सुप्रीम कोर्ट ने आर्बिट्रेशन कानून से जुड़े एक ऐसे सवाल को बड़ी बेंच के पास भेज दिया है, जिसका असर सरकारी ठेकों और कारोबारी विवादों पर दूरगामी हो सकता है। मामला इस बात से जुड़ा है कि क्या किसी ठेकेदार को आर्बिट्रेशन शुरू करने से पहले अपनी दावा राशि का 10% सुरक्षा जमा कराना कानूनी और संवैधानिक रूप से सही है।
जस्टिस मनमोहन और जस्टिस मनोज मिश्रा की पीठ ने कहा कि ऐसी शर्तें विवाद निपटाने के अधिकार को व्यावहारिक रूप से कमजोर कर सकती हैं। अदालत ने यह भी माना कि अत्यधिक बोझिल प्री-डिपॉजिट की शर्तें लोगों को आर्बिट्रेशन तक पहुंचने से रोक सकती हैं, जबकि इस व्यवस्था का उद्देश्य अदालतों पर मुकदमों का बोझ कम करना है।
अब यह मामला भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) के पास जाएगा, जो इसे बड़ी बेंच के समक्ष रखने पर फैसला करेंगे।
क्या है पूरा मामला, जिसने सुप्रीम कोर्ट को सोचने पर मजबूर किया?
विवाद हरियाणा स्टेट इंडस्ट्रियल एंड इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट कॉरपोरेशन लिमिटेड (HSIIDC) और एम/एस संतोष एसोसिएट प्राइवेट लिमिटेड के बीच हुए एक सरकारी ठेके से जुड़ा है।
साल 2016 में गुरुग्राम के उद्योग विहार फेज-7 में स्टॉर्म वाटर ड्रेनेज सिस्टम के निर्माण के लिए ई-टेंडर जारी किया गया था। कंपनी को मई 2017 में करीब 5.14 करोड़ रुपये का ठेका मिला। बाद में परियोजना का दायरा घटने के कारण अनुबंध राशि लगभग 2.40 करोड़ रुपये रह गई।
काम पूरा होने के बाद अंतिम भुगतान को लेकर दोनों पक्षों के बीच विवाद पैदा हुआ। हाईकोर्ट ने अगस्त 2024 में एकमात्र मध्यस्थ (Sole Arbitrator) नियुक्त किया, लेकिन आर्बिट्रेशन शुरू होते ही निगम ने अनुबंध की उस शर्त का हवाला दिया, जिसमें एक लाख रुपये से अधिक के दावे पर 10% सुरक्षा जमा करना अनिवार्य था।
जब कंपनी ने यह राशि जमा नहीं की तो पहले मध्यस्थ ने दावा खारिज कर दिया और बाद में कमर्शियल कोर्ट ने भी उस फैसले को बरकरार रखा।
10% जमा कराने की शर्त पर क्यों उठे संवैधानिक सवाल?
सुप्रीम कोर्ट में अपील के दौरान कंपनी ने दलील दी कि यह शर्त अनुच्छेद 14 का उल्लंघन करती है, क्योंकि केवल ठेकेदार पर प्री-डिपॉजिट का बोझ डाला गया है, जबकि सरकारी पक्ष पर ऐसी कोई बाध्यता नहीं है।
कंपनी ने उदाहरण देते हुए बताया कि यदि उसका दावा 1.77 करोड़ रुपये का है, तो उसे 17.70 लाख रुपये जमा कराने होंगे। जबकि इसी रकम के दीवानी मुकदमे में हरियाणा में कोर्ट फीस करीब 7.16 लाख रुपये होती। ऐसे में आर्बिट्रेशन, जो विवाद निपटाने का अपेक्षाकृत आसान रास्ता माना जाता है, कई मामलों में और महंगा पड़ सकता है।
अपीलकर्ता ने यह भी कहा कि झूठे या बढ़ा-चढ़ाकर किए गए दावों पर रोक लगाने के लिए पहले से पैसा जमा कराना जरूरी नहीं है। आर्बिट्रेटर अंतिम फैसला देते समय लागत (Costs) लगाने का अधिकार पहले से रखता है।
पुराने फैसले पर सुप्रीम कोर्ट ने जताया संदेह
सुनवाई के दौरान अदालत ने 2009 के S.K. Jain बनाम हरियाणा राज्य फैसले पर भी सवाल उठाए। उस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने रिफंडेबल प्री-डिपॉजिट को वैध माना था और कहा था कि इससे फर्जी दावों पर रोक लगती है।
हालांकि मौजूदा पीठ ने कहा कि वह दो-न्यायाधीशों की बेंच होने के कारण उस फैसले को सीधे खारिज नहीं कर सकती। लेकिन अदालत ने यह जरूर माना कि बाद के फैसलों—ICOMM Tele, Lombardi Engineering और CORE—में आर्बिट्रेशन तक समान और न्यायसंगत पहुंच पर अधिक जोर दिया गया है।
पीठ ने यह भी याद दिलाया कि भारत में किसी व्यक्ति का अदालत जाने या कानूनी उपाय अपनाने का अधिकार सामान्य सिद्धांत है और अनुबंध के जरिए ऐसी शर्तें नहीं थोपी जा सकतीं जो इस अधिकार को केवल कागजों तक सीमित कर दें।
अब बड़ी बेंच तय करेगी छह अहम सवालों का जवाब
सुप्रीम कोर्ट ने मामले को बड़ी बेंच के पास भेजते हुए छह महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्न तय किए हैं। इनमें यह शामिल है कि क्या केवल ठेकेदार से प्री-डिपॉजिट लेना आर्बिट्रेशन एक्ट की धारा 18 में निहित समान व्यवहार के सिद्धांत के खिलाफ है, क्या ऐसी शर्तें वैकल्पिक विवाद निपटान व्यवस्था को कमजोर करती हैं, क्या यह अनुच्छेद 14 और भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 28 के विपरीत है और क्या रिफंडेबल प्री-डिपॉजिट को भी वैध माना जा सकता है।
बड़ी बेंच का फैसला आने वाले समय में सरकारी ठेकों, निर्माण परियोजनाओं और कॉरपोरेट विवादों में आर्बिट्रेशन क्लॉज की वैधता तय करने के लिए महत्वपूर्ण मिसाल बन सकता है। खास तौर पर उन ठेकेदारों और कंपनियों के लिए, जो बड़ी दावा राशि के कारण पहले ही आर्थिक दबाव झेल रहे होते हैं।


