पेट्रोल भरवाते समय ग्राहक को यह पता होना चाहिए कि वह आखिर किस तरह का ईंधन खरीद रहा है? इसी सवाल को लेकर दायर याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को फिलहाल सुनवाई करने से इनकार कर दिया। याचिकाकर्ता एडवोकेट एनके गोस्वामी की मांग थी कि पेट्रोल में मिलाए गए एथेनॉल की सटीक मात्रा पेट्रोल पंप की मशीन और ग्राहक को मिलने वाली रसीद पर साफ-साफ दर्ज हो। जस्टिस एमएम सुंदरैश और जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले की पीठ ने मामले में हस्तक्षेप नहीं किया, लेकिन याचिकाकर्ता को अपनी शिकायत के लिए संबंधित हाईकोर्ट जाने की छूट दे दी।
मामला सिर्फ पेट्रोल की रसीद पर एक और जानकारी लिखने का नहीं है। याचिका में एथेनॉल-मिश्रित पेट्रोल की वाहन अनुकूलता, ईंधन की खपत, इंजन पर असर, रखरखाव खर्च और उपभोक्ता अधिकारों से जुड़े कई सवाल उठाए गए हैं।
पेट्रोल की रसीद पर एथेनॉल का जिक्र क्यों नहीं?
सुनवाई के दौरान एनके गोस्वामी ने अदालत के सामने पेट्रोल की रसीद दिखाई। उनका तर्क था कि उपभोक्ता जिस ईंधन के लिए भुगतान कर रहा है, उसमें एथेनॉल की कितनी मात्रा है, यह जानना उसका अधिकार है।
उन्होंने कहा कि मौजूदा रसीद पर एथेनॉल की मात्रा का कोई उल्लेख नहीं है। उनके मुताबिक ग्राहक को यह जानकारी खरीद के समय ही मिलनी चाहिए।
गोस्वामी ने पिछली सुनवाई का हवाला देते हुए एथेनॉल मिश्रण कार्यक्रम को लेकर सरकार के रुख में कथित तौर पर आए अंतर का भी मुद्दा उठाया। उन्होंने अदालत से केंद्र की ओर से स्पष्ट स्थिति सामने रखने की मांग की।
हालांकि, अटॉर्नी जनरल ने याचिका के तरीके पर आपत्ति जताई। उन्होंने इसे ऐसी याचिका बताया जिसमें सरकार से सीधे जवाब मांगा जा रहा है। अटॉर्नी जनरल ने यह भी कहा कि सुप्रीम कोर्ट पिछले साल इसी तरह की एक याचिका खारिज कर चुका है।
गोस्वामी ने जवाब दिया कि उनकी मांग किसी निजी लाभ के लिए नहीं है। उनका कहना था कि यह देश के सभी उपभोक्ताओं के जानने के अधिकार से जुड़ा सवाल है।
पेट्रोल पंप पर मशीन से लेकर बिल तक क्या बदलाव मांगा गया?
याचिका में देशभर के पेट्रोल पंपों पर एथेनॉल की मात्रा को एक समान और प्रमुख तरीके से प्रदर्शित करने की मांग की गई है। सिर्फ मशीन पर जानकारी देने की बात नहीं है। याचिकाकर्ता चाहता है कि हर पेट्रोल बिल, रसीद या चालान पर भी बेचे गए ईंधन में एथेनॉल का प्रतिशत साफ लिखा जाए।
इसके साथ वाहनों के हिसाब से भी एक सार्वजनिक जानकारी उपलब्ध कराने की मांग की गई है। इसमें वाहन निर्माता, मॉडल, इंजन का प्रकार और निर्माण वर्ष के आधार पर यह बताया जाए कि कौन-सा वाहन किस स्तर के एथेनॉल-मिश्रित पेट्रोल के लिए उपयुक्त है।
पुराने या ऐसे वाहनों के लिए जो एथेनॉल-मिश्रित पेट्रोल के अनुकूल नहीं हैं, याचिका में संक्रमण की स्पष्ट व्यवस्था की मांग की गई है। जहां तकनीकी, आर्थिक और आपूर्ति की स्थिति अनुमति दे, वहां कम एथेनॉल वाला पेट्रोल उपलब्ध कराने पर भी विचार करने को कहा गया है।
E20 पेट्रोल पर भी उठे कई सवाल
याचिका में एथेनॉल मिश्रण कार्यक्रम के प्रभावों की जांच के लिए स्वतंत्र विशेषज्ञ समिति बनाने का सुझाव भी दिया गया। प्रस्तावित समिति में पेट्रोलियम मंत्रालय, सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय, भारतीय मानक ब्यूरो, वाहन अनुसंधान संस्थान, उपभोक्ता संगठन, वाहन इंजीनियर और ईंधन तकनीक विशेषज्ञ शामिल किए जाने की मांग की गई।
इसके अलावा पर्यावरण, जनस्वास्थ्य और जल संसाधन से जुड़े विशेषज्ञों को भी समिति का हिस्सा बनाने का सुझाव दिया गया।
समिति से खास तौर पर भारत में चल रहे वाहनों पर E20 पेट्रोल की वास्तविक अनुकूलता की जांच करने की मांग की गई। इसके साथ ईंधन की खपत, इंजन की उम्र, रखरखाव का खर्च, वाहन की वारंटी और बीमा पर संभावित प्रभाव जैसे मुद्दों का अध्ययन करने को कहा गया।
एथेनॉल उत्पादन के पर्यावरणीय असर को भी जांच के दायरे में रखने की मांग की गई। इसमें उत्सर्जन, पानी की खपत और खाद्य सुरक्षा से जुड़े पहलुओं की समीक्षा शामिल है।
सुप्रीम कोर्ट का रुख क्या रहा, आगे रास्ता खुला
याचिका में सरकार से एथेनॉल-मिश्रित ईंधन की अनिवार्य व्यवस्था से जुड़े नीतिगत दस्तावेज, तकनीकी अध्ययन, वाहन अनुकूलता रिपोर्ट, सुरक्षा मानक, उपभोक्ता सलाह और जनता से लिए गए सुझावों का रिकॉर्ड भी सामने रखने की मांग की गई थी।
साथ ही केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण प्राधिकरण और भारतीय मानक ब्यूरो से विचार-विमर्श के बाद पूरे देश के लिए एथेनॉल-मिश्रित पेट्रोल से जुड़ी एक समान उपभोक्ता सूचना व्यवस्था बनाने की मांग रखी गई।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस स्तर पर याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया। अदालत ने मामले को आगे बढ़ाने के लिए याचिकाकर्ता को संबंधित हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाने की स्वतंत्रता दी है।
इसका मतलब यह है कि पेट्रोल की रसीद पर एथेनॉल की मात्रा लिखने की मांग पर फिलहाल सुप्रीम कोर्ट से कोई निर्देश नहीं आया है। मामला अब संबंधित हाईकोर्ट के सामने उठाया जा सकता है। आम उपभोक्ता के लिए यह मुद्दा इसलिए अहम है क्योंकि एथेनॉल-मिश्रित ईंधन खरीदते समय उसे ईंधन की संरचना और अपने वाहन की उपयुक्तता से जुड़ी जानकारी कितनी स्पष्टता से मिलती है, यह सीधे उसके खर्च और वाहन के इस्तेमाल से जुड़ा सवाल बन सकता है।


