दिल्ली की पटियाला हाउस कोर्ट ने वरिष्ठ अधिवक्ता महमूद प्राचा के खिलाफ उनकी चल संपत्ति कुर्क करने का आदेश जारी किया है। यह कार्रवाई उस ₹6 लाख की लागत (कॉस्ट) का भुगतान नहीं करने के मामले में हुई है, जो अयोध्या फैसले को चुनौती देने वाली उनकी याचिका खारिज होने के बाद उन पर लगाई गई थी।
कोर्ट ने कहा कि कई अवसर दिए जाने के बावजूद महमूद प्राचा ने न तो कोई आपत्ति दाखिल की और न ही तय राशि का भुगतान किया। ऐसे में अदालत ने उनकी चल संपत्ति को कुर्क करने के लिए अटैचमेंट वारंट जारी करने का आदेश दिया।
यह रकम नई दिल्ली जिला विधिक सेवा प्राधिकरण (NDLSA) को दी जानी है, जिसने इस आदेश को लागू कराने के लिए निष्पादन (Execution) की कार्यवाही शुरू की थी।
कोर्ट ने क्यों जारी किया अटैचमेंट वारंट?
पटियाला हाउस कोर्ट की जज मेधा आर्या ने 14 अगस्त 2026 को यह आदेश पारित किया। अदालत ने कहा कि प्राचा को कई बार जवाब दाखिल करने का मौका दिया गया था, लेकिन उन्होंने कोई आपत्ति दर्ज नहीं कराई।
इसी आधार पर कोर्ट ने उनकी चल संपत्ति को डिक्री की राशि तक कुर्क करने का निर्देश दिया। अदालत ने बेलिफ (Bailiff) को जरूरत पड़ने पर ताले तोड़कर भी कुर्की की कार्रवाई करने की अनुमति दी है।
कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि कुर्की की तारीख तय करने से पहले डिक्रीधारक संबंधित नजारत शाखा से समन्वय करेगा। मामले की अगली सुनवाई 27 अगस्त को अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष और 1 अक्टूबर 2026 को जज मेधा आर्या के समक्ष होगी।
कैसे बढ़कर ₹6 लाख तक पहुंची लागत?
पूरा मामला उस दीवानी मुकदमे से जुड़ा है, जिसमें महमूद प्राचा ने सुप्रीम कोर्ट के 9 नवंबर 2019 के अयोध्या फैसले को “शून्य और अमान्य” घोषित करने की मांग की थी।
ट्रायल कोर्ट ने अप्रैल 2025 में इस मुकदमे को खारिज करते हुए उन पर ₹1 लाख की लागत लगाई थी। इसके बाद प्राचा ने जिला न्यायाधीश धर्मेंद्र राणा की अदालत में अपील दायर की।
अपील भी खारिज हो गई। इसके साथ ही अदालत ने अतिरिक्त ₹5 लाख की लागत लगा दी। इस तरह कुल राशि ₹6 लाख हो गई।
जिला अदालत ने अपने फैसले में कहा था कि पहले लगाई गई लागत निरर्थक मुकदमों पर रोक लगाने के उद्देश्य को पूरा नहीं कर सकी, इसलिए राशि बढ़ाना जरूरी था।
पूर्व CJI चंद्रचूड़ के कथित बयान पर आधारित थी याचिका
प्राचा की याचिका का आधार पूर्व मुख्य न्यायाधीश डी.वाई. चंद्रचूड़ का वर्ष 2024 में पुणे में दिया गया एक सार्वजनिक संबोधन बताया गया था।
याचिका में दावा किया गया था कि पूर्व CJI ने कहा था कि अयोध्या मामले के फैसले से पहले उन्हें भगवान श्री रामलला विराजमान से समाधान मिला था। इसी आधार पर प्राचा ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले को अमान्य घोषित करने और मामले की दोबारा सुनवाई कराने की मांग की थी।
हालांकि जिला अदालत ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने कहा कि ईश्वर से मार्गदर्शन लेना किसी भी दृष्टि से धोखाधड़ी या अनुचित लाभ हासिल करने का कृत्य नहीं माना जा सकता।
कोर्ट ने कहा- यह न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग था
अदालत ने यह भी पाया कि महमूद प्राचा मूल अयोध्या विवाद के पक्षकार नहीं थे, इसलिए उनके पास इस मुकदमे के लिए वैध कारण (Cause of Action) नहीं था।
कोर्ट ने पूर्व CJI चंद्रचूड़ को सेवानिवृत्ति के तुरंत बाद मामले में पक्षकार बनाने की कोशिश पर भी सवाल उठाए और इसे उनके उद्देश्य पर संदेह पैदा करने वाला कदम बताया।
जिला न्यायाधीश ने अपने फैसले में इस मुकदमे को “न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग” करार दिया था। अदालत ने कहा था कि पहले से लंबित मामलों के बोझ से जूझ रही न्याय व्यवस्था निरर्थक और विलासितापूर्ण मुकदमों का अतिरिक्त बोझ नहीं उठा सकती।
फिलहाल पटियाला हाउस कोर्ट का ताजा आदेश केवल ₹6 लाख की लागत की वसूली से जुड़ा है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि भुगतान न होने के कारण अब चल संपत्ति कुर्क कर राशि की वसूली की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जाएगी।

