उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले सियासी उठापटक तेज हो गई है। बीजेपी के पूर्व सांसद धर्मेंद्र कश्यप ने पार्टी से इस्तीफा देकर समाजवादी पार्टी का दामन थाम लिया है। लखनऊ में सपा प्रमुख अखिलेश यादव से मुलाकात के बाद उन्होंने पार्टी की सदस्यता ग्रहण की। बीजेपी छोड़ने के साथ ही कश्यप ने संगठन से लेकर सरकार तक पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उन्होंने पार्टी में तानाशाही, गुटबाजी और कमीशनखोरी का दावा करते हुए पुराने कार्यकर्ताओं की अनदेखी का मुद्दा भी उठाया। राज्यसभा उम्मीदवारों की सूची में नाम नहीं आने के बाद उनकी नाराजगी सामने आई थी। इस घटनाक्रम के बीच सपा के तीन बागी विधायक भी बीजेपी में शामिल होने जा रहे हैं। ऐसे में यूपी में चुनाव से पहले दल-बदल की राजनीति ने नया मोड़ ले लिया है।
राज्यसभा की सूची से नाराजगी, फिर अखिलेश यादव से मुलाकात
धर्मेंद्र कश्यप की नाराजगी राज्यसभा उम्मीदवारों की सूची सामने आने के बाद खुलकर सामने आई। बताया जा रहा है कि सूची में नाम नहीं आने से वह पार्टी नेतृत्व से असंतुष्ट थे। उन्होंने सोशल मीडिया पर ‘टाटा-बाय-बाय’ लिखकर भी अपनी नाराजगी जाहिर की थी।
इसके बाद उन्होंने बीजेपी की प्राथमिक और सक्रिय सदस्यता से इस्तीफा दे दिया। बाद में लखनऊ में अखिलेश यादव से मुलाकात कर समाजवादी पार्टी की सदस्यता ग्रहण कर ली।
कश्यप ने अपने इस्तीफे में पार्टी के कामकाज पर कई सवाल उठाए। उन्होंने बीजेपी को एक निजी कंपनी की तरह चलाए जाने का आरोप लगाया और कहा कि संगठन में लोकतांत्रिक व्यवस्था कमजोर हुई है। उनके मुताबिक, पदाधिकारियों का चयन कार्यकर्ताओं की राय के बजाय ऊपर से किया जाता है।
उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि पुराने कार्यकर्ताओं को किनारे किया जा रहा है और नेताओं के परिवारों को प्राथमिकता मिल रही है। पिछड़े और दलित वर्गों को पर्याप्त सम्मान नहीं मिलने की बात भी उन्होंने उठाई।
हालांकि, ये सभी आरोप धर्मेंद्र कश्यप की ओर से लगाए गए हैं। इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध जानकारी में नहीं है।
गुटबाजी से लेकर 20% कमीशन तक के आरोप, नगर निगम के बजट पर भी सवाल
बीजेपी छोड़ते समय धर्मेंद्र कश्यप ने बरेली मंडल में पार्टी की स्थिति को लेकर भी गंभीर दावे किए। उन्होंने संगठन में गुटबाजी और पैसे के दम पर कामकाज चलने का आरोप लगाया। उनका दावा है कि मंडल की करीब 80 फीसदी सीटों पर पार्टी को हार का सामना करना पड़ सकता है।
कश्यप ने आरोप लगाया कि संगठन के कुछ पदाधिकारियों को हर महीने एक से दो लाख रुपये तक दिए जाने की व्यवस्था है। इसके अलावा उन्होंने थाने से तहसील तक भ्रष्टाचार होने और 20 फीसदी कमीशन लिए जाने का दावा भी किया।
उन्होंने बरेली नगर निगम के एक हजार करोड़ रुपये से अधिक के बजट की जांच कराने की मांग उठाई। साथ ही कहा कि केवल हिंदू-मुस्लिम मुद्दों के सहारे हर चुनाव नहीं जीता जा सकता।
इन आरोपों के राजनीतिक मायने भी हैं। 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले संगठन की कार्यप्रणाली, स्थानीय नेताओं की नाराजगी और भ्रष्टाचार के मुद्दे चुनावी बहस का हिस्सा बन सकते हैं। हालांकि, कश्यप के दावों को फिलहाल आरोपों के तौर पर ही देखा जाना चाहिए।
कौन हैं धर्मेंद्र कश्यप? दो बार सांसद रहे, 2024 में मिली हार
धर्मेंद्र कश्यप बरेली जिले की आंवला लोकसभा सीट से बीजेपी के टिकट पर 2014 और 2019 में सांसद चुने गए थे। 2024 के लोकसभा चुनाव में उन्हें समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार नीरज मौर्य से हार का सामना करना पड़ा।
कश्यप इससे पहले विधायक भी रह चुके हैं। उनका राजनीतिक सफर बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी से जुड़ाव के बाद बीजेपी तक पहुंचा था। 2013 में बीजेपी में शामिल होने के बाद उन्होंने आंवला सीट से लगातार दो लोकसभा चुनाव जीते।
अब उनका सपा में जाना आंवला और बरेली क्षेत्र की राजनीति में कितना असर डालेगा, यह आने वाले समय में स्पष्ट होगा। राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा भी है कि वह अपनी बेटी को समाजवादी पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ाने की तैयारी कर सकते हैं। हालांकि, इस बारे में अभी कोई आधिकारिक घोषणा सामने नहीं आई है।
सपा के तीन बागी विधायक बीजेपी में शामिल होंगे, दल-बदल से बदलेगा समीकरण?
एक तरफ धर्मेंद्र कश्यप के सपा में जाने से बीजेपी को झटका लगा है, तो दूसरी तरफ समाजवादी पार्टी के तीन बागी विधायकों के बीजेपी में शामिल होने की तैयारी है।
रिपोर्ट के मुताबिक, गौरीगंज से विधायक राकेश प्रताप सिंह, अयोध्या की गोसाईगंज सीट से विधायक अभय सिंह और कालपी से विधायक विनोद चतुर्वेदी बीजेपी की सदस्यता लेने जा रहे हैं। अमेठी में आयोजित सदस्यता कार्यक्रम में पूर्व केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी और बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी के मौजूद रहने की जानकारी दी गई है।
इन विधायकों की बगावत की पृष्ठभूमि फरवरी 2024 के राज्यसभा चुनाव से जुड़ी है। उस दौरान बीजेपी उम्मीदवार संजय सेठ के समर्थन में समाजवादी पार्टी के सात विधायकों ने पार्टी लाइन से अलग रुख अपनाया था। इनमें मनोज पांडेय, राकेश प्रताप सिंह, अभय सिंह, राकेश पांडेय, विनोद चतुर्वेदी, पूजा पाल और आशुतोष मौर्य के नाम शामिल थे।
इनमें से पूजा पाल बीजेपी की सदस्यता लिए बिना पार्टी की प्रदेश उपाध्यक्ष बनाई गईं, जबकि मनोज पांडेय को योगी सरकार में कैबिनेट मंत्री बनाया गया। रिपोर्ट के अनुसार, राकेश पांडेय और आशुतोष मौर्य अभी भी सपा विधायक हैं।
2027 के चुनाव से पहले क्या होगा असर?
धर्मेंद्र कश्यप का बीजेपी छोड़कर सपा में जाना और सपा के बागी विधायकों का बीजेपी की ओर बढ़ना बताता है कि यूपी में राजनीतिक समीकरण लगातार बदल रहे हैं। हालांकि, दल-बदल का वास्तविक चुनावी असर उम्मीदवारों के चयन, स्थानीय संगठन की ताकत और मतदाताओं के रुख पर निर्भर करेगा।
फिलहाल दोनों प्रमुख दलों के लिए सबसे बड़ी चुनौती अपने समर्थकों को एकजुट रखने और स्थानीय स्तर पर संगठन को मजबूत करने की है। आने वाले महीनों में नेताओं की आवाजाही और तेज होती है या नहीं, इस पर भी राजनीतिक नजरें रहेंगी।



