडिया रिपोर्टों पर आधारित हैं। अंतिम तस्वीर संसद में संख्या बल और मतदान के दौरान ही साफ होगी।