गुरुग्राम में चल रहे तोड़फोड़ अभियान को लेकर सुप्रीम कोर्ट का रुख साफ और सख्त नजर आया है। शीर्ष अदालत ने इस मामले में दायर याचिका पर सुनवाई से इनकार करते हुए याचिकाकर्ताओं को सीधे पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट जाने की सलाह दी है। कोर्ट ने यह भी कहा कि मामले की गंभीरता को देखते हुए आज ही हाईकोर्ट में इसका तत्काल उल्लेख किया जाए, ताकि जल्द सुनवाई हो सके।
यह फैसला उन हजारों परिवारों के लिए अहम है, जो इस समय अपने घरों पर कार्रवाई की आशंका से चिंतित हैं।
SC ने क्यों खारिज की सुनवाई? समझिए पूरा मामला
सुप्रीम कोर्ट की बेंच, जिसमें मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची शामिल थे, के सामने यह मामला मौखिक रूप से पेश किया गया। वरिष्ठ वकील गोपाल शंकरनारायणन ने दलील दी कि गुरुग्राम में बिना उचित नोटिस दिए तोड़फोड़ की जा रही है।
उन्होंने आरोप लगाया कि अधिकारियों ने हाईकोर्ट के आदेश की गलत व्याख्या कर कार्रवाई शुरू कर दी है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस पर हस्तक्षेप करने से इनकार करते हुए कहा कि यह मुद्दा पहले हाईकोर्ट के समक्ष ही उठाया जाना चाहिए।
‘अनधिकृत निर्माण’ पर कोर्ट की सख्त टिप्पणी
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने यह भी संकेत दिया कि अगर निर्माण अवैध हैं, तो कार्रवाई को रोका नहीं जा सकता। कोर्ट ने सवाल उठाया कि जब हाईकोर्ट इस मामले को देख रहा है, तो शीर्ष अदालत को बीच में हस्तक्षेप क्यों करना चाहिए।
यह टिप्पणी इस बात का संकेत देती है कि अदालत प्रशासनिक कार्रवाई को पूरी तरह खारिज करने के मूड में नहीं थी, बल्कि प्रक्रिया के पालन पर जोर दे रही थी।
क्या है S+4 नीति और विवाद की जड़?
पूरा विवाद ‘स्टिल्ट + 4’ (S+4) निर्माण नीति से जुड़ा है, जिस पर पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने 2 अप्रैल को अंतरिम रोक लगा दी थी। याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि इस रोक का इस्तेमाल प्रशासन ने बड़े पैमाने पर तोड़फोड़ के लिए “हथियार” की तरह किया।
उनका कहना है कि हाईकोर्ट ने केवल नीति के अमल पर रोक लगाई थी, न कि किसी तरह की तोड़फोड़ की अनुमति दी थी। इसके बावजूद अधिकारियों ने 16 अप्रैल को निर्देश जारी कर कई रिहायशी इलाकों में दीवारें, रैंप और अन्य ढांचों को हटाने की कार्रवाई शुरू कर दी।
1500 परिवारों पर मंडरा रहा खतरा
याचिका में दावा किया गया है कि सेक्टर-31 समेत कई इलाकों में करीब 1500 परिवार, जो पिछले तीन दशकों से रह रहे हैं, अब अपने घर टूटने के डर में हैं। आरोप यह भी है कि बिना ‘कारण बताओ नोटिस’ दिए या सुनवाई का मौका दिए कार्रवाई की जा रही है।
ऐसे में आम निवासियों के सामने कानूनी और भावनात्मक दोनों तरह की चुनौती खड़ी हो गई है।
अब आगे क्या?
सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद अब सारी नजरें पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट पर हैं। अगर वहां तुरंत सुनवाई होती है, तो प्रभावित लोगों को राहत मिलने की संभावना बन सकती है।
फिलहाल यह मामला सिर्फ कानूनी विवाद नहीं, बल्कि शहरी नियोजन, प्रशासनिक कार्रवाई और नागरिक अधिकारों के बीच संतुलन का बड़ा उदाहरण बन गया है।


