लिथियम-निकेल प्रोसेसिंग के लिए ₹2,814 करोड़ की योजना मंजूर, भारत की घटेगी विदेशी आयात पर निर्भरता, ₹10 हजार करोड़ निवेश की उम्मीद

लिथियम-निकेल प्रोसेसिंग के लिए ₹2,814 करोड़ की योजना मंजूर, भारत की घटेगी विदेशी आयात पर निर्भरता, ₹10 हजार करोड़ निवेश की उम्मीद

इलेक्ट्रिक कारों, मोबाइल फोन, बैटरी और सेमीकंडक्टर जैसे उद्योगों के लिए जरूरी लिथियम और निकेल के मामले में भारत अपनी घरेलू क्षमता बढ़ाने की तैयारी कर रहा है। केंद्र सरकार ने इन महत्वपूर्ण खनिजों की प्रोसेसिंग को बढ़ावा देने के लिए 2,814 करोड़ रुपये की कैपेक्स सपोर्ट स्कीम को मंजूरी दी है। केंद्रीय कोयला एवं खान मंत्री जी. किशन रेड्डी के मुताबिक, इस योजना के तहत देश में बड़े स्तर पर लिथियम और निकेल रिफाइनिंग सुविधाएं विकसित की जाएंगी। करीब 9,560 करोड़ रुपये के कुल निवेश से सालाना 60 हजार टन लिथियम और एक लाख टन निकेल रिफाइन करने की क्षमता तैयार करने का लक्ष्य है। सरकार को उम्मीद है कि इससे करीब 10 हजार करोड़ रुपये का निवेश आएगा और 25 हजार करोड़ रुपये का आउटपुट मूल्य पैदा होगा। सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि भविष्य के उद्योगों के लिए जरूरी इन खनिजों की आपूर्ति में भारत की विदेशी बाजारों पर निर्भरता कम हो सकेगी।

लिथियम और निकेल के लिए घरेलू रिफाइनिंग पर जोर, क्या बदलेगी तस्वीर?

केंद्रीय मंत्री जी. किशन रेड्डी ने बताया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने महत्वपूर्ण खनिजों की प्रोसेसिंग के लिए 2,814 करोड़ रुपये की कैपेक्स सपोर्ट स्कीम को मंजूरी दी है। इसका उद्देश्य भारत में महत्वपूर्ण खनिजों की पूरी वैल्यू चेन विकसित करना है।

लिथियम और निकेल ऐसे खनिज हैं, जिनकी जरूरत तेजी से बढ़ते तकनीकी और औद्योगिक क्षेत्रों में पड़ती है। इलेक्ट्रिक वाहनों की बैटरी, मोबाइल फोन, सेमीकंडक्टर, नवीकरणीय ऊर्जा और बैटरी स्टोरेज जैसे क्षेत्रों में इनकी अहम भूमिका है।

अभी इन खनिजों की घरेलू प्रोसेसिंग क्षमता बढ़ाना भारत के लिए रणनीतिक जरूरत बन गया है। सरकार का मानना है कि केवल खनिजों की खोज और खनन से काम नहीं चलेगा। देश में उन्हें प्रोसेस और रिफाइन करने की सुविधाएं भी विकसित करनी होंगी। इसी दिशा में यह योजना महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

₹9,560 करोड़ के निवेश से बनेगी बड़ी रिफाइनिंग क्षमता

इस योजना के तहत भारत में पहली बार बड़े स्तर पर कमर्शियल लिथियम और निकेल रिफाइनिंग सुविधाएं स्थापित करने की तैयारी है। मंत्री के मुताबिक, करीब 9,560 करोड़ रुपये के निवेश से सालाना 60,000 टन लिथियम और 1,00,000 टन निकेल रिफाइन करने की क्षमता विकसित करने में मदद मिलेगी।

सरकार का लक्ष्य है कि 2030 तक इन खनिजों की अनुमानित घरेलू जरूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त प्रोसेसिंग क्षमता तैयार की जा सके।

इस परियोजना से करीब 10,000 करोड़ रुपये का निवेश आने और लगभग 25,000 करोड़ रुपये का आउटपुट मूल्य पैदा होने की उम्मीद है। इससे नई औद्योगिक इकाइयों की स्थापना, आधुनिक तकनीक के इस्तेमाल और कुशल कामगारों के लिए रोजगार के अवसर बढ़ सकते हैं।

पहले से चल रही हैं 901 एक्सप्लोरेशन परियोजनाएं, 56 खनिज ब्लॉकों की नीलामी

सरकार केवल प्रोसेसिंग क्षमता बढ़ाने पर ही काम नहीं कर रही है। जी. किशन रेड्डी ने बताया कि पिछले दो वर्षों में महत्वपूर्ण खनिजों की खोज के लिए 901 एक्सप्लोरेशन परियोजनाएं शुरू की गई हैं। इसके अलावा 56 महत्वपूर्ण खनिज ब्लॉकों की सफलतापूर्वक नीलामी की जा चुकी है।

खनिजों के दोबारा इस्तेमाल यानी रीसाइक्लिंग को बढ़ावा देने के लिए 1,500 करोड़ रुपये की प्रोत्साहन योजना भी शुरू की गई है। इसके तहत 58 कंपनियों को मंजूरी मिली है। इन कंपनियों की प्रस्तावित प्रोसेसिंग क्षमता 850 किलो टन प्रति वर्ष बताई गई है।

इसके साथ ही खदानों के कचरे और टेलिंग्स से उपयोगी खनिज निकालने, रिसर्च को बढ़ावा देने और सेंटर्स ऑफ एक्सीलेंस विकसित करने पर भी काम किया जा रहा है।

चार राज्यों में बनेंगे क्रिटिकल मिनरल प्रोसेसिंग पार्क, उद्योगों को मिलेगा फायदा

घरेलू प्रोसेसिंग इकोसिस्टम तैयार करने के लिए सरकार महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, गुजरात और ओडिशा में चार विशेष क्रिटिकल मिनरल प्रोसेसिंग पार्क विकसित कर रही है। इन पार्कों पर करीब 500 करोड़ रुपये खर्च किए जाएंगे।

इन पार्कों का मकसद कंपनियों को प्रोसेसिंग यूनिट लगाने के लिए जरूरी औद्योगिक सुविधाएं उपलब्ध कराना और उनसे जुड़े दूसरे उद्योगों को बढ़ावा देना है।

इस पहल का सीधा संबंध सरकार की दूसरी औद्योगिक योजनाओं से भी है। इनमें एडवांस्ड केमिस्ट्री सेल (ACC) बैटरी और कैथोड एक्टिव मटेरियल के लिए प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) योजना शामिल है। इसके अलावा इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन और रेयर अर्थ परमानेंट मैग्नेट स्कीम को भी इससे मदद मिलने की उम्मीद है।

घरेलू स्तर पर लिथियम और निकेल की प्रोसेसिंग बढ़ने से भारत को अंतरराष्ट्रीय सप्लाई चेन में होने वाले उतार-चढ़ाव से निपटने में मदद मिल सकती है। भू-राजनीतिक तनाव या किसी एक देश पर अधिक निर्भरता के कारण आपूर्ति प्रभावित होने का जोखिम भी घट सकता है।

कुल मिलाकर, यह योजना सिर्फ खनन क्षेत्र तक सीमित नहीं है। इसका असर इलेक्ट्रिक वाहन, बैटरी, इलेक्ट्रॉनिक्स और स्वच्छ ऊर्जा जैसे उद्योगों पर भी पड़ सकता है। हालांकि, इसका वास्तविक लाभ इस बात पर निर्भर करेगा कि प्रस्तावित निवेश और रिफाइनिंग परियोजनाएं तय समय पर कितनी तेजी से जमीन पर उतरती हैं।