देश में हालिया विवादों के बीच Supreme Court of India के जज Ujjal Bhuyan ने एक अहम संदेश दिया है। उन्होंने साफ कहा कि भारतीय संविधान के तहत किसी भी व्यक्ति, खासकर सार्वजनिक पद पर बैठे प्रतिनिधियों के लिए किसी खास समुदाय को निशाना बनाना स्वीकार्य नहीं है। गुजरात के Gujarat National Law University में आयोजित एक व्याख्यान के दौरान उन्होंने ‘भाईचारे’ यानी fraternity को संविधान का मूल मूल्य बताते हुए कहा कि हर नागरिक का कर्तव्य है कि वह जाति, धर्म या भाषा के आधार पर भेदभाव न करे।
फिल्म विवाद से उठी बहस, ‘घुसखोर पंडित’ केस का जिक्र
अपने संबोधन में जस्टिस भुइयां ने हाल ही में विवादों में रही फिल्म ‘Ghuskhor Pandat’ का जिक्र किया। इस फिल्म के नाम पर आरोप लगा था कि यह ब्राह्मण समुदाय को गलत तरीके से पेश कर रही है। उन्होंने कहा कि अगर फैसला केवल उनके हाथ में होता, तो वे इस याचिका को तुरंत खारिज कर देते। हालांकि बाद में फिल्म के निर्माताओं ने खुद ही टाइटल वापस लेने की बात कही। फिर भी जस्टिस भुइयां इस मामले से पूरी तरह संतुष्ट नहीं थे। उन्होंने अपने लिखित मत में यह स्पष्ट किया कि समाज में भाईचारे और सम्मान की भावना बनाए रखना हर नागरिक का संवैधानिक दायित्व है।
सोशल मीडिया पोस्ट और नेताओं की जिम्मेदारी पर सवाल
जस्टिस भुइयां ने असम के मुख्यमंत्री Himanta Biswa Sarma से जुड़े एक विवाद का भी जिक्र किया। सोशल मीडिया पर एक पोस्ट में उन्हें एक विशेष समुदाय को निशाना बनाते हुए दिखाया गया था, जिस पर काफी विवाद हुआ। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं को हाई कोर्ट जाने को कहा, जहां बाद में नोटिस जारी हुआ। जस्टिस भुइयां ने इस उदाहरण के जरिए यह सवाल उठाया कि क्या सार्वजनिक जीवन में जिम्मेदारी का स्तर कम होता जा रहा है? उनका इशारा साफ था कि नेताओं को अपने शब्दों और कार्यों के प्रति अधिक सजग रहना चाहिए।
डॉ. आंबेडकर के विचारों से जुड़ा बड़ा सवाल
अपने भाषण में उन्होंने B. R. Ambedkar के विचारों का जिक्र करते हुए एक महत्वपूर्ण सवाल उठाया—क्या ‘भाईचारे’ का सिद्धांत केवल समाज में पहले से मजबूत वर्गों की स्थिति बनाए रखने के लिए इस्तेमाल हो रहा है? उन्होंने कहा कि अगर ऐसा है, तो यह संविधान की मूल भावना के खिलाफ होगा। इसके साथ ही उन्होंने न्यायपालिका में महिलाओं, खासकर वंचित समुदायों से आने वाली महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने की जरूरत पर भी जोर दिया। उनका मानना है कि इससे न्याय व्यवस्था ज्यादा समावेशी और लोकतांत्रिक बनेगी।
न्यायपालिका में महिलाओं की भागीदारी पर भी उठी चिंता
जस्टिस भुइयां ने कहा कि मौजूदा समय में न्यायपालिका और वकालत दोनों ही क्षेत्रों में महिलाओं की संख्या कम है, खासकर वरिष्ठ पदों पर। उन्होंने सुझाव दिया कि जजों की नियुक्ति करने वाली collegium प्रणाली में महिला जज को विशेष आमंत्रित सदस्य के रूप में शामिल किया जाए, ताकि निर्णय लेने में विविध दृष्टिकोण सामने आ सकें। यह टिप्पणी ऐसे समय आई है जब देश में न्यायिक सुधार और प्रतिनिधित्व को लेकर बहस तेज हो रही है।
समाज और संविधान के बीच संतुलन का संदेश
जस्टिस भुइयां का यह बयान केवल एक टिप्पणी नहीं, बल्कि समाज के लिए एक चेतावनी भी है। आज जब सोशल मीडिया और राजनीतिक बयानबाजी का असर तेजी से बढ़ रहा है, ऐसे में संविधान के मूल सिद्धांत—समानता, गरिमा और भाईचारा—को बनाए रखना पहले से ज्यादा जरूरी हो गया है।


