महिला आरक्षण को लेकर चल रही राष्ट्रीय बहस के बीच समाजवादी पार्टी ने एक नया राजनीतिक दांव चल दिया है। पार्टी ने साफ कर दिया है कि वह संसद में प्राइवेट मेंबर बिल लाकर OBC और मुस्लिम महिलाओं के लिए अलग से आरक्षण की मांग उठाएगी। यह कदम ऐसे समय में आया है जब महिला आरक्षण कानून और परिसीमन को लेकर सत्ता और विपक्ष आमने-सामने हैं।
यह मुद्दा सीधे तौर पर उन वर्गों के प्रतिनिधित्व से जुड़ा है, जिनकी भागीदारी को लेकर लंबे समय से सवाल उठते रहे हैं। ऐसे में यह प्रस्ताव आने वाले दिनों में संसद की बहस को और तीखा बना सकता है।
सपा का ऐलान: ‘कोटे के भीतर कोटा’ की मांग
समाजवादी पार्टी के सांसद धर्मेंद्र यादव ने स्पष्ट किया है कि उनकी पार्टी एक प्राइवेट मेंबर बिल पेश करेगी। इसमें महिला आरक्षण के दायरे में OBC और मुस्लिम महिलाओं के लिए अलग से सीटें सुरक्षित करने की मांग की जाएगी।
उनका तर्क है कि मौजूदा महिला आरक्षण व्यवस्था में इन वर्गों के लिए कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं है, जो एक बड़ी कमी है। पार्टी का मानना है कि सामाजिक न्याय तभी संभव है, जब सभी वर्गों को समान अवसर मिले।
सरकार पर देरी और नीयत को लेकर सवाल
धर्मेंद्र यादव ने सरकार की मंशा और प्रक्रिया दोनों पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि 2023 में महिला आरक्षण कानून को समर्थन मिला था, लेकिन इसके नोटिफिकेशन में तीन साल की देरी क्यों हुई, यह स्पष्ट नहीं है।
उन्होंने यह भी पूछा कि अगर आरक्षण को 2011 की जनगणना के आधार पर ही लागू करना है, तो नया विधेयक लाने की जरूरत क्या थी। यह सवाल सिर्फ प्रक्रिया का नहीं, बल्कि नीति की स्पष्टता का भी है।
परिसीमन पर भी उठे गंभीर सवाल
सपा ने परिसीमन को लेकर भी सरकार को घेरा है। धर्मेंद्र यादव ने जम्मू-कश्मीर और असम का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां परिसीमन के बाद राजनीतिक संतुलन बदला है और विपक्ष कमजोर हुआ है।
उनका कहना है कि इसी वजह से अब देश के बाकी हिस्सों में भी परिसीमन को लेकर आशंकाएं बढ़ रही हैं। यह मुद्दा सिर्फ सीटों की संख्या का नहीं, बल्कि राजनीतिक प्रतिनिधित्व और संतुलन का भी है।
प्राइवेट मेंबर बिल क्या होता है और क्यों अहम है
प्राइवेट मेंबर बिल वह प्रस्ताव होता है जिसे कोई भी सांसद, जो मंत्री नहीं है, संसद में पेश कर सकता है। आमतौर पर ऐसे बिल जनहित से जुड़े मुद्दों को उठाने के लिए लाए जाते हैं।
सपा पहले भी लोकसभा में इस मांग को उठा चुकी है। उस समय गृह मंत्री अमित शाह ने स्पष्ट किया था कि धर्म के आधार पर आरक्षण का प्रावधान संविधान में नहीं है। उन्होंने यह भी कहा था कि यदि किसी पार्टी को चिंता है, तो वह अपने स्तर पर टिकट वितरण में बदलाव कर सकती है।
अब देखना होगा कि सपा का यह प्रस्ताव संसद में कितना समर्थन जुटा पाता है। लेकिन इतना तय है कि महिला आरक्षण का मुद्दा अब सिर्फ संख्या तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसमें सामाजिक और राजनीतिक संतुलन की नई परतें जुड़ गई हैं।


