दिल्ली हाई कोर्ट में सोमवार को अरविंद केजरीवाल से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान एक तरफ कानूनी बहस का गंभीर माहौल था, तो दूसरी ओर एक अप्रत्याशित तकनीकी रुकावट ने कुछ पल के लिए वातावरण को हल्का भी कर दिया। अदालत ने केजरीवाल और अन्य आरोपियों की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें जज से खुद को मामले से अलग करने की मांग की गई थी। इस फैसले के साथ कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया कि सुनवाई उसी बेंच के समक्ष जारी रहेगी।
याचिका खारिज: कोर्ट ने पक्षपात के आरोपों को नहीं माना
जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने विस्तृत आदेश पढ़ते हुए कहा कि याचिका में लगाए गए पक्षपात के आरोप ठोस आधार पर खरे नहीं उतरते। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि किसी जज पर इस तरह के आरोप केवल व्यक्ति विशेष तक सीमित नहीं रहते, बल्कि पूरी न्यायिक व्यवस्था पर सवाल खड़े करते हैं।
करीब एक घंटे से अधिक समय तक अदालत ने विस्तार से अपना पक्ष रखा और केजरीवाल की दलीलों को क्रमवार खारिज किया। अदालत का रुख साफ था—मामले की सुनवाई बिना किसी दबाव के आगे बढ़ेगी।
मामले की पृष्ठभूमि: क्यों उठी थी यह मांग
यह पूरा विवाद शराब नीति से जुड़े केस के संदर्भ में सामने आया है। ट्रायल कोर्ट ने इस मामले में केजरीवाल समेत 23 आरोपियों को आरोपमुक्त कर दिया था, जिसे सीबीआई ने हाई कोर्ट में चुनौती दी है।
इसी बीच, केजरीवाल ने अदालत से अनुरोध किया था कि इस केस की सुनवाई किसी अन्य बेंच को सौंपी जाए। इसके लिए उन्होंने पहले मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखा और बाद में औपचारिक याचिका दाखिल की। सोमवार को उसी याचिका पर अंतिम निर्णय आया।
इंटरनेट बंद, और कोर्ट में हल्का हुआ माहौल
सुनवाई के दौरान एक दिलचस्प मोड़ तब आया जब अचानक कोर्ट का इंटरनेट कनेक्शन बाधित हो गया। वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए जुड़े सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता का संपर्क टूट गया, जिससे कुछ समय के लिए कार्यवाही रुक गई।
इस दौरान जस्टिस शर्मा ने शांत भाव से कहा कि वह तकनीकी समस्या के ठीक होने का इंतजार करेंगी। जब कुछ लोग उठने लगे, तो उन्होंने स्पष्ट किया कि वह अपनी ड्यूटी पूरी किए बिना नहीं जाएंगी।
इसी बीच उन्होंने हल्के अंदाज में कहा कि इंटरनेट की समस्या का पता सीबीआई से लगवाया जाए। इस टिप्पणी ने अदालत में मौजूद लोगों के चेहरे पर मुस्कान ला दी और कुछ पल के लिए माहौल सहज हो गया।
संदेश साफ: प्रक्रिया जारी रहेगी
तकनीकी रुकावट के बाद जैसे ही इंटरनेट सेवा बहाल हुई, अदालत ने बिना समय गंवाए कार्यवाही फिर शुरू कर दी। यह पूरा घटनाक्रम यह दिखाता है कि न्यायिक प्रक्रिया में व्यवधान चाहे तकनीकी हो या कानूनी, अदालत उसे संतुलित तरीके से संभालती है।
इस फैसले का असर सिर्फ एक केस तक सीमित नहीं है। यह न्यायिक प्रक्रिया की निरंतरता और संस्थागत मजबूती का भी संकेत देता है। वहीं, सुनवाई के दौरान घटा छोटा सा प्रसंग यह याद दिलाता है कि गंभीर माहौल में भी मानवीय संवेदनाएं अपनी जगह बनाए रखती हैं।

