उत्तर प्रदेश में ग्राम प्रधानों को पंचायत चुनाव होने तक प्रशासक बनाए जाने के मामले में इलाहाबाद हाई कोर्ट से अहम अपडेट सामने आया है। इस मुद्दे पर दायर याचिका पर फिलहाल कोई अंतिम सुनवाई नहीं होगी, क्योंकि हाई कोर्ट ने मामले की सुनवाई छह सप्ताह के लिए टाल दी है। अदालत ने स्पष्ट किया कि इसी विषय से जुड़ा एक समान मामला पहले से लखनऊ खंडपीठ के समक्ष लंबित है। ऐसे में एक ही मुद्दे पर अलग-अलग पीठों में समानांतर सुनवाई उचित नहीं होगी। इस फैसले के बाद अब पंचायत चुनाव और ग्राम पंचायतों के प्रशासनिक संचालन से जुड़ी बहस कुछ समय के लिए अदालत में आगे नहीं बढ़ेगी।
हाई कोर्ट ने क्यों टाली सुनवाई? जानिए अदालत की दलील
मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति सौरभ श्याम शमशेरी की एकल पीठ में हुई। सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि ग्राम प्रधानों को प्रशासक बनाए जाने से जुड़ा समान कानूनी प्रश्न पहले से ही इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ खंडपीठ के समक्ष विचाराधीन है।
इसी आधार पर एकल पीठ ने मामले की सुनवाई छह सप्ताह के लिए स्थगित कर दी और निर्देश दिया कि याचिका को निर्धारित अवधि के बाद फिर से सूचीबद्ध किया जाए। अदालत का मानना था कि समान विषय पर अलग-अलग पीठों में एक साथ सुनवाई से न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है।
सरकार के आदेश को क्यों दी गई है चुनौती?
यह विवाद उत्तर प्रदेश सरकार के 25 मई को जारी उस अध्यादेश से जुड़ा है, जिसके तहत पंचायत चुनाव होने तक मौजूदा ग्राम प्रधानों को छह महीने के लिए प्रशासक के रूप में कार्य करने का प्रावधान किया गया था।
इस सरकारी आदेश को इलाहाबाद हाई कोर्ट में जनहित याचिका के माध्यम से चुनौती दी गई है। यह याचिका ईश्वर शरण डिग्री कॉलेज के विधि छात्र युद्धिष्ठिर वर्मा और आयुष पांडेय ने दाखिल की है।
याचिकाकर्ताओं का कहना है कि सरकार ने एक्ट संख्या 6, वर्ष 2017 की धारा 12(3A) के तहत जिन शक्तियों का उपयोग किया है, वह संविधान के अनुच्छेद 243(i)(e) के अनुरूप नहीं है। उनका तर्क है कि इस व्यवस्था के कारण ग्राम पंचायत चुनाव टल रहे हैं, जो संवैधानिक प्रावधानों की भावना के विपरीत है।
इससे पहले इस मामले में न्यायमूर्ति अजीत कुमार और न्यायमूर्ति विनय कुमार द्विवेदी की खंडपीठ राज्य सरकार से जवाब भी मांग चुकी है। सरकार को जवाबी हलफनामा दाखिल करने के लिए चार सप्ताह का समय दिया गया था।
लखनऊ खंडपीठ में 4 अगस्त को होगी अहम सुनवाई
इसी मुद्दे से जुड़ा मामला हाई कोर्ट की लखनऊ खंडपीठ में भी लंबित है। वहां न्यायमूर्ति राजन रॉय और न्यायमूर्ति मंजीव शुक्ला की खंडपीठ इस मामले में उठाए गए संवैधानिक प्रश्नों पर सुनवाई कर रही है।
अदालत ने यह भी कहा है कि सुनवाई के दौरान इस पहलू पर विचार किया जाएगा कि पंचायत चुनाव समय पर न कराए जाने के पीछे सरकार की कोई विफलता रही है या नहीं। इस मामले की अगली सुनवाई 4 अगस्त को निर्धारित की गई है।
लखनऊ खंडपीठ की सुनवाई को इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि वहां इस पूरे विवाद के संवैधानिक पहलुओं पर विस्तार से विचार किया जाएगा। उसके बाद आगे की न्यायिक प्रक्रिया की दिशा अधिक स्पष्ट हो सकती है।
आगे क्या रहेगा असर?
फिलहाल इलाहाबाद हाई कोर्ट की एकल पीठ में यह मामला छह सप्ताह तक आगे नहीं बढ़ेगा। ऐसे में ग्राम प्रधानों को प्रशासक बनाए जाने के मुद्दे पर सभी की निगाहें अब लखनऊ खंडपीठ की आगामी सुनवाई पर टिकी हैं।
इस मामले का असर केवल ग्राम प्रधानों तक सीमित नहीं है, बल्कि पंचायत चुनाव की समयसीमा, ग्रामीण प्रशासन और संवैधानिक प्रक्रियाओं से भी जुड़ा हुआ है। इसलिए अदालत का अंतिम फैसला प्रदेश की पंचायत व्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।


