देश की सड़कों पर पैदल चलने वालों के अधिकार को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। शीर्ष अदालत ने साफ कहा है कि फुटपाथ पर सुरक्षित तरीके से चलना हर नागरिक का मौलिक अधिकार है और यह अधिकार मोटर वाहनों की सुविधा या विशेषाधिकार से कहीं ऊपर है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि किसी व्यक्ति को सुरक्षित फुटपाथ न मिलने के कारण नुकसान होता है, तो वह संवैधानिक कानूनी उपायों और मुआवजे का दावा कर सकता है।
यह फैसला ऐसे समय आया है जब देश के अधिकांश शहरों में फुटपाथ या तो अतिक्रमण की चपेट में हैं या फिर उनकी हालत इतनी खराब है कि पैदल चलना भी जोखिम भरा बन जाता है। सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी को शहरी विकास और सड़क सुरक्षा के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
पांच साल के बच्चे की मौत से जुड़ा था मामला
यह मामला एक दर्दनाक सड़क हादसे से जुड़ा था। एक पांच वर्षीय बच्चा अपने पिता के साथ स्कूल जा रहा था, तभी एक ट्रक की चपेट में आने से उसकी मौत हो गई। मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने सिर्फ दुर्घटना तक खुद को सीमित नहीं रखा, बल्कि पैदल यात्रियों की सुरक्षा और उनके अधिकारों पर भी विस्तार से विचार किया।
फैसला लिखने वाले जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा ने कहा कि सड़क बनने का मतलब केवल वाहनों के लिए रास्ता तैयार करना नहीं है। सड़क के साथ पैदल चलने वालों के लिए सुरक्षित और स्पष्ट रूप से चिह्नित फुटपाथ होना भी उतना ही जरूरी है।
‘फुटपाथ कोई सुविधा नहीं, अधिकार है’
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि चौड़े, सुरक्षित और व्यवस्थित फुटपाथ पर बिना डर और बाधा के चलना जीवन से जुड़े सबसे बुनियादी अधिकारों में शामिल है। अदालत ने इसे संविधान के अनुच्छेद 19(1)(d) के तहत मिलने वाली आवागमन की स्वतंत्रता से जोड़ा।
कोर्ट ने कहा कि यदि कोई सड़क मौजूद है, तो संबंधित स्थानीय निकाय और प्रशासन की जिम्मेदारी है कि वहां पैदल यात्रियों के लिए उचित फुटपाथ उपलब्ध कराए जाएं और उनका रखरखाव भी किया जाए। यह केवल प्रशासनिक जिम्मेदारी नहीं, बल्कि लागू करने योग्य कानूनी दायित्व है।
मोटर वाहनों से ऊपर पैदल यात्रियों का अधिकार
फैसले की सबसे अहम बात यह रही कि अदालत ने पैदल यात्रियों के अधिकार को मोटर वाहनों की प्राथमिकता से ऊपर रखा। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि शहरों और सड़कों की योजना बनाते समय वाहनों की सुविधा के साथ-साथ पैदल चलने वालों की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
अदालत ने टिप्पणी की कि मोटर वाहन अधिनियम, 1988 में भी पैदल यात्रियों के अधिकारों को पर्याप्त महत्व नहीं दिया गया। जबकि किसी भी आधुनिक और नागरिक-अनुकूल शहर की पहचान सुरक्षित फुटपाथ और पैदल यात्री सुविधाओं से होती है।
नगर निकायों और सरकारों के लिए बड़ा संदेश
सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी केवल एक मामले तक सीमित नहीं है। इसे देशभर के नगर निगमों, विकास प्राधिकरणों और राज्य सरकारों के लिए एक स्पष्ट संदेश माना जा रहा है कि सड़क निर्माण के साथ पैदल यात्रियों की सुरक्षा सुनिश्चित करना भी अनिवार्य है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला भविष्य में सड़क सुरक्षा, शहरी नियोजन और नागरिक अधिकारों से जुड़े मामलों में एक महत्वपूर्ण कानूनी आधार बनेगा। साथ ही, इससे शहरों में फुटपाथों के निर्माण और रखरखाव को लेकर जवाबदेही भी बढ़ेगी।


