लालू यादव को सुप्रीम कोर्ट से राहत, हाईकोर्ट की जमानत में दखल से इनकार; लेकिन खुला छोड़ा अहम कानूनी सवाल

लालू यादव को सुप्रीम कोर्ट से राहत, हाईकोर्ट की जमानत में दखल से इनकार; लेकिन खुला छोड़ा अहम कानूनी सवाल

राष्ट्रीय जनता दल (RJD) प्रमुख और बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव को चारा घोटाले के देवघर कोषागार मामले में सुप्रीम कोर्ट से राहत मिली है। सर्वोच्च अदालत ने झारखंड हाईकोर्ट के उस आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया, जिसके तहत लालू यादव को जमानत मिली थी। हालांकि, अदालत ने मामले से जुड़े एक महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्न पर कोई अंतिम राय नहीं दी और उसे खुला छोड़ दिया। साथ ही झारखंड हाईकोर्ट को निर्देश दिया कि वर्षों से लंबित मुख्य अपीलों की सुनवाई में तेजी लाई जाए। ऐसे में फिलहाल लालू यादव को राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है।

CBI ने क्यों दी थी सुप्रीम कोर्ट में चुनौती?

यह मामला चारा घोटाले के देवघर कोषागार केस से जुड़ा है। केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) ने झारखंड हाईकोर्ट के जमानत आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी।

CBI का तर्क था कि हाईकोर्ट ने लालू प्रसाद यादव की जेल में बिताई गई अवधि की गणना सही तरीके से नहीं की। जांच एजेंसी का कहना था कि 50 प्रतिशत सजा पूरी होने के आधार पर जमानत देने में कानूनी त्रुटि हुई है।

वहीं लालू यादव की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने इस दलील का विरोध किया। उन्होंने कहा कि यह मानना सही नहीं है कि लालू यादव को एक सजा पूरी होने के बाद ही दूसरी सजा की अवधि गिनी जानी चाहिए। उनके अनुसार, CBI की कानूनी व्याख्या उचित नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के आदेश में दखल क्यों नहीं दिया?

जस्टिस एम.एम. सुंदरेश और जस्टिस पी.बी. वराले की पीठ ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद कहा कि फिलहाल झारखंड हाईकोर्ट के जमानत आदेश में हस्तक्षेप करने की आवश्यकता नहीं है।

अदालत ने माना कि लालू प्रसाद यादव की दोषसिद्धि के खिलाफ अपील और CBI की ओर से सजा बढ़ाने की अपील वर्ष 2018 से झारखंड हाईकोर्ट में लंबित हैं। ऐसे में जमानत आदेश पर दोबारा विचार करने के बजाय मुख्य अपीलों का शीघ्र निस्तारण अधिक उचित होगा।

इसी वजह से सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के आदेश को बरकरार रखा और CBI की याचिका पर फिलहाल राहत नहीं दी।

हाईकोर्ट को छह महीने में सुनवाई पूरी करने का आग्रह

सुप्रीम कोर्ट ने झारखंड हाईकोर्ट से अनुरोध किया कि लंबित मुख्य अपीलों की सुनवाई में तेजी लाई जाए। अदालत ने कहा कि वर्ष 2018 से लंबित इन मामलों का निपटारा यथासंभव छह महीने के भीतर किया जाना चाहिए।

इसका मतलब है कि अब हाईकोर्ट में लालू यादव की दोषसिद्धि के खिलाफ दायर अपील और CBI की सजा बढ़ाने की मांग वाली अपील पर तेज गति से सुनवाई होने की संभावना है।

क्या यह लालू यादव के लिए राहत है या चुनौती?

फिलहाल सुप्रीम कोर्ट के फैसले से लालू प्रसाद यादव की जमानत बरकरार रहेगी, इसलिए इसे तत्काल राहत माना जा रहा है। हालांकि अदालत ने CBI द्वारा उठाए गए कानूनी प्रश्न पर कोई अंतिम फैसला नहीं दिया और उसे भविष्य के लिए खुला रखा है।

यही कारण है कि इस मामले का अंतिम परिणाम अभी आना बाकी है। अब सबसे अहम सुनवाई झारखंड हाईकोर्ट में होगी, जहां दोषसिद्धि और सजा से जुड़ी मुख्य अपीलों पर फैसला किया जाएगा। उसी के आधार पर इस बहुचर्चित मामले की आगे की कानूनी दिशा तय होगी।