SIR पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर फिर उठे सवाल! पूर्व जज अभय ओक बोले- फॉर्म नहीं भरने पर वोटर का नाम हटाना गैरकानूनी

SIR पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर फिर उठे सवाल! पूर्व जज अभय ओक बोले- फॉर्म नहीं भरने पर वोटर का नाम हटाना गैरकानूनी

मतदाता सूची के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) को लेकर कानूनी बहस एक बार फिर तेज हो गई है। सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस अभय ओक ने कहा है कि शीर्ष अदालत को SIR की वैधता बरकरार रखने वाले अपने मई 2026 के फैसले पर दोबारा विचार करना चाहिए। उनका कहना है कि अगर कोई मतदाता केवल पहले से भरा हुआ गणना फॉर्म (Enumeration Form) जमा नहीं करता, तो इस आधार पर उसका नाम मतदाता सूची से हटाना कानून के अनुरूप नहीं है। जस्टिस ओक ने चुनाव आयोग की शक्तियों, मतदाताओं को सुनवाई का मौका देने और नागरिकता तय करने के अधिकार को लेकर भी सवाल उठाए हैं। इस बहस का सीधा संबंध आम नागरिक के मतदान के अधिकार और मतदाता सूची में उसका नाम सुरक्षित रहने से है।

SIR पर सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसले पर फिर विचार क्यों?

मीडिया को दिए एक इंटरव्यू में जस्टिस अभय ओक ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट को अपने मई 2026 के फैसले पर पुनर्विचार करना चाहिए। उनके मुताबिक, उस फैसले में जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 21(3) के तहत सभी निर्वाचन क्षेत्रों की मतदाता सूचियों में एक साथ संशोधन की अनुमति दी गई थी।

जस्टिस ओक ने कानून की व्याख्या करते हुए कहा कि धारा 21 के तहत मतदाता सूची का संशोधन गहन (Intensive) या आंशिक (Partial) हो सकता है। उनके अनुसार, गहन संशोधन के मामले में भी कानून एक समय में केवल एक निर्वाचन क्षेत्र की सूची के संशोधन की अनुमति देता है, न कि सभी निर्वाचन क्षेत्रों में एक साथ ऐसी प्रक्रिया चलाने की।

उन्होंने यह भी कहा कि कानून के मुताबिक मतदाता सूची का संशोधन आम चुनावों से पहले किया जाना चाहिए।

जस्टिस ओक की ये टिप्पणियां उनके कानूनी नजरिये को सामने रखती हैं। इन्हें सुप्रीम कोर्ट के फैसले में बदलाव या SIR पर किसी नए न्यायिक आदेश के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। फिलहाल, उन्होंने मौजूदा फैसले पर दोबारा विचार करने की जरूरत जताई है।

गणना फॉर्म नहीं भरा तो क्या वोटर का नाम कट सकता है?

जस्टिस ओक ने SIR प्रक्रिया में इस्तेमाल किए जा रहे एन्यूमरेशन फॉर्म को लेकर भी गंभीर सवाल उठाए। उनका कहना है कि चुनाव आयोग ने ऐसे फॉर्म को लागू किया, जबकि इसके लिए संबंधित कानूनों में स्पष्ट प्रावधान नहीं है।

उनके मुताबिक, चुनाव आयोग के दिशा-निर्देशों में यह व्यवस्था बताई गई कि अगर कोई व्यक्ति गणना फॉर्म जमा नहीं करता है, तो उसका नाम ड्राफ्ट मतदाता सूची से हटाया जा सकता है। जस्टिस ओक ने इसे गैरकानूनी बताते हुए कहा कि जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 और निर्वाचक पंजीकरण नियम, 1960 में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है, जो सिर्फ फॉर्म जमा नहीं करने के आधार पर नाम हटाने की अनुमति देता हो।

उन्होंने जोर दिया कि मतदाता सूची से किसी का नाम हटाने के लिए कानून में निर्धारित प्रक्रिया का पालन करना जरूरी है। उनके अनुसार, संबंधित प्रावधान के तहत व्यक्ति को कारण बताओ नोटिस दिया जाना चाहिए और अपना पक्ष रखने का अवसर मिलना चाहिए। इसके बाद ही उचित निर्णय लिया जा सकता है।

जस्टिस ओक का कहना है कि यदि कोई मतदाता गणना फॉर्म जमा नहीं करता, तब भी उसका नाम ड्राफ्ट सूची में बनाए रखा जाना चाहिए। चुनाव आयोग जरूरत पड़ने पर उसे नोटिस जारी कर सकता है, उसका पक्ष सुन सकता है और फिर कानून के अनुसार फैसला ले सकता है।

आम मतदाता के लिहाज से यह सवाल महत्वपूर्ण है, क्योंकि मतदाता सूची में नाम दर्ज होना मतदान करने के लिए बुनियादी शर्त है। हालांकि, किसी व्यक्ति का नाम वास्तव में हटाया जा सकता है या नहीं, इसका निर्णय लागू कानून और संबंधित प्रक्रिया के आधार पर ही होगा।

फॉर्म 6 और फॉर्म 8 में बदलाव का अधिकार किसके पास?

जस्टिस अभय ओक ने मतदाता पंजीकरण से जुड़े फॉर्म 6 और फॉर्म 8 को लेकर भी अपनी राय रखी। उन्होंने कहा कि इन फॉर्म से संबंधित नियम बनाने का अधिकार केंद्र सरकार के पास है और चुनाव आयोग अपनी ओर से इनमें मनमाने ढंग से बदलाव नहीं कर सकता।

उनके मुताबिक, फॉर्म 6 और फॉर्म 8 संसद द्वारा बनाए गए कानून के तहत तैयार किए गए हैं। इसलिए इनमें कोई नई घोषणा या अतिरिक्त शर्त जोड़ने का फैसला कानून के मुताबिक ही होना चाहिए।

उन्होंने विशेष रूप से कहा कि इन फॉर्म को जमा करते समय किसी अतिरिक्त घोषणा की जरूरत होगी या नहीं, इस पर निर्णय लेने का अधिकार सरकार को है। यह विषय संसद द्वारा पारित कानून और उसके तहत बनाए गए नियमों से जुड़ा है।

जस्टिस ओक ने यह भी स्पष्ट किया कि संशोधित फॉर्म 6 में जोड़ी गई घोषणा पर पिछली कानूनी कार्यवाही के दौरान सुप्रीम कोर्ट में बहस नहीं हुई थी। इसलिए अदालत को उस समय इस विशेष मुद्दे पर टिप्पणी करने का अवसर नहीं मिला। उनके अनुसार, अब इस विषय पर भी विचार किया जा सकता है।

यह मुद्दा उन नागरिकों के लिए अहम है, जो मतदाता सूची में अपना नाम जुड़वाने या उसमें सुधार कराने के लिए निर्धारित फॉर्म का इस्तेमाल करते हैं। ऐसे मामलों में जरूरी दस्तावेजों और घोषणाओं की शर्तें स्पष्ट होना महत्वपूर्ण है।

नागरिकता तय करना चुनाव आयोग का अधिकार नहीं: जस्टिस ओक

जस्टिस ओक ने एक और महत्वपूर्ण सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि किसी व्यक्ति की भारतीय नागरिकता तय करना चुनाव आयोग का अधिकार नहीं है।

उनके मुताबिक, यदि किसी मतदाता का नाम इस आधार पर हटाया जाता है कि वह अपनी भारतीय नागरिकता साबित नहीं कर पाया, तो चुनाव आयोग के अधिकार क्षेत्र को लेकर गंभीर कानूनी सवाल खड़े होते हैं।

उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि किसी प्रक्रिया की वैधता बरकरार रहने का मतलब यह नहीं है कि उसे मनमाने तरीके से लागू करने की छूट मिल जाती है। यदि SIR को लागू करने के दौरान कानून और निर्धारित प्रक्रिया का पालन नहीं होता, तो अदालत हस्तक्षेप कर सकती है।

जस्टिस ओक के अनुसार, चुनाव आयोग को यह नहीं मानना चाहिए कि SIR को वैध ठहराए जाने के बाद उसके क्रियान्वयन पर सवाल नहीं उठाए जा सकते।

आम मतदाताओं के लिए क्या है इसका मतलब?

इस पूरी बहस का सबसे अहम पहलू यह है कि मतदाता सूची में नाम जोड़ने या हटाने की प्रक्रिया पारदर्शी और कानून के अनुरूप होनी चाहिए। जस्टिस अभय ओक ने अपने इंटरव्यू में SIR के कानूनी आधार, गणना फॉर्म, मतदाताओं को सुनवाई का अवसर देने और नागरिकता संबंधी अधिकारों पर सवाल उठाए हैं।

हालांकि, उनकी टिप्पणियां सुप्रीम कोर्ट के फैसले को अपने आप नहीं बदलतीं। SIR की वैधता और उसके क्रियान्वयन को लेकर अंतिम कानूनी स्थिति संबंधित न्यायिक आदेशों से ही तय होगी। फिलहाल, यह मुद्दा चुनावी प्रक्रिया में कानून के पालन और मतदाताओं के अधिकारों को लेकर चल रही बहस को फिर चर्चा में ले आया है।