उत्तर प्रदेश की राजनीति के इतिहास से जुड़ा एक पुराना किस्सा इन दिनों फिर चर्चा में है। दावा किया जा रहा है कि एक समय प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे नेता ने अपनी ही पार्टी के वरिष्ठ नेता को हराने के लिए विधानसभा चुनाव के दौरान मतपेटियां (बैलेट बॉक्स) बदलवा दी थीं। यह दावा किसी आधिकारिक जांच रिपोर्ट या न्यायिक फैसले में नहीं, बल्कि वरिष्ठ पत्रकार श्यामलाल यादव की पुस्तक “At the Heart of Power: The Chief Ministers of Uttar Pradesh” में दर्ज एक प्रसंग के रूप में सामने आया है। यही वजह है कि यह मामला राजनीतिक इतिहास का एक चर्चित किस्सा तो है, लेकिन इसे स्थापित तथ्य के रूप में नहीं देखा जा सकता।
दो दिग्गज नेताओं की राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता की कहानी
यह प्रसंग उत्तर प्रदेश के दो पूर्व मुख्यमंत्रियों—चंद्रभानु गुप्त और हेमवती नंदन बहुगुणा—से जुड़ा है। दोनों कांग्रेस के प्रभावशाली नेताओं में गिने जाते थे और अलग-अलग समय पर प्रदेश की कमान संभाल चुके थे।
चंद्रभानु गुप्त को उत्तर प्रदेश के सबसे प्रभावशाली राजनीतिक रणनीतिकारों में माना जाता है। वह चार बार मुख्यमंत्री रहे और लंबे समय तक कांग्रेस संगठन में उनकी मजबूत पकड़ रही।
वहीं, हेमवती नंदन बहुगुणा वर्ष 1973 में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने। उन्हें तेज-तर्रार प्रशासक और प्रभावशाली जननेता के रूप में जाना जाता था। बाद के वर्षों में उन्होंने राष्ट्रीय राजनीति में भी अहम भूमिका निभाई।
1974 के चुनाव से जुड़ा क्या है किताब का दावा?
किताब के अनुसार, वर्ष 1974 के विधानसभा चुनाव में चंद्रभानु गुप्त लखनऊ (पूर्व) विधानसभा सीट से चुनाव लड़ रहे थे। चुनाव परिणाम में वह बेहद कम अंतर से हार गए।
वरिष्ठ पत्रकार श्यामलाल यादव ने अपनी पुस्तक में लिखा है कि आपातकाल (इमरजेंसी) के बाद, जब दोनों नेता जनता पार्टी में एक साथ थे, तब हेमवती नंदन बहुगुणा ने कथित तौर पर चंद्रभानु गुप्त से स्वीकार किया कि उस चुनाव में कई बैलेट बॉक्स बदलवाए गए थे, जिसके कारण उन्हें हार का सामना करना पड़ा।
हालांकि, इस पूरे प्रसंग को लेकर एक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि इस दावे की पुष्टि चुनाव आयोग, किसी अदालत या किसी आधिकारिक जांच रिपोर्ट से नहीं हुई है। इसलिए इसे केवल पुस्तक में दर्ज एक राजनीतिक संस्मरण (anecdote) के रूप में ही देखा जाना चाहिए।
क्यों आज भी चर्चा में है यह किस्सा?
यह कहानी इसलिए चर्चा में रहती है क्योंकि इसमें उत्तर प्रदेश की राजनीति के दो बड़े नेताओं का नाम जुड़ा है। यदि पुस्तक में दर्ज दावे को सही माना जाए, तो यह उस दौर की राजनीतिक प्रतिस्पर्धा की तीव्रता को दर्शाता है।
हालांकि इतिहासकार और राजनीतिक विश्लेषक ऐसे संस्मरणों को पढ़ते समय सावधानी बरतने की सलाह देते हैं। उनका मानना है कि जब तक किसी दावे की पुष्टि आधिकारिक दस्तावेजों, न्यायिक रिकॉर्ड या स्वतंत्र जांच से न हो जाए, तब तक उसे ऐतिहासिक तथ्य नहीं माना जा सकता।
रिपोर्ट के अनुसार, इस प्रसंग को लेकर जब पुस्तक के लेखक से बातचीत की गई तो उन्होंने अपनी पुस्तक में लिखी बातों पर कायम रहने की बात कही। फिर भी उपलब्ध सार्वजनिक रिकॉर्ड में इस दावे की स्वतंत्र पुष्टि नहीं मिलती।
उत्तर प्रदेश की राजनीति में समय के साथ समीकरण बदलते रहे और जो नेता कभी एक-दूसरे के राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी थे, वे बाद में जनता पार्टी के मंच पर साथ भी दिखाई दिए। यही वजह है कि यह किस्सा आज भी राजनीतिक इतिहास के चर्चित प्रसंगों में शामिल है, लेकिन इसे एक पुस्तक में दर्ज दावा ही माना जाना चाहिए, न कि स्थापित ऐतिहासिक सत्य।


