दो ज्यूडिशियल अधिकारियों के बीच चल रहे वैवाहिक विवाद से जुड़े आपराधिक मामले में पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने CBI जांच की मांग खारिज कर दी है। हरियाणा के महेंद्रगढ़ में तैनात एक ज्यूडिशियल अधिकारी ने अपनी पत्नी के कथित प्रेमी के खिलाफ दर्ज FIR की जांच केंद्रीय जांच ब्यूरो को सौंपने की मांग की थी। उनका आरोप था कि स्थानीय पुलिस ने शिकायत की जांच में कई अहम पहलुओं पर पर्याप्त कार्रवाई नहीं की। हालांकि हाईकोर्ट ने कहा कि इस मामले में ऐसे दुर्लभ और असाधारण हालात नजर नहीं आते, जिनमें जांच CBI को ट्रांसफर करना जरूरी हो।
जस्टिस शालिनी सिंह नागपाल ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल इसलिए किसी जांच एजेंसी की निष्पक्षता पर संदेह नहीं किया जा सकता कि पुलिस ने आरोपी की कस्टडी नहीं मांगी या जांच अधिकारी जमानत की सुनवाई के दौरान अदालत में मौजूद नहीं था।
पत्नी और कथित प्रेमी पर क्या आरोप लगाए गए?
याचिकाकर्ता हरियाणा में ज्यूडिशियल अधिकारी के पद पर तैनात हैं। उनकी पत्नी भी न्यायिक अधिकारी हैं। याचिकाकर्ता का आरोप है कि उनकी पत्नी और उनके कथित प्रेमी ने उनके होम पियोन के जरिए उनके खिलाफ एक शिकायत करवाई थी।
उनके मुताबिक, इस शिकायत की जांच की गई और आरोपों को आधारहीन पाए जाने के बाद क्लोजर रिपोर्ट दाखिल कर दी गई। इसके बावजूद विवाद खत्म नहीं हुआ।
याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया कि उनकी पत्नी के कथित प्रेमी ने हिसार के एक होटल में प्रेस कॉन्फ्रेंस की। वहां पहले लगाए जा चुके आरोपों को फिर से सार्वजनिक किया गया। उनका दावा था कि कुछ मीडिया संस्थानों को पैसे देकर इन आरोपों का प्रचार कराया गया, ताकि उनकी एक न्यायिक अधिकारी के रूप में छवि खराब हो और वैवाहिक विवाद में उन पर दबाव बनाया जा सके।
याचिकाकर्ता ने शादी को आपसी सहमति से समाप्त करने और अपनी पांच साल की बेटी से मिलने के अधिकार की मांग का भी जिक्र किया।
जान से मारने की धमकी का आरोप, FIR में क्या हुआ?
याचिकाकर्ता ने यह भी दावा किया कि उन्हें खुली तौर पर जान से मारने की धमकी दी गई। उनका कहना था कि उन्हें खुद के साथ-साथ अपने बुजुर्ग माता-पिता की सुरक्षा को लेकर भी खतरा महसूस हुआ।
इसी शिकायत के आधार पर हिसार के सिविल लाइंस पुलिस स्टेशन में BNS की धाराओं 356(2), 351(2) और 308(2) के तहत FIR दर्ज की गई।
लेकिन याचिकाकर्ता ने पुलिस जांच पर कई सवाल उठाए। उनका कहना था कि FIR दर्ज करने में 37 दिन की देरी हुई और उनकी शिकायत में लगाए गए सभी आरोपों को FIR में शामिल नहीं किया गया।
उन्होंने दावा किया कि जांच एजेंसी को ऑडियो रिकॉर्डिंग, उसकी ट्रांसक्रिप्ट, CCTV फुटेज और फोन लोकेशन से जुड़ा डेटा उपलब्ध कराया गया था। इसके बावजूद पुलिस ने आरोपी की पुलिस रिमांड लेने या जरूरी सामान की रिकवरी की दिशा में कदम नहीं उठाया। उनके मुताबिक, पुलिस ने सिर्फ न्यायिक हिरासत की मांग की।
याचिकाकर्ता ने यह भी आरोप लगाया कि जांच अधिकारी आरोपी की जमानत याचिका पर सुनवाई के दौरान मौजूद नहीं थे। बाद में आरोपी को जमानत मिल गई।
हाईकोर्ट ने CBI जांच क्यों नहीं मानी जरूरी?
याचिकाकर्ता की ओर से यह भी कहा गया कि पुलिस ने होम पियोन का पता लगाने, CCTV फुटेज जुटाने, पत्रकारों को गवाह बनाने, आरोपी का लैपटॉप जब्त करने या कॉल डिटेल रिकॉर्ड हासिल करने जैसे कदम नहीं उठाए। कथित मानहानिकारक सोशल मीडिया पोस्ट की प्रतियां जुटाने की कोशिश भी नहीं की गई।
इन दलीलों के बावजूद हाईकोर्ट ने जांच CBI को सौंपने से इनकार कर दिया।
कोर्ट ने ‘हिमांशु कुमार बनाम छत्तीसगढ़ राज्य (2023)’ समेत संबंधित फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि CBI को जांच सौंपना सामान्य प्रक्रिया नहीं है। यह एक असाधारण अधिकार है और इसका इस्तेमाल बहुत कम तथा सावधानी के साथ किया जाना चाहिए।
कोर्ट के मुताबिक, CBI जांच तब जरूरी हो सकती है जब जांच की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल हों, जनता का भरोसा प्रभावित हो रहा हो, मामले का राष्ट्रीय या अंतरराष्ट्रीय असर हो, राज्य के प्रभावशाली अधिकारी जांच को प्रभावित करने की स्थिति में हों या जांच पहली नजर में ही पक्षपातपूर्ण दिखाई दे।
‘पुलिस ने रिमांड नहीं मांगी’ से ही पक्षपात साबित नहीं होता
हाईकोर्ट ने कहा कि इस मामले में पुलिस की ओर से आरोपी की कस्टडी नहीं मांगना अपने आप में जांच की निष्पक्षता पर संदेह करने के लिए पर्याप्त आधार नहीं है। इसी तरह जमानत की सुनवाई में जांच अधिकारी का मौजूद न होना भी पुलिस की निष्पक्षता पर सवाल खड़ा करने के लिए पर्याप्त नहीं माना जा सकता।
कोर्ट ने आपराधिक शिकायत में लगाए गए आरोपों की सच्चाई या मामले के गुण-दोष पर कोई अंतिम राय नहीं दी। उसने केवल यह तय किया कि मौजूदा परिस्थितियों में जांच को CBI को सौंपने की जरूरत है या नहीं।
अदालत ने पूरे विवाद को मूल रूप से दो न्यायिक अधिकारियों के बीच चल रहे कड़वे वैवाहिक विवाद से जुड़ा मामला माना। इसलिए CBI जांच के लिए जरूरी असाधारण परिस्थितियां मौजूद नहीं पाईं।
इस फैसले का व्यापक संदेश यह है कि किसी मामले में स्थानीय पुलिस की कार्रवाई से असहमति होना और जांच को CBI को सौंपने लायक असाधारण स्थिति होना, दोनों अलग-अलग बातें हैं। केवल जांच के तरीके पर सवाल उठने से हर मामले में केंद्रीय एजेंसी की जांच का रास्ता नहीं खुल जाता।
Case Title: X v. State of Haryana and others

