देश में गेहूं की कीमतों में तेजी ने आम परिवारों के बजट को लेकर चिंता बढ़ा दी है। पिछले करीब डेढ़ महीने में दिल्ली में गेहूं के दाम 5.24% बढ़कर 3,030 रुपये प्रति क्विंटल तक पहुंच गए हैं। हैरानी की बात यह है कि सरकारी गोदामों में गेहूं का भंडार पांच साल के उच्चतम स्तर पर है। इसके बावजूद बाजार में कीमतें ऊपर जा रही हैं। इसकी एक बड़ी वजह गेहूं के निर्यात पर चार साल से लागू प्रतिबंध हटना है। इसके अलावा आने वाले रबी सीजन में बुआई और उत्पादन को लेकर आशंकाएं, त्योहारी मांग और मिलों की खरीदारी भी कीमतों को सहारा दे रही हैं। यदि यह तेजी जारी रहती है, तो आटा, मैदा, सूजी, ब्रेड और बिस्कुट जैसे रोजमर्रा के खाद्य उत्पादों की कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है।
डेढ़ महीने में गेहूं कितना महंगा हुआ? जानिए प्रमुख मंडियों के भाव
भारत सरकार ने 24 अगस्त को गेहूं और उससे बने उत्पादों के निर्यात पर चार साल से जारी प्रतिबंध हटा दिया था। इसके बाद घरेलू बाजार में गेहूं की कीमतों में बढ़ोतरी दर्ज की गई।
उपलब्ध बाजार आंकड़ों के मुताबिक, 24 अगस्त को दिल्ली में गेहूं का भाव 2,879 रुपये प्रति क्विंटल था। 14 अक्टूबर तक यह बढ़कर 3,030 रुपये प्रति क्विंटल हो गया। यानी करीब डेढ़ महीने में कीमत 151 रुपये प्रति क्विंटल या 5.24% बढ़ गई।
दूसरी मंडियों में भी भाव बढ़े हैं, हालांकि तेजी की रफ्तार अलग-अलग रही।
मंडी |
24 अगस्त का भाव |
14 अक्टूबर का भाव |
|---|---|---|
| नई दिल्ली | ₹2,879 | ₹3,030 |
| कानपुर | ₹2,700 | ₹2,740 |
| राजकोट | ₹2,700 | ₹2,875 |
| कोटा | ₹2,725 | ₹2,740 |
| इंदौर | ₹2,725 | ₹2,812 |
<text color=”secondary” size=”xs”>भाव रुपये प्रति क्विंटल में हैं। स्रोत: रिपोर्ट में उद्धृत NCDEX के आंकड़े।</text>
इन आंकड़ों से साफ है कि गेहूं की कीमतों में बढ़ोतरी केवल दिल्ली तक सीमित नहीं है। हालांकि, अलग-अलग मंडियों में मांग, आपूर्ति और कारोबार की परिस्थितियों के कारण कीमतों में अंतर बना हुआ है।
सरकारी गोदामों में रिकॉर्ड स्टॉक, फिर भी क्यों बढ़ रहे हैं दाम?
आमतौर पर बाजार में किसी अनाज का पर्याप्त भंडार होने से कीमतों पर दबाव कम रहने की उम्मीद की जाती है। लेकिन गेहूं के मामले में फिलहाल तस्वीर कुछ अलग है।
भारतीय खाद्य निगम (FCI) के आंकड़ों के अनुसार, 1 सितंबर तक सरकारी गोदामों में गेहूं का भंडार 479 लाख टन था। यह पिछले पांच साल का उच्चतम स्तर बताया गया है। पिछले साल इसी अवधि में सरकारी स्टॉक 332.97 लाख टन था।
यानी इस बार सरकारी भंडार पिछले साल के मुकाबले काफी अधिक है। फिर भी बाजार में भाव बढ़ने के पीछे कई कारण बताए जा रहे हैं।
सबसे अहम बदलाव निर्यात प्रतिबंध हटने के बाद आया है। निर्यात की अनुमति मिलने से भारतीय गेहूं के लिए विदेशी बाजारों में बिक्री के अवसर बढ़ सकते हैं। इससे कारोबारियों की मांग और बाजार की कीमतों पर असर पड़ सकता है।
इसके साथ ही बाजार भविष्य की आपूर्ति को लेकर भी अनुमान लगाता है। यदि कारोबारियों को लगता है कि आने वाले महीनों में उत्पादन कम रह सकता है, तो वे मौजूदा स्टॉक खरीदकर रखने को प्राथमिकता दे सकते हैं। इससे उपलब्ध गेहूं की खरीदारी बढ़ती है और कीमतों को समर्थन मिल सकता है।
अल नीनो और रबी सीजन की चिंता, मिलर्स की खरीदारी भी बढ़ी
कमोडिटी बाजार के जानकार मनोज कुमार जैन के मुताबिक, मौसम में संभावित बदलाव और अल नीनो की आशंका के कारण आगामी रबी सीजन में गेहूं की बुआई और उत्पादन को लेकर चर्चा बढ़ी है।
यदि बुआई में देरी होती है या उत्पादन प्रभावित होता है, तो भविष्य में गेहूं की आपूर्ति को लेकर अनिश्चितता बढ़ सकती है। हालांकि, अभी इसे संभावित जोखिम के तौर पर ही देखा जाना चाहिए। वास्तविक स्थिति आने वाले बुआई सीजन और उत्पादन के आंकड़ों से स्पष्ट होगी।
दूसरी ओर, त्योहारी सीजन और उसके बाद आने वाले शादी-ब्याह के मौसम में खाद्य उत्पादों की मांग बढ़ने की संभावना रहती है। इस दौरान आटा, मैदा और सूजी की जरूरत बढ़ सकती है। ऐसे में मिलर्स यानी गेहूं की पिसाई करने वाली इकाइयां भी अपनी जरूरत के हिसाब से खरीदारी बढ़ा सकती हैं।
जब भविष्य की आपूर्ति को लेकर चिंता और मौजूदा मांग एक साथ बढ़ती हैं, तो सरकारी स्टॉक ज्यादा होने के बावजूद बाजार भाव ऊपर जा सकते हैं। यही स्थिति फिलहाल गेहूं के बाजार में कीमतों को सहारा देती दिखाई दे रही है।
क्या महंगा होगा आटा, ब्रेड और बिस्कुट? आम परिवारों पर कितना असर पड़ेगा
गेहूं की कीमतों में लगातार तेजी रहने का असर केवल अनाज खरीदने तक सीमित नहीं रहता। गेहूं से आटा, मैदा और सूजी तैयार होते हैं। इनका इस्तेमाल घरों के साथ-साथ बेकरी, रेस्तरां और खाद्य उत्पाद बनाने वाली कंपनियां भी करती हैं।
यदि मिलों के लिए कच्चा माल महंगा होता है और यह बढ़ी हुई लागत आगे ग्राहकों तक पहुंचाई जाती है, तो आटा, ब्रेड, बिस्कुट और दूसरे गेहूं आधारित उत्पाद महंगे हो सकते हैं। इससे परिवारों के मासिक राशन खर्च में बढ़ोतरी की आशंका रहेगी।
हालांकि, गेहूं के थोक भाव बढ़ने का मतलब यह नहीं है कि सभी उत्पादों की खुदरा कीमतें तुरंत और समान अनुपात में बढ़ जाएंगी। इसका वास्तविक असर मिलों की लागत, कारोबारियों के मार्जिन, प्रतिस्पर्धा और खुदरा बाजार की परिस्थितियों पर निर्भर करेगा।
आम उपभोक्ताओं के लिए राहत की बात यह है कि सरकार के पास गेहूं का पर्याप्त भंडार मौजूद है। यदि कीमतों में और तेजी आती है, तो सरकार खुले बाजार में गेहूं बेचकर आपूर्ति बढ़ाने और भाव नियंत्रित करने के विकल्प पर विचार कर सकती है।
फिलहाल बाजार की दिशा पर तीन चीजों का असर अहम रहेगा—निर्यात से पैदा होने वाली मांग, रबी सीजन में बुआई और उत्पादन की स्थिति तथा सरकारी स्टॉक का इस्तेमाल। आने वाले हफ्तों में इन्हीं कारकों से तय होगा कि गेहूं की कीमतों में तेजी जारी रहती है या बाजार को राहत मिलती है।



