गाजियाबाद में वकीलों पर हमले का मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, पुलिस पर गंभीर आरोप, हत्या की कोशिश की धारा लगाने और सुरक्षा देने की मांग

गाजियाबाद में वकीलों पर हमले का मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, पुलिस पर गंभीर आरोप, हत्या की कोशिश की धारा लगाने और सुरक्षा देने की मांग

गाजियाबाद में चार वकीलों पर कथित हमले का मामला अब सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। पीड़ित वकीलों ने उत्तर प्रदेश पुलिस पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा है कि हमले के बावजूद पुलिस ने हत्या के प्रयास जैसी गंभीर धाराओं में मुकदमा दर्ज नहीं किया। उनका आरोप है कि घटना के सात दिन से ज्यादा बीतने के बाद भी पुलिस आरोपियों को गिरफ्तार नहीं कर सकी है। इस मामले में एक महिला वकील समेत चार अधिवक्ताओं ने संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की है। याचिकाकर्ताओं ने मामले की निष्पक्ष जांच, FIR में गंभीर धाराएं जोड़ने और खुद के साथ परिवार की सुरक्षा सुनिश्चित करने की मांग की है।

यह मामला 22 अक्टूबर को गाजियाबाद के एक रिहायशी परिसर में हुए कथित हमले से जुड़ा है। विवाद की शुरुआत अवैध निर्माण को लेकर हुई थी। अब पीड़ितों ने स्थानीय पुलिस की जांच प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए सुप्रीम कोर्ट से हस्तक्षेप की मांग की है।

22 अक्टूबर की रात क्या हुआ था? चार वकीलों पर हमले का आरोप

याचिका दाखिल करने वाले चार वकीलों की पहचान ए. दीपा, ए. देब कुमार, विपिन शर्मा और अनूप गोयल के रूप में हुई है। इनका आरोप है कि 22 अक्टूबर की रात करीब 9 बजे अमित वर्मा और उनके बेटे राहुल वर्मा कुछ अज्ञात लोगों को रिहायशी परिसर में लेकर पहुंचे थे।

याचिका के मुताबिक, इसके बाद इन लोगों ने चारों वकीलों के साथ मारपीट शुरू कर दी। जब परिसर में मौजूद कुछ अन्य लोगों ने बीच-बचाव करने और वकीलों को बचाने की कोशिश की, तो उनके साथ भी कथित तौर पर मारपीट की गई।

घटना के बाद ए. दीपा ने इंदिरापुरम पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज कराई। याचिका में बताया गया है कि पीड़ितों की मेडिकल जांच और CCTV फुटेज की पुष्टि के बाद पुलिस ने FIR दर्ज की थी।

हालांकि, वकीलों का कहना है कि पुलिस ने मामले की गंभीरता के हिसाब से कार्रवाई नहीं की। उनके मुताबिक, हमले में आई चोटों और घटना की परिस्थितियों को देखते हुए कहीं ज्यादा गंभीर धाराएं लगाई जानी चाहिए थीं।

पुलिस ने हल्की धाराओं में दर्ज की FIR, हत्या के प्रयास की धारा जोड़ने की मांग

याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि पुलिस ने FIR नंबर 880/2026 में भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 की मुख्य रूप से अपेक्षाकृत हल्की धाराएं लगाई हैं।

इनमें धारा 115(2) जानबूझकर चोट पहुंचाने, धारा 131 हमला या आपराधिक बल प्रयोग करने, धारा 191(2) दंगा करने और धारा 352/352(2) शांति भंग करने के इरादे से अपमान करने से संबंधित हैं।

वकीलों का कहना है कि घटना की गंभीरता को देखते हुए इन धाराओं के अलावा अन्य सख्त प्रावधान भी लागू किए जाने चाहिए थे।

याचिका में मांग की गई है कि FIR में BNS की धारा 74 जोड़ी जाए, जो महिला की गरिमा भंग करने के इरादे से हमला या आपराधिक बल प्रयोग करने से संबंधित है। इसके अलावा धारा 109 यानी हत्या का प्रयास और धारा 117(3) यानी गंभीर चोट पहुंचाने के विशेष प्रावधान को भी शामिल करने की मांग की गई है।

इस मामले में सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन की ओर से उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक (DGP) और पुलिस आयुक्त को पत्र भी भेजा गया था। पत्र में पुलिस की कार्रवाई पर चिंता जताई गई।

इसमें कहा गया कि ए. दीपा ने हमले की गंभीरता को लेकर विस्तार से जानकारी दी थी, लेकिन इसके बावजूद पुलिस ने चोटों और परिस्थितियों के अनुरूप सख्त धाराएं नहीं लगाईं। पत्र में यह भी कहा गया कि सात दिन से अधिक समय बीतने के बाद भी आरोपी गिरफ्तार नहीं हुए हैं। इससे पीड़ितों और उनके परिवारों को दोबारा हमले का डर बना हुआ है।

वकीलों के खिलाफ भी दर्ज हुई क्रॉस-FIR, जांच अधिकारी बदलने पर उठाए सवाल

इस मामले में एक और अहम घटनाक्रम 25 अक्टूबर को सामने आया। याचिका के मुताबिक, पुलिस ने वकीलों के खिलाफ भी एक क्रॉस-FIR दर्ज कर दी थी।

क्रॉस-FIR का मतलब है कि एक ही घटना को लेकर दोनों पक्षों की शिकायत पर अलग-अलग मुकदमे दर्ज होना। याचिकाकर्ताओं ने इस कार्रवाई पर भी सवाल उठाए हैं।

उनका कहना है कि क्रॉस-FIR दर्ज होने के बाद मामले के जांच अधिकारी को बदल दिया गया। इसके बाद संबंधित लोगों के बयान दोबारा दर्ज किए गए।

वकीलों ने इस पूरी प्रक्रिया को लेकर निष्पक्ष जांच की मांग की है। उनका कहना है कि मामले में सभी पक्षों के बयानों को सही तरीके से दर्ज किया जाना चाहिए और घटनास्थल के CCTV फुटेज को सुरक्षित रखकर उसकी जांच होनी चाहिए।

याचिकाकर्ताओं ने यह भी अनुरोध किया है कि क्रॉस-FIR को रद्द किया जाए और मामले की जांच गाजियाबाद से हटाकर दिल्ली के किसी पुलिस स्टेशन को सौंप दी जाए। इसके साथ ही जरूरत पड़ने पर चारों वकीलों और उनके परिवारों को पर्याप्त सुरक्षा देने की मांग की गई है।

अनुच्छेद 32 के तहत सुप्रीम कोर्ट में याचिका, निष्पक्ष जांच की मांग

चारों वकीलों ने भारतीय संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। इस प्रावधान के तहत मौलिक अधिकारों के उल्लंघन की स्थिति में सीधे सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की जा सकती है।

याचिका में अदालत से मांग की गई है कि उत्तर प्रदेश पुलिस को FIR में जरूरी गंभीर धाराएं जोड़ने और प्रभावी जांच करने का निर्देश दिया जाए। साथ ही आरोपियों की गिरफ्तारी, पीड़ितों की सुरक्षा और जांच की प्रगति को लेकर स्टेटस रिपोर्ट पेश करने की मांग भी की गई है।

याचिकाकर्ताओं ने विशेष रूप से CCTV फुटेज सुरक्षित रखने, उसकी जांच कराने, सभी संबंधित लोगों के बयान दर्ज करने और दूसरे जरूरी सबूत जुटाने का अनुरोध किया है।

जानकारी के मुताबिक, 30 अक्टूबर को भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) के सामने इस मामले का उल्लेख किया गया था। इसके बाद याचिका दाखिल करने का निर्देश दिया गया। यह याचिका अधिवक्ता प्रणय कुमार महापात्रा के माध्यम से दाखिल की गई है।

केस का नाम: A. Deepa & Ors. v. State of Uttar Pradesh & Ors.

फिलहाल इस मामले में याचिकाकर्ताओं की ओर से लगाए गए आरोपों और की गई मांगों पर सुप्रीम कोर्ट की आगे की कार्रवाई अहम होगी। यह मामला केवल चार वकीलों पर कथित हमले तक सीमित नहीं है, बल्कि पुलिस जांच की निष्पक्षता, पीड़ितों की सुरक्षा और गंभीर आपराधिक मामलों में सही धाराएं लगाने जैसे महत्वपूर्ण सवाल भी उठाता है।