SIR यानी स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन को लेकर सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर अब पूर्व न्यायाधीश जस्टिस वी. गोपाल गौड़ा ने गंभीर सवाल उठाए हैं। उन्होंने आरोप लगाया है कि चुनाव आयोग ने अदालत के सामने तथ्यों को गलत तरीके से पेश किया और इसी आधार पर SIR को लेकर फैसला आया। जस्टिस गौड़ा का कहना है कि अगर बाद में यह सामने आता है कि आयोग ने महत्वपूर्ण तथ्य छिपाए या गलत जानकारी दी, तो सुप्रीम कोर्ट को मामले का खुद संज्ञान लेकर अपने पुराने फैसले पर पुनर्विचार करना चाहिए। उन्होंने आयोग से SIR से जुड़े सभी रिकॉर्ड और दस्तावेज तलब करने की मांग भी की है।
पूर्व जस्टिस ने फैसले की वैधता पर ही उठाया सवाल
जस्टिस गोपाल गौड़ा के मुताबिक, SIR को लेकर सुप्रीम कोर्ट का फैसला सिर्फ प्रक्रिया का सामान्य मामला नहीं है। इसमें फैसले की वैधता से जुड़े गंभीर सवाल भी उठते हैं।
उन्होंने कहा कि यह स्पष्ट किया जाना जरूरी है कि SIR लागू करने का निर्णय पूरे चुनाव आयोग ने लिया था या नहीं। साथ ही यह भी सामने आना चाहिए कि क्या आयोग के सभी संबंधित चुनाव आयुक्तों की सहमति और मंजूरी से यह फैसला हुआ था।
उनका तर्क है कि अगर दस्तावेजों से यह पता चलता है कि SIR का निर्णय निर्धारित प्रक्रिया और आयोग के पूर्ण गठन की सहमति के अनुरूप नहीं लिया गया था, तो सुप्रीम कोर्ट के सामने अपने पहले फैसले की समीक्षा करने या उसे वापस लेने का आधार बन सकता है।
‘आयोग से सभी रिकॉर्ड मंगाए जाएं’
पूर्व न्यायाधीश ने मांग की है कि सुप्रीम कोर्ट को चुनाव आयोग से SIR से जुड़े सभी दस्तावेज और रिकॉर्ड मंगाने चाहिए।
इन रिकॉर्ड के जरिए यह स्पष्ट किया जा सकेगा कि SIR को लागू करने का निर्णय किस प्रक्रिया से लिया गया। क्या यह निर्णय चुनाव आयोग की पूरी पीठ ने लिया था? क्या संबंधित चुनाव आयुक्तों ने इसे मंजूरी दी थी? और क्या निर्णय लेते समय निर्धारित संवैधानिक और कानूनी प्रक्रिया का पालन हुआ?
जस्टिस गौड़ा का मानना है कि इन सवालों के जवाब सामने आने के बाद ही यह तय करना संभव होगा कि सुप्रीम कोर्ट के पहले फैसले पर पुनर्विचार की जरूरत है या नहीं।
उन्होंने SIR को लेकर सुप्रीम कोर्ट के 27 मई के फैसले को भी कड़ी भाषा में निशाना बनाया। उनके अनुसार, अगर प्रक्रिया में गंभीर कानूनी खामियां सामने आती हैं तो फैसले को जारी रखना उचित नहीं होगा।
42 रिटायर्ड जजों ने किया SIR का बचाव
जस्टिस गौड़ा की टिप्पणी ऐसे समय आई है जब 42 सेवानिवृत्त न्यायाधीशों के एक समूह ने SIR का बचाव किया है। इस समूह ने इसे कानूनी प्रक्रिया के तौर पर देखा है।
वहीं जस्टिस गौड़ा ने बेंगलुरु में एक प्रदर्शन के दौरान अपनी राय रखी। यह प्रदर्शन कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) की ओर से SIR के दौरान मतदाताओं के नाम हटाए जाने के विरोध में आयोजित किया गया था।
जस्टिस गौड़ा ने वहां कहा कि SIR की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखने वाला सुप्रीम कोर्ट का 27 मई का फैसला उनके मुताबिक गैर-कानूनी, गैर-संवैधानिक और अलोकतांत्रिक है। उन्होंने इसे तत्काल रद्द किए जाने की मांग की।
इस तरह SIR को लेकर न्यायिक जगत से भी अलग-अलग राय सामने आ रही है। एक तरफ कुछ पूर्व न्यायाधीश इसे कानूनी प्रक्रिया के रूप में देखते हैं, तो दूसरी तरफ जस्टिस गौड़ा जैसे पूर्व न्यायाधीश इसकी संवैधानिक वैधता और प्रक्रिया पर सवाल उठा रहे हैं।
मताधिकार से जुड़े सवाल पर भी जताई चिंता
जस्टिस गौड़ा ने सुप्रीम कोर्ट के मौजूदा न्यायाधीश जस्टिस उज्जल भुइयां की हालिया टिप्पणी का भी समर्थन किया। उन्होंने कहा कि मतदाताओं के बड़े पैमाने पर मताधिकार से वंचित होने की आशंका के खिलाफ आवाज उठाना न्यायिक मर्यादा का उल्लंघन नहीं माना जाना चाहिए।
जस्टिस भुइयां ने हाल में कहा था कि ऐसी कोई भी प्रक्रिया, जिसके कारण लाखों नागरिक अपने मताधिकार से वंचित हो जाएं, संवैधानिक व्यवस्था के खिलाफ होगी।
यही वजह है कि SIR का मुद्दा अब सिर्फ चुनावी सूची के संशोधन तक सीमित नहीं रह गया है। इसमें मतदाता के अधिकार, चुनाव आयोग की निर्णय प्रक्रिया और न्यायिक समीक्षा जैसे सवाल भी जुड़ गए हैं।
फिलहाल जस्टिस गोपाल गौड़ा की मांग यह है कि सुप्रीम कोर्ट पहले चुनाव आयोग से SIR से जुड़े पूरे रिकॉर्ड मंगाए और फिर यह देखा जाए कि फैसला जिस आधार पर दिया गया था, वह तथ्यात्मक और कानूनी रूप से कितना सही था। हालांकि, ये सभी सवाल फिलहाल पूर्व न्यायाधीश की ओर से उठाए गए हैं और इन्हें सुप्रीम कोर्ट के किसी नए आदेश के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

