7 अप्रैल से सुप्रीम कोर्ट में ‘सबरीमाला’ पर ऐतिहासिक सुनवाई, 9 जज तय करेंगे धर्म बनाम समानता की सीमा

7 अप्रैल से सुप्रीम कोर्ट में ‘सबरीमाला’ पर ऐतिहासिक सुनवाई, 9 जज तय करेंगे धर्म बनाम समानता की सीमा

देश के सबसे चर्चित धार्मिक-वैधानिक विवादों में शामिल सबरीमाला मामले पर अब एक नई और निर्णायक सुनवाई शुरू होने जा रही है। Supreme Court of India 7 अप्रैल से इस मामले पर सुनवाई करेगा। इस बार मामला एक 9 जजों की संविधान पीठ के सामने रखा जाएगा, जिसकी अध्यक्षता मुख्य न्यायाधीश Surya Kant करेंगे। यह सुनवाई सिर्फ मंदिर प्रवेश तक सीमित नहीं है, बल्कि यह तय करेगी कि धर्म, समानता और व्यक्तिगत अधिकारों के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। इसका असर देशभर के कई धार्मिक मामलों पर पड़ सकता है।

9 जजों की बेंच, बड़े संवैधानिक सवालों पर होगी बहस

इस संविधान पीठ में जस्टिस बी.वी. नागरत्ना, जस्टिस एम.एम. सुंद्रेश, जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह, जस्टिस अरविंद कुमार, जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह, जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले, जस्टिस आर. महादेवन और जस्टिस जॉयमल्या बागची शामिल हैं। पीठ जिन मुद्दों पर विचार करेगी, वे बेहद व्यापक हैं। इनमें धर्म की स्वतंत्रता, समानता का अधिकार, गरिमा और न्यायिक समीक्षा की सीमा जैसे अहम सवाल शामिल हैं। इस मामले में All India Muslim Personal Law Board और कुछ जैन संगठनों ने भी अपनी राय रखी है, जिससे साफ है कि इसका प्रभाव कई धर्मों की परंपराओं तक जा सकता है।

2018 का फैसला बना विवाद की जड़, क्या था मामला

यह पूरा विवाद 2018 के उस फैसले से जुड़ा है, जब सुप्रीम कोर्ट ने Sabarimala Temple में सभी उम्र की महिलाओं के प्रवेश की अनुमति दे दी थी। कोर्ट ने तब कहा था कि आस्था को लैंगिक भेदभाव के आधार पर नहीं बांटा जा सकता। उस समय तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश Dipak Misra और अन्य जजों ने बहुमत से यह फैसला दिया था, जबकि जस्टिस Indu Malhotra ने असहमति जताई थी। इसके बाद इस फैसले के खिलाफ कई पुनर्विचार याचिकाएं दायर हुईं, जिससे मामला और जटिल हो गया।

अब सिर्फ सबरीमाला नहीं, कई धार्मिक प्रथाओं पर असर

2019 में एक बड़ी पीठ ने कहा कि सबरीमाला से जुड़े सवाल अन्य धार्मिक मामलों से भी जुड़े हैं। इनमें मस्जिदों में महिलाओं का प्रवेश, दाऊदी बोहरा समुदाय में बहिष्कार की प्रथा और पारसी महिलाओं के मंदिर प्रवेश जैसे मुद्दे शामिल हैं। इसी वजह से मामला 9 जजों की बड़ी पीठ को भेजा गया, ताकि व्यापक संवैधानिक व्याख्या हो सके। अब कोर्ट यह तय करेगा कि धार्मिक प्रथाओं पर न्यायालय कितना हस्तक्षेप कर सकता है और “संवैधानिक नैतिकता” की सीमा क्या होगी।

आम लोगों के लिए क्यों अहम है यह फैसला

यह मामला केवल एक मंदिर तक सीमित नहीं है। इसका सीधा असर देश के हर नागरिक के अधिकारों पर पड़ सकता है। अगर कोर्ट धार्मिक परंपराओं और मौलिक अधिकारों के बीच नई व्याख्या करता है, तो भविष्य में कई पुराने नियम बदल सकते हैं। इसलिए 7 अप्रैल से शुरू होने वाली यह सुनवाई भारतीय संविधान और समाज दोनों के लिए एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हो सकती है।