कांवड़ यात्रा सिर्फआस्था नहीं, ₹1,500 करोड़ का कारोबार! यूपी में ऐसे घूमता है ‘भगवा इकोनॉमी’ का पहिया

कांवड़ यात्रा सिर्फआस्था नहीं, ₹1,500 करोड़ का कारोबार! यूपी में ऐसे घूमता है ‘भगवा इकोनॉमी’ का पहिया

सावन आते ही उत्तर प्रदेश की सड़कों पर कांवड़ियों का सैलाब दिखाई देता है। भगवा कपड़े, कांवड़, बोल बम के जयकारे और शिवालयों की ओर बढ़ते लाखों कदमों के बीच एक बड़ा आर्थिक पहिया भी घूमता है। होटल, ढाबे, रोडवेज, फल-सब्जी, पूजा सामग्री, कपड़े, दवा, पानी से लेकर छोटे दुकानदारों तक, कांवड़ यात्रा कई कारोबारों के लिए कमाई का बड़ा सीजन बन जाती है। लखनऊ के गिरी इंस्टीट्यूट ऑफ डेवलपमेंट स्टडीज की 2024 की शोध रिपोर्ट के मुताबिक, यूपी में कांवड़ यात्रा करीब 1,000 करोड़ रुपये से ज्यादा का कारोबार पैदा करती है। इस साल कारोबारी हलकों का अनुमान करीब 1,500 करोड़ रुपये की आर्थिक गतिविधि तक पहुंचने का है।

यानी कांवड़ यात्रा को सिर्फ धार्मिक आयोजन के तौर पर देखने से इसकी पूरी तस्वीर सामने नहीं आती। इसके साथ एक ऐसी अस्थायी अर्थव्यवस्था खड़ी होती है, जिसमें बड़े कारोबारी ही नहीं, बल्कि सड़क किनारे दुकान लगाने वाला छोटा विक्रेता और रोज कमाने वाला मजदूर भी शामिल होता है।

2017 के बाद बढ़ा कांवड़ियों का दबाव, कारोबार को भी मिला विस्तार

कांवड़ यात्रा के दौरान श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ने के साथ उससे जुड़े कारोबार का दायरा भी बढ़ा है। 2017 के बाद कांवड़ यात्रियों की संख्या में तेज वृद्धि के साथ होटल, ढाबे, परिवहन, टेंट, पूजा सामग्री और स्थानीय बाजारों में गतिविधियां बढ़ी हैं।

इसका असर यात्रा मार्गों पर साफ दिखाई देता है। बारिश हो तो रेनकोट और चप्पलों की बिक्री बढ़ जाती है। गर्मी और उमस बढ़े तो पानी, बर्फ और ग्लूकोज की मांग तेज हो जाती है। फल और दवा बेचने वाले दुकानदारों के लिए भी यह अतिरिक्त बिक्री का मौका बन जाता है।

यानी एक कांवड़िया जब यात्रा पर निकलता है तो उसका खर्च सिर्फ यात्रा तक सीमित नहीं रहता। रास्ते में वह भोजन करता है, पानी खरीदता है, पूजा सामग्री लेता है और जरूरत पड़ने पर कपड़े या दूसरी चीजें भी खरीदता है। यही छोटे-छोटे खर्च मिलकर एक बड़ा आर्थिक कारोबार तैयार करते हैं।

भगवा टी-शर्ट से स्टील कलश तक, बाजार में बढ़ी मांग

कांवड़ यात्रा का सीधा असर वस्त्र और पूजा सामग्री के कारोबार पर भी दिखता है। कारोबारियों के मुताबिक, महादेव से जुड़े संदेशों वाली भगवा टी-शर्ट, गमछे और वाटरप्रूफ मोबाइल कवर की मांग इस बार तेज है।

महादेव के स्लोगन वाली टी-शर्ट खास तौर पर युवाओं में लोकप्रिय हैं। इनकी कीमत करीब 80 रुपये से 500 रुपये तक बताई गई है। इसके अलावा जलाभिषेक में इस्तेमाल होने वाले सजावटी स्टील कलश की मांग भी बढ़ती है।

खानपान का कारोबार इस पूरी अर्थव्यवस्था का सबसे बड़ा हिस्सा बन जाता है। कांवड़ मार्गों पर ढाबों और अस्थायी भोजन केंद्रों में काम बढ़ने से स्थानीय स्तर पर रोजगार के मौके भी बनते हैं।

जो श्रमिक सामान्य दिनों में छोटी-मोटी दिहाड़ी पर निर्भर रहता है, उसे यात्रा के दौरान ढाबों पर काम करके करीब 600 रुपये तक प्रतिदिन कमाने का मौका मिल सकता है। इसके साथ दो वक्त का भोजन भी मिल जाता है। यही वजह है कि कांवड़ यात्रा का आर्थिक असर सिर्फ दुकानदारों तक सीमित नहीं रहता।

60 रोडवेज बसों से लेकर छोटे दुकानदारों तक, पूरा सिस्टम एक्टिव

कांवड़ यात्रा के दौरान परिवहन व्यवस्था भी बड़े स्तर पर सक्रिय होती है। मुजफ्फरनगर डिपो से हरिद्वार मार्ग पर करीब 60 रोडवेज बसों का नियमित संचालन होता है। यात्रा के दौरान यात्रियों की संख्या बढ़ने पर बसों की संख्या बढ़ाने की योजना भी बनाई जाती है।

इससे साफ होता है कि एक धार्मिक आयोजन किस तरह कई अलग-अलग क्षेत्रों में आर्थिक गतिविधि पैदा करता है। बसों के संचालन से लेकर होटल, ढाबे, टेंट, दुकान और स्थानीय मजदूरी तक, एक पूरा सप्लाई चेन जैसा तंत्र कुछ समय के लिए तेज हो जाता है।

यूपी सरकार भी कांवड़ यात्रा को सिर्फ धार्मिक आयोजन की तरह नहीं, बल्कि धार्मिक पर्यटन के बड़े मॉडल के हिस्से के रूप में देख रही है। अयोध्या, नैमिषारण्य, चित्रकूट, विंध्याचल और वाराणसी जैसे धार्मिक केंद्रों को पर्यटन से जोड़ने की कोशिश इसी व्यापक रणनीति का हिस्सा है।

सुरक्षा और कारोबार के बीच संतुलन, सरकार का माइक्रो प्लान

इतने बड़े पैमाने पर होने वाली यात्रा के लिए केवल कारोबार बढ़ाना पर्याप्त नहीं है। सुरक्षा, यातायात और स्थानीय व्यवस्था भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है। इसी वजह से सरकार ने कांवड़ मार्गों के लिए माइक्रो प्लान तैयार किया है।

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अधिकारियों को कांवड़ मार्गों पर मांस और शराब की दुकानें बंद रखने के निर्देश दिए हैं। खान-पान की दुकानों पर फूड लाइसेंस और रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट स्पष्ट रूप से प्रदर्शित करने को कहा गया है। डीजे की आवाज भी निर्धारित मानकों के भीतर रखने के निर्देश हैं।

इन व्यवस्थाओं का मकसद यात्रा के दौरान सुरक्षा और सुविधा बनाए रखना है। दूसरी तरफ, सरकार धार्मिक पर्यटन को आर्थिक गतिविधियों से जोड़ने की कोशिश कर रही है।

इसी कड़ी में ‘विजिट माय स्टेट’ अभियान और सुगम दर्शन जैसी पहल के जरिए अयोध्या, नैमिषारण्य, चित्रकूट और विंध्याचल जैसे धार्मिक स्थलों को नियमित पर्यटन और वीकेंड यात्रा पैकेजों से जोड़ने की बात सामने आई है।

कांवड़ यात्रा इसी बड़े मॉडल का एक उदाहरण बनती दिख रही है। यहां बिना किसी बड़े नए पूंजीगत निवेश के, लाखों श्रद्धालुओं की आवाजाही से होटल, परिवहन, खानपान, खुदरा कारोबार और असंगठित क्षेत्र में आर्थिक गतिविधि पैदा होती है।

यही वजह है कि उत्तर प्रदेश के एक ट्रिलियन डॉलर अर्थव्यवस्था के लक्ष्य के संदर्भ में धार्मिक पर्यटन को अहम माना जा रहा है। कांवड़ यात्रा से पैदा होने वाला कारोबार भले ही एक सीमित अवधि के लिए हो, लेकिन इसका फायदा समाज के अलग-अलग हिस्सों तक पहुंचता है।

आस्था का यह आर्थिक पक्ष बताता है कि किसी बड़े धार्मिक आयोजन का असर मंदिर और श्रद्धालुओं तक सीमित नहीं रहता। उसके साथ बाजार चलता है, रोजगार बनता है और स्थानीय अर्थव्यवस्था में पैसा घूमता है। कांवड़ यात्रा इसी ‘आस्था और अर्थव्यवस्था’ के मेल का बड़ा उदाहरण बनकर सामने आती है।