कांग्रेस में ओबीसी राजनीति को लेकर हलचल तेज होती दिख रही है। दिल्ली में हुई एक अहम बैठक में राहुल गांधी ने पार्टी के ओबीसी नेताओं को स्पष्ट संदेश दिया कि अगर वे संगठित होकर अपनी बात रखें, तो पार्टी स्तर पर उसे मजबूती से आगे बढ़ाया जाएगा। यह बैठक सिर्फ औपचारिक चर्चा नहीं थी, बल्कि आने वाले समय की राजनीतिक रणनीति तय करने का मंच भी बनी।
बैठक में क्या हुआ: एकजुटता पर जोर
राष्ट्रीय ओबीसी कांग्रेस एडवाइजरी काउंसिल की इस बैठक में राहुल गांधी ने नेताओं से सीधे कहा कि अलग-अलग आवाज उठाने के बजाय सामूहिक रूप से मुद्दे रखें। सूत्रों के मुताबिक, उन्होंने यह भी संकेत दिया कि मजबूत और संगठित प्रस्तुति से ही पार्टी के भीतर निर्णय तेजी से लागू हो सकते हैं।
बैठक में मौजूद नेताओं ने ओबीसी मुद्दों को उठाने में राहुल गांधी की सक्रियता की सराहना की और भविष्य की रणनीति पर चर्चा की। यह भी कहा गया कि राजनीतिक दबाव के चलते ही जातिगत जनगणना जैसे मुद्दों पर सरकार को कदम उठाने पड़े।
जातिगत जनगणना और महिला आरक्षण पर फोकस
इस बैठक का मुख्य एजेंडा जातिगत जनगणना और महिला आरक्षण से जुड़ा रहा। कांग्रेस नेताओं ने यह रुख दोहराया कि पार्टी ओबीसी वर्ग के लिए आरक्षण में स्पष्ट हिस्सेदारी की पक्षधर है, खासकर महिलाओं के संदर्भ में।
नेताओं का कहना था कि इन मुद्दों को अब सिर्फ संसद तक सीमित नहीं रखा जाएगा, बल्कि जनता के बीच ले जाकर राजनीतिक संवाद का हिस्सा बनाया जाएगा।
जमीनी स्तर तक रणनीति ले जाने की तैयारी
बैठक में यह भी तय हुआ कि राज्य स्तर पर बड़े कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। इसकी शुरुआत उत्तर प्रदेश से करने की योजना है। पार्टी इन मुद्दों को बूथ स्तर तक ले जाकर ओबीसी समुदाय के बीच अपनी स्थिति मजबूत करना चाहती है।
इसके तहत यह संदेश देने की कोशिश होगी कि कांग्रेस ने लगातार दबाव बनाकर सरकार को जातिगत जनगणना जैसे फैसले लेने के लिए मजबूर किया।
वरिष्ठ नेताओं का समर्थन और राजनीतिक संकेत
बैठक में अशोक गहलोत, सचिन पायलट और भूपेश बघेल जैसे वरिष्ठ नेता भी शामिल हुए। इन नेताओं ने राहुल गांधी के नेतृत्व को ओबीसी हितों के लिए अहम बताते हुए कहा कि पार्टी इस मुद्दे पर लगातार सक्रिय रहेगी।
यह पूरी कवायद संकेत देती है कि कांग्रेस आने वाले चुनावों को ध्यान में रखते हुए ओबीसी राजनीति को केंद्र में रखकर रणनीति तैयार कर रही है। जातिगत जनगणना और महिला आरक्षण जैसे मुद्दे अब सिर्फ नीतिगत बहस नहीं, बल्कि चुनावी एजेंडा बनते जा रहे हैं।


