मुस्लिम वोट बैंक में कमल खिला! फलता में बीजेपी का 71% वोट शेयर, TMC का भारी सफाया

मुस्लिम वोट बैंक में कमल खिला! फलता में बीजेपी का 71% वोट शेयर, TMC का भारी सफाया

पश्चिम बंगाल की फलता विधानसभा सीट पर इस बार का चुनाव परिणाम कई मायनों में चौंकाने वाला रहा है। जिस सीट को लंबे समय से मुस्लिम वोटर्स का गढ़ माना जाता था, वहां भारतीय जनता पार्टी ने पहली बार बड़ी जीत दर्ज की। बीजेपी के प्रत्याशी देबांग्शु पांडा ने 71.2 प्रतिशत वोट हासिल कर एकतरफा मुकाबला जीत लिया। यह नतीजा न सिर्फ बीजेपी के लिए मील का पत्थर है, बल्कि राज्य की सियासी तस्वीर को बदलने वाला भी साबित हो सकता है।

आम पाठक के लिए यह समझना जरूरी है कि फलता जैसी सीट पर बीजेपी की यह सफलता स्थानीय स्तर पर राजनीतिक समीकरणों में बड़े बदलाव का संकेत दे रही है। जहां पहले तृणमूल कांग्रेस का मजबूत गढ़ था, वहां अब सत्ता विरोधी वोटों का बंटवारा साफ नजर आ रहा है।

3.7% पर सिमटी TMC, CPI-M का comeback

चुनावी मैदान में तृणमूल कांग्रेस के कद्दावर नेता जहांगीर खान वोटिंग से पहले ही चुनाव से हट गए थे, फिर भी उनका नाम ईवीएम में बना रहा। उन्होंने महज 7,783 वोट हासिल किए और जमानत जब्त हो गई। नतीजतन टीएमसी का वोट शेयर 2021 के 56.7 प्रतिशत से गिरकर इस बार सिर्फ 3.7 प्रतिशत रह गया।

दूसरी ओर, सीपीआई-एम के शंभुनाथ कुर्मी ने 19.34 प्रतिशत वोट (40,645 वोट) पाकर दूसरे स्थान पर जगह बनाई। कांग्रेस के मुस्लिम प्रत्याशी अब्दुर रज्जाक मौला तीसरे स्थान पर रहे और उन्हें महज 4.8 प्रतिशत यानी 10,084 वोट मिले। कुल 2,10,192 वोटों में दो मुस्लिम प्रत्याशियों को मिलाकर सिर्फ 17,867 वोट ही आए। यह आंकड़े साफ बताते हैं कि मुस्लिम वोट बैंक में दरार पड़ी है।

हिंदू-मुस्लिम वोटों का नया गणित

2021 के विधानसभा चुनाव में फलता सीट पर टीएमसी के शंकर कुमार नास्कर ने 56.7 प्रतिशत वोट से जीत हासिल की थी। बीजेपी उस समय करीब 20 प्रतिशत वोट पर रही थी। लेकिन इस बार बीजेपी ने 36.75 प्रतिशत से बढ़कर 71 प्रतिशत वोट शेयर हासिल कर दिखाया।

विशेष रूप से ध्यान देने वाली बात यह है कि 30 प्रतिशत मुस्लिम वोटर्स वाली इस सीट पर पहले और दूसरे स्थान पर हिंदू प्रत्याशी रहे। अल्पसंख्यक वोटों का एक बड़ा हिस्सा सीपीआई-एम की ओर शिफ्ट होता दिख रहा है। 2011 से लेकर 2021 तक अल्पसंख्यक वोटर्स टीएमसी के साथ मजबूती से खड़े रहे थे, लेकिन अब स्थिति बदलती नजर आ रही है।

TMC संगठन पर सवाल, विपक्षी विकल्प की तलाश

लोकसभा चुनाव में डायमंड हार्बर सीट के अंतर्गत आने वाली फलता में टीएमसी को 89 प्रतिशत वोट मिले थे। महज दो साल में यह आंकड़ा बेहद नीचे गिर गया। यह टीएमसी के संगठनात्मक कमजोर होने का संकेत है।

फलता का नतीजा पूरे पश्चिम बंगाल के लिए अहम है। यह दिखाता है कि जहां बीजेपी हिंदू वोटों को एकजुट करने में सफल रही, वहीं टीएमसी से नाराज अल्पसंख्यक वोटर्स कांग्रेस की बजाय वामपंथी दल सीपीआई-एम की ओर मुड़ रहे हैं। कांग्रेस फिर से अपनी पैठ बनाने में नाकाम रही।

यह चुनावी नतीजा साबित करता है कि पश्चिम बंगाल में राजनीतिक समीकरण तेजी से बदल रहे हैं। बीजेपी का उभार, टीएमसी का सिकुड़ना और वाम दलों की वापसी की कोशिशें आने वाले समय में राज्य की सियासत को और दिलचस्प बनाने वाली हैं। आम नागरिकों के लिए यह बदलाव स्थिरता, विकास और बेहतर शासन की उम्मीद भी जगा सकता है।