कोर्ट में जमा रकम पर सुप्रीम कोर्ट की बड़ी पहल, लॉ कमीशन से कानून बनाने की जरूरत जांचने को कहा

कोर्ट में जमा रकम पर सुप्रीम कोर्ट की बड़ी पहल, लॉ कमीशन से कानून बनाने की जरूरत जांचने को कहा

अदालत में किसी मुकदमे के दौरान जमा की गई बड़ी रकम आखिर कहां रखी जाए, उस पर कितना ब्याज मिले और पैसा कब व किस प्रक्रिया से संबंधित पक्ष को वापस किया जाए—इन सवालों के जवाब अब हर कोर्ट में एक जैसे नहीं हैं। इसी अंतर को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने भारत के लॉ कमीशन से इस पूरे सिस्टम की समीक्षा करने को कहा है। जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की बेंच ने कहा कि अदालतों और ट्रिब्यूनलों में जमा रकम के मैनेजमेंट, निवेश और भुगतान की प्रक्रिया में एकरूपता लाने के लिए उचित कानून बनाने की जरूरत पर विचार होना चाहिए।

कहां पैसा FD में, कहीं दूसरी व्यवस्था; सुप्रीम कोर्ट ने पकड़ी बड़ी असमानता

सुप्रीम कोर्ट के सामने मामला सिर्फ एक रकम जमा करने की प्रक्रिया का नहीं था। सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि अलग-अलग हाई कोर्ट और न्यायिक संस्थानों में कोर्ट डिपॉजिट को संभालने के तरीके अलग-अलग हैं।

दिल्ली हाई कोर्ट में रजिस्ट्री जमा रकम को फिक्स्ड डिपॉजिट में रखती है। इलाहाबाद हाई कोर्ट में इसे स्टेट बैंक ऑफ इंडिया में जमा करने की व्यवस्था है। बॉम्बे हाई कोर्ट में प्रोथोनोटरी और सीनियर मास्टर से जुड़ी व्यवस्था अपनाई गई है। पंजाब एंड हरियाणा हाई कोर्ट ने एग्जीक्यूटिंग कोर्ट को राष्ट्रीयकृत बैंकों में रकम को फिक्स्ड डिपॉजिट में रखने के निर्देश दिए हैं।

सुप्रीम कोर्ट में जमा रकम राष्ट्रीयकृत बैंकों में सरकारी डिपॉजिट के जरिए रखी जाती है, जबकि कलकत्ता और मद्रास हाई कोर्ट में रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया से जुड़ी व्यवस्थाएं मौजूद हैं।

यानी एक जैसी स्थिति में मुकदमा लड़ रहे दो पक्षों के पैसे को अलग-अलग जगह और अलग-अलग नियमों के तहत संभाला जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने इसी अंतर को गंभीरता से लिया है।

मामला क्या था और ब्याज को लेकर क्यों उठा सवाल?

यह मामला दिल्ली हाई कोर्ट के उस फैसले के खिलाफ अपील से जुड़ा था, जिसमें आर्बिट्रल अवार्ड की रकम कोर्ट में जमा करने के बावजूद अवार्ड-देनदार की ब्याज देनदारी को बरकरार रखा गया था।

अदालत के सामने सवाल था कि अवार्ड की रकम जमा होने के बाद भी उस पर ब्याज की जिम्मेदारी किस तरह तय होगी। दिल्ली हाई कोर्ट ने माना था कि अवार्ड की तारीख से लेकर रकम को अवार्ड-धारक को ट्रांसफर किए जाने तक ब्याज देय रहेगा।

इसी सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने व्यापक समस्या पर ध्यान दिया। अदालत ने कहा कि सिर्फ पैसा जमा कर देना पर्याप्त नहीं है। उसके निवेश, ब्याज, नवीनीकरण, निकासी और दोबारा निवेश की प्रक्रिया भी स्पष्ट होनी चाहिए।

इसका सीधा संबंध ‘Time Value of Money’ यानी समय के साथ पैसे के मूल्य से है। लंबे समय तक किसी कोर्ट या ट्रिब्यूनल में बड़ी रकम पड़ी रहे तो उसके प्रबंधन और उस पर मिलने वाले रिटर्न का सीधा वित्तीय असर संबंधित पक्षों पर पड़ सकता है।

कॉमन प्लेटफॉर्म से बदल सकता है पूरा सिस्टम

सुप्रीम कोर्ट ने एक साझा प्लेटफॉर्म की संभावना पर भी जोर दिया। अदालत की सोच है कि अलग-अलग कोर्ट और ट्रिब्यूनल में जमा रकम को एक मानकीकृत व्यवस्था के तहत एकत्र किया जा सकता है और फिर मुकदमेबाजों के हित में उपयुक्त वित्तीय साधन में निवेश किया जा सकता है।

ऐसी व्यवस्था से ब्याज दरों को लेकर अधिक स्पष्टता आ सकती है। साथ ही कोर्ट और ट्रिब्यूनल की रजिस्ट्री पर रकम के अलग-अलग निवेश और प्रबंधन का प्रशासनिक बोझ भी कम हो सकता है।

कोर्ट ने कहा कि जमा रकम की आर्थिक अखंडता बनाए रखने के लिए उसकी देखरेख और उस पर ब्याज देने की प्रक्रिया में स्पष्टता जरूरी है। अलग-अलग नियमों के कारण एक जैसे मामलों में अलग परिणाम आने की स्थिति बन सकती है और इससे निवेश, अकाउंटिंग तथा ब्याज को लेकर नए विवाद पैदा हो सकते हैं।

अब लॉ कमीशन करेगा समीक्षा, RBI और सरकार से भी सलाह

सुप्रीम कोर्ट ने लॉ कमीशन से कहा है कि वह इस फैसले में सामने आए सभी मुद्दों की जांच करे। साथ ही दूसरे देशों में कोर्ट डिपॉजिट से जुड़े कानूनों और व्यवस्थाओं का भी अध्ययन किया जाए।

अदालत ने यह भी कहा कि इस प्रक्रिया में RBI, वित्त मंत्रालय और कानून एवं न्याय मंत्रालय से परामर्श किया जाए। रजिस्ट्री को फैसले की प्रति लॉ कमीशन के चेयरमैन, RBI गवर्नर और दोनों संबंधित मंत्रालयों के सचिवों को भेजने का निर्देश दिया गया है।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने 2023 के के.एल. सुनेजा बनाम डॉ. मंजीत कौर मोंगा मामले का भी हवाला दिया। उस मामले में कोर्ट ने न्यायिक मंचों पर जमा रकम को बैंक या वित्तीय संस्थान में सुरक्षित रखने के लिए एक समान दिशानिर्देशों की जरूरत पर जोर दिया था।

मौजूदा मामले में कोर्ट की पहल का व्यापक उद्देश्य यही है कि अदालत में जमा रकम केवल सुरक्षित ही न रहे, बल्कि उसके प्रबंधन, निवेश और ब्याज को लेकर पूरे देश में अधिक स्पष्ट और एक समान व्यवस्था विकसित हो। अगर आगे इस दिशा में कानून या मानकीकृत व्यवस्था बनती है, तो इसका असर उन तमाम मुकदमेबाजों पर पड़ सकता है जिनकी बड़ी रकम लंबे समय तक कोर्ट या ट्रिब्यूनल में जमा रहती है।