सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में साल 2019 के दौरान 75 वकीलों को दिए गए ‘सीनियर एडवोकेट’ के दर्जे को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दी है। इस फैसले के साथ अदालत ने साफ कर दिया कि पुराने चयन पर दोबारा कानूनी विवाद खड़ा करने के बजाय जिन वकीलों को वरिष्ठ अधिवक्ता का दर्जा नहीं मिला, उन्हें नए सिरे से आवेदन करना चाहिए। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि ऐसे आवेदनों पर ‘जितेंद्र कल्ला’ मामले में तय किए गए कानूनी सिद्धांतों के मुताबिक विचार किया जाएगा। यानी अब संबंधित वकीलों के पास नए चयन की प्रक्रिया में शामिल होने का रास्ता खुला रहेगा, लेकिन 2019 में हुए चयन को चुनौती देकर बदलवाने की मांग स्वीकार नहीं की गई है।
2019 में 75 वकीलों को मिला था सीनियर एडवोकेट का दर्जा
यह मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट में वरिष्ठ अधिवक्ताओं के चयन से जुड़ा है। साल 2019 में हाईकोर्ट ने सीनियर एडवोकेट का दर्जा देने के लिए आवेदन मांगे थे। इसके बाद तत्कालीन चीफ जस्टिस की अध्यक्षता वाली स्थायी समिति ने चयन के लिए अंक आधारित मानदंड तैयार किया था।
समिति ने तय किया था कि 75 में से कम से कम 45 अंक हासिल करने वाले वकीलों के नाम ही फुल कोर्ट यानी हाईकोर्ट के सभी जजों के सामने विचार के लिए भेजे जाएंगे। कुल 78 वकीलों के नाम फुल कोर्ट को भेजे गए, जिनमें से 75 वकीलों को सीनियर एडवोकेट का दर्जा दिया गया।
हालांकि, इस चयन प्रक्रिया पर सवाल उठने लगे। आरोप था कि कुछ योग्य वकीलों को पर्याप्त अनुभव और लगातार वकालत के बावजूद वरिष्ठ अधिवक्ता के पदनाम के लिए मौका नहीं मिला।
15 साल की वकालत के बाद भी नहीं मिला दर्जा, सुप्रीम कोर्ट में पहुंचा मामला
वकील विष्णु बिहारी तिवारी ने 2019 में हुए चयन को चुनौती दी थी। उनका कहना था कि उन्होंने इलाहाबाद हाईकोर्ट में 15 साल तक लगातार और बेदाग वकालत की, लेकिन इसके बावजूद उनके नाम पर उचित तरीके से विचार नहीं किया गया।
इस मामले में सितंबर 2024 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उनकी याचिका खारिज कर दी थी। हाईकोर्ट ने अपने आदेश में यह भी बताया था कि 2019 के बाद से किसी अन्य वकील को सीनियर एडवोकेट का दर्जा नहीं दिया गया है।
हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ तिवारी ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। इससे पहले इस मामले में जस्टिस अभय एस. ओक और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की पीठ ने सुनवाई के दौरान चयन प्रक्रिया पर सवाल उठाए थे। पीठ ने टिप्पणी की थी कि स्थायी समिति ने कुल अंकों को 100 से घटाकर 75 कर दिया था, जो ‘इंदिरा जयसिंह बनाम सुप्रीम कोर्ट’ मामले में निर्धारित कानूनी व्यवस्था के अनुरूप नहीं था।
सुप्रीम कोर्ट ने क्यों कहा- मुकदमेबाजी के बजाय दोबारा आवेदन करें?
शुक्रवार, 6 नवंबर को जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने इस मामले की सुनवाई की। याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील प्रणव सचदेवा ने दलील दी कि ‘जितेंद्र कल्ला बनाम स्टेट ऑफ एनसीटी’ मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बावजूद चयन समिति ने कई वर्षों से वरिष्ठ अधिवक्ताओं के चयन की प्रक्रिया पूरी नहीं की है।
इस फैसले में कहा गया था कि वरिष्ठ अधिवक्ताओं को नामित करने की प्रक्रिया प्रत्येक कैलेंडर वर्ष में कम से कम एक बार पूरी की जानी चाहिए।
हालांकि, मौजूदा मामले में जस्टिस नरसिम्हा ने याचिकाकर्ता को सलाह दी कि उन्हें कानूनी लड़ाई में उलझने के बजाय नए सिरे से आवेदन करना चाहिए।
पीठ ने कहा, ”आवेदन करें। आप कानूनी लड़ाई क्यों लड़ना चाहते हैं? आप फिर से आवेदन करें। बेवजह कानूनी विवाद में न पड़ें।”
अदालत ने अंततः इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया। साथ ही स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता दोबारा आवेदन कर सकते हैं और उनके आवेदन पर कानून के मुताबिक विचार किया जाएगा। इसमें ‘जितेंद्र कल्ला’ मामले में निर्धारित सिद्धांतों को भी ध्यान में रखना होगा।
‘जितेंद्र कल्ला’ फैसले से बदले वरिष्ठ अधिवक्ता चयन के नियम
इस पूरे विवाद को समझने के लिए ‘इंदिरा जयसिंह’ और ‘जितेंद्र कल्ला’ मामलों की पृष्ठभूमि भी महत्वपूर्ण है।
‘इंदिरा जयसिंह बनाम सुप्रीम कोर्ट’ मामले में वरिष्ठ अधिवक्ताओं के चयन को लेकर दिशा-निर्देश निर्धारित किए गए थे। इसी आधार पर हाईकोर्ट की स्थायी समिति को चयन के लिए मानदंड तैयार करने और उपयुक्त उम्मीदवारों को फुल कोर्ट के सामने रखने का अधिकार दिया गया था।
बाद में ‘इंदिरा जयसिंह’ मामले में 2023 के फैसले में हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट की स्वतः संज्ञान लेने की शक्तियों को भी बरकरार रखा गया। इसी दौरान यह स्पष्ट हुआ कि बिना इंटरव्यू के दिए गए सीनियर डेजिग्नेशन को चुनौती देने का अधिकार मुख्य रूप से उन उम्मीदवारों को होगा, जिन्हें चयन के लिए शॉर्टलिस्ट किया गया था।
इसके बाद ‘जितेंद्र कल्ला’ मामले में सुप्रीम कोर्ट ने वरिष्ठ अधिवक्ता चयन की प्रक्रिया की दोबारा समीक्षा की। जस्टिस अभय एस. ओक की अध्यक्षता वाली पीठ ने स्थायी समिति के स्तर पर होने वाली अंक आधारित मूल्यांकन और इंटरव्यू प्रक्रिया को समाप्त कर दिया।
अब मौजूदा मामले में सुप्रीम कोर्ट ने पुराने चयन को पलटने से इनकार करते हुए नए आवेदन का रास्ता साफ किया है। हालांकि, इस फैसले का सीधा असर आम लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी पर नहीं पड़ेगा, लेकिन न्यायपालिका और वकालत के क्षेत्र में वरिष्ठ अधिवक्ता का दर्जा पाने की प्रक्रिया को लेकर यह एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम है।
मामले का नाम: Vishnu Behari Tiwari v. High Court of Judicature at Allahabad



