बच्चों के यौन शोषण से जुड़ी ऑनलाइन सामग्री पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, सोशल मीडिया कंपनियों को 2 घंटे में देनी होगी रिपोर्ट

बच्चों के यौन शोषण से जुड़ी ऑनलाइन सामग्री पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, सोशल मीडिया कंपनियों को 2 घंटे में देनी होगी रिपोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने इंटरनेट पर बच्चों के यौन शोषण से जुड़ी सामग्री के प्रसार को रोकने के लिए बड़ा कदम उठाया है। अदालत ने केंद्र सरकार को ऐसी सामग्री की पहचान करने और उसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म से हटाने के लिए एक व्यापक राष्ट्रीय डेटाबेस तैयार करने का निर्देश दिया है। साथ ही, सोशल मीडिया कंपनियों को ऐसी सामग्री हटाने के बाद संबंधित अधिकारियों को तय समय में सूचना देनी होगी। कुछ मामलों में यह समयसीमा महज दो घंटे की होगी। अदालत का यह कदम इसलिए अहम है, क्योंकि एक प्लेटफॉर्म से आपत्तिजनक सामग्री हटने के बावजूद वही सामग्री दूसरे प्लेटफॉर्म पर दोबारा अपलोड होकर सामने आ सकती है।

एक प्लेटफॉर्म से हटने के बाद दूसरे पर क्यों दिखती है सामग्री?

सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने इंटरनेट पर बच्चों के यौन शोषण और दुर्व्यवहार से जुड़ी सामग्री यानी CSEAM के प्रसार पर चिंता जताई। अदालत ने कहा कि मौजूदा व्यवस्था में काफी हद तक शिकायत मिलने के बाद सामग्री हटाने पर जोर दिया जाता है। अलग-अलग सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के बीच पर्याप्त तालमेल नहीं होने से समस्या पूरी तरह खत्म नहीं हो पाती।

मसलन, किसी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर ऐसी सामग्री की पहचान होने के बाद उसे हटा दिया जाता है, लेकिन वही सामग्री किसी दूसरे प्लेटफॉर्म पर मौजूद रह सकती है। वहां उसकी पहचान और उसे हटाने की प्रक्रिया दोबारा शुरू करनी पड़ती है। इससे कार्रवाई में देरी होती है और बच्चों की सुरक्षा से जुड़ा जोखिम बना रहता है।

अदालत ने कहा कि नियामक संस्थाओं और सोशल मीडिया कंपनियों की ओर से प्रभावी पहल की जरूरत है। इसी को ध्यान में रखते हुए पीठ ने केंद्र सरकार को ऐसी सामग्री के खिलाफ साझा व्यवस्था बनाने के निर्देश दिए हैं।

राष्ट्रीय डेटाबेस में क्या होगा? तस्वीरें और वीडियो नहीं रखे जाएंगे

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से ऐसा राष्ट्रीय डेटाबेस तैयार करने को कहा है, जिसमें पुष्टि की गई CSEAM सामग्री के डिजिटल हैश और URL दर्ज हों। इसे मौजूदा सहयोग पोर्टल के भीतर बनाया जा सकता है या इसके लिए अलग व्यवस्था तैयार की जा सकती है।

डिजिटल हैश किसी डिजिटल फाइल की पहचान करने वाला एक विशिष्ट कोड होता है। इसकी मदद से यह पता लगाया जा सकता है कि किसी तस्वीर या वीडियो की वही प्रति दोबारा अपलोड की गई है या नहीं। वहीं, URL उस इंटरनेट पते की पहचान करता है, जहां सामग्री उपलब्ध है।

अदालत ने स्पष्ट किया कि डेटाबेस में ऐसी सामग्री की तस्वीरें या वीडियो खुद जमा नहीं किए जाएंगे। इसमें केवल पुष्टि किए गए डिजिटल हैश और URL शामिल होंगे।

डेटाबेस में किसी सामग्री को दर्ज करने से पहले उसकी कई स्तरों पर जांच भी जरूरी होगी। शुरुआती छंटाई के लिए सॉफ्टवेयर की मदद ली जा सकती है, लेकिन अंतिम निर्णय कम से कम तीन प्रशिक्षित मानव विश्लेषकों को स्वतंत्र रूप से करना होगा।

इस व्यवस्था के साथ अदालत ने गलत पहचान से वैध सामग्री हटाए जाने की आशंका को भी ध्यान में रखा है। इसके लिए जांच का रिकॉर्ड रखने, डेटाबेस तक पहुंच का लॉग तैयार करने, स्वतंत्र ऑडिट कराने और गलत प्रविष्टियों को तुरंत हटाने जैसे सुरक्षा उपाय अपनाने होंगे। यदि किसी व्यक्ति को डेटाबेस में दर्ज प्रविष्टि के आधार पर सामग्री हटाए जाने पर आपत्ति है, तो उसके लिए प्रभावी शिकायत निवारण व्यवस्था भी बनाई जानी चाहिए।

सोशल मीडिया कंपनियों के लिए दो घंटे की समयसीमा, शिकायतों पर 24 घंटे में जवाब

अदालत ने स्पष्ट किया कि सोशल मीडिया कंपनियां केवल सामग्री हटाकर या विदेशी संगठनों को इसकी जानकारी देकर भारतीय कानून के तहत अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकतीं। उन्हें संबंधित भारतीय अधिकारियों को भी सूचना देनी होगी।

सुप्रीम कोर्ट ने यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण अधिनियम (POCSO Act) के नियम 11 का उल्लेख करते हुए कहा कि परिस्थितियों के अनुसार ऐसी सामग्री की जानकारी विशेष किशोर पुलिस इकाई, स्थानीय पुलिस या साइबर अपराध पोर्टल को दी जानी चाहिए।

अदालत ने रिपोर्टिंग के लिए अलग-अलग समयसीमाएं तय की हैं।

  • खुद की जांच में सामग्री मिलने पर: यदि प्लेटफॉर्म अपनी जांच के दौरान ऐसी सामग्री हटाता है और उसका स्रोत अज्ञात है, तो हटाने के दो घंटे के भीतर संबंधित अधिकारियों को सूचना देनी होगी।
  • शिकायत मिलने के बाद सामग्री हटाने पर: शिकायत का निपटारा होते ही रिपोर्ट देनी होगी। किसी भी स्थिति में यह समयसीमा शिकायत के निपटारे के दो घंटे से आगे नहीं जा सकती।
  • राष्ट्रीय डेटाबेस से मिलान होने पर: डेटाबेस में पहले से दर्ज सामग्री से मिलान के कारण की गई कार्रवाई की समेकित रिपोर्ट हर सप्ताह संबंधित प्राधिकरण को देनी होगी।

इसके अलावा, सोशल मीडिया कंपनियों को अपनी वेबसाइट और ऐप पर शिकायत अधिकारियों की जानकारी तथा शिकायत दर्ज करने की प्रक्रिया प्रमुखता से दिखानी होगी। बच्चों के यौन शोषण से जुड़ी शिकायतों के लिए अलग श्रेणी भी उपलब्ध करानी होगी।

हर शिकायत की समीक्षा प्रशिक्षित शिकायत अधिकारी करेंगे। स्वचालित तकनीकी उपकरण शुरुआती छंटाई में मदद कर सकते हैं, लेकिन उन्हें अंतिम निर्णय का विकल्प नहीं बनाया जाना चाहिए। शिकायत मिलने के 24 घंटे के भीतर उसकी प्राप्ति की पुष्टि करना और शिकायतकर्ता को एक संदर्भ संख्या देना भी जरूरी होगा। साथ ही, शिकायत पर लिए गए फैसले और उसके कारणों की जानकारी देनी होगी।

नियम तोड़ने पर आर्थिक दंड और बच्चों के लिए डिजिटल सुरक्षा शिक्षा पर जोर

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से सूचना प्रौद्योगिकी नियमों में जरूरी संशोधन करने को कहा है, ताकि जवाबदेही से जुड़े ये प्रावधान सभी संबंधित मध्यस्थों पर लागू किए जा सकें। अदालत ने नियमों का पालन नहीं करने वाले प्लेटफॉर्म के खिलाफ कड़ी आर्थिक दंड व्यवस्था बनाने पर भी विचार करने का निर्देश दिया।

दंड तय करते समय उल्लंघन की गंभीरता, उसकी अवधि, बार-बार नियम तोड़ने की स्थिति और संबंधित कंपनी के आकार तथा कारोबार को ध्यान में रखने की बात कही गई है।

पीठ ने भुगतान के बाद उपलब्ध होने वाली सामग्री और सदस्यता आधारित सेवाओं की निगरानी पर भी जोर दिया। केंद्र सरकार से ऐसी सेवाओं के लिए दिशा-निर्देश बनाने और यह विचार करने को कहा गया है कि पेवॉल या सदस्यता के जरिए बच्चों के यौन शोषण से जुड़ी सामग्री के प्रसार से कमाई गई राशि जब्त करके वापस ली जानी चाहिए या नहीं।

अदालत का मानना है कि बच्चों को ऑनलाइन सुरक्षित रखने के लिए सिर्फ तकनीकी उपाय पर्याप्त नहीं हैं। उन्हें उम्र के अनुसार सुरक्षित और असुरक्षित स्पर्श, सहमति, स्वस्थ संबंधों, निजी डेटा की सुरक्षा और ऑनलाइन दुर्व्यवहार की शिकायत करने के तरीकों के बारे में भी जागरूक करना जरूरी है।

इसी दिशा में सुप्रीम कोर्ट ने सुझाव दिया कि डिजिटल सुरक्षा और उम्र के अनुरूप यौन शिक्षा को स्कूलों के पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया जाए। राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (NCERT) और राज्य शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषदों (SCERT) को बाल मनोवैज्ञानिकों, शिक्षकों और अभिभावक विशेषज्ञों की मदद से ऐसी पाठ्य सामग्री विकसित करने की जरूरत बताई गई है।

अदालत ने केंद्र सरकार को इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय तथा कानून एवं न्याय मंत्रालय के माध्यम से जरूरी दिशा-निर्देश, मानक संचालन प्रक्रियाएं और कानूनी संशोधन तैयार करने के लिए कदम उठाने को कहा है। केंद्र सरकार को इन निर्देशों के अनुपालन में हुई प्रगति पर हलफनामा दाखिल करना होगा। मामले की अगली सुनवाई 10 दिसंबर 2026 को निर्धारित की गई है।

आम लोगों के लिए इसका क्या मतलब है?

इन निर्देशों का उद्देश्य बच्चों से जुड़ी आपत्तिजनक सामग्री को इंटरनेट पर बार-बार प्रसारित होने से रोकना और सोशल मीडिया कंपनियों को अधिक जवाबदेह बनाना है। साझा डेटाबेस, समयबद्ध रिपोर्टिंग और शिकायतों की निगरानी से ऐसी सामग्री की पहचान और उस पर कार्रवाई की प्रक्रिया अधिक प्रभावी हो सकती है। हालांकि, व्यवस्था कितनी सफल होगी, यह इसके सही क्रियान्वयन, जांच की गुणवत्ता और शिकायत निवारण प्रणाली पर निर्भर करेगा।