जंतर-मंतर प्रदर्शन पर सुप्रीम कोर्ट में नया मोड़, हलफनामे में स्वतंत्र भारद्वाज के ‘कबूलनामे’ का हवाला, पुलिस पर गंभीर आरोप

जंतर-मंतर प्रदर्शन पर सुप्रीम कोर्ट में नया मोड़, हलफनामे में स्वतंत्र भारद्वाज के ‘कबूलनामे’ का हवाला, पुलिस पर गंभीर आरोप

जंतर-मंतर पर छात्र विरोध प्रदर्शन से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट के सामने अब एक नया विवाद सामने आया है। याचिकाकर्ता पक्ष ने दाखिल किए गए जवाबी हलफनामे में स्वतंत्र भारद्वाज के कथित सार्वजनिक कबूलनामे का हवाला देते हुए दिल्ली पुलिस की कार्रवाई पर गंभीर सवाल उठाए हैं। दावा किया गया है कि भारद्वाज ने एक सार्वजनिक पॉडकास्ट में प्रदर्शनकारी निशु आज़ाद के पिता पर हमला करने की बात स्वीकार की थी। याचिकाकर्ता का कहना है कि इससे यह सवाल उठता है कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन में हिंसा करने वाले लोगों की मौजूदगी कैसे हुई।

यह मामला 20 जुलाई को संसद तक निकाले गए विरोध मार्च से जुड़ा है। याचिकाकर्ता शैलेंद्र मणि त्रिपाठी की ओर से दाखिल हलफनामे में कहा गया है कि मार्च का उद्देश्य सरकार की शिक्षा नीतियों के खिलाफ शांतिपूर्ण तरीके से विरोध दर्ज कराना था। लेकिन आरोप है कि पुलिस ने प्रदर्शन के बीच ऐसे लोगों को शामिल होने दिया, जिन्हें याचिकाकर्ता पक्ष ने ‘अराजक तत्व’ बताया है।

भारद्वाज के कथित बयान को बनाया अहम आधार

जवाबी हलफनामे में स्वतंत्र भारद्वाज के एक सार्वजनिक पॉडकास्ट में दिए गए कथित बयान को खास तौर पर उठाया गया है। याचिकाकर्ता के मुताबिक, पत्रकार नेहा सिंह राठौर के पॉडकास्ट में भारद्वाज ने कथित तौर पर प्रदर्शनकारी निशु आज़ाद के पिता पर हमला करने और उनका सिर फोड़ने की बात स्वीकार की।

याचिकाकर्ता का दावा है कि यह बयान इस बात की ओर इशारा करता है कि प्रदर्शन में मौजूद सभी लोग शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारी नहीं थे। हलफनामे में आरोप लगाया गया है कि लाठी और डंडे लेकर आए कुछ लोगों की मौजूदगी से ऐसी स्थिति बनी, जिसका इस्तेमाल बाद में पुलिस कार्रवाई को उचित ठहराने के लिए किया जा सकता था।

हलफनामे में पुलिस पर यह भी आरोप लगाया गया है कि उसने कथित तौर पर ऐसे तत्वों को प्रदर्शन में प्रवेश करने दिया। इसके बाद पुलिस ने लाठीचार्ज, पैलेट गन, आंसू गैस और वॉटर कैनन जैसे बल प्रयोग के तरीके अपनाए। हालांकि, ये आरोप फिलहाल याचिकाकर्ता के हलफनामे में लगाए गए हैं और अदालत के अंतिम निष्कर्ष के तौर पर इन्हें नहीं देखा जाना चाहिए।

सादे कपड़ों में पुलिसकर्मियों की तैनाती पर भी सवाल

मामले में सिर्फ प्रदर्शनकारियों की भूमिका ही सवालों के घेरे में नहीं है। याचिकाकर्ता ने सादे कपड़ों में तैनात पुलिसकर्मियों, जिन्हें ‘स्पॉटर’ कहा गया है, को लेकर दिल्ली पुलिस के तर्क का भी विरोध किया है।

हलफनामे में कहा गया है कि दिल्ली पुलिस अधिनियम, 1978, BNSS या पुलिस की शक्तियों को नियंत्रित करने वाले किसी अन्य कानून में इस तरह की तैनाती के लिए स्पष्ट कानूनी आधार नहीं बताया गया है।

याचिकाकर्ता का तर्क है कि अगर सादे कपड़ों में पुलिसकर्मी भीड़ को नियंत्रित करने की कार्रवाई में शामिल हों और उनके पास लाठियां हों, तो उनकी पहचान और जवाबदेही का सवाल महत्वपूर्ण हो जाता है। हलफनामे में ऐसी व्यवस्था को कथित तौर पर गैर-कानूनी और पारदर्शी पुलिसिंग के सिद्धांत के खिलाफ बताया गया है।

स्वतंत्र भारद्वाज की गिरफ्तारी और कोर्ट में मामला

इस बीच, स्वतंत्र भारद्वाज के खिलाफ अलग से कानूनी कार्रवाई भी हो चुकी है। दिल्ली की एक अदालत ने प्रदर्शनकारी के पिता पर कथित हमले के मामले में उन्हें 14 दिन की न्यायिक हिरासत में भेजा था।

इसके बाद भारद्वाज ने गिरफ्तारी को चुनौती देते हुए दिल्ली हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। उन्होंने हेबियस कॉर्पस यानी बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दाखिल की थी। हालांकि, हाई कोर्ट ने उनकी गिरफ्तारी के खिलाफ दायर याचिका खारिज कर दी।

अब जंतर-मंतर प्रदर्शन से जुड़े व्यापक मामले में सुप्रीम कोर्ट के सामने दाखिल जवाबी हलफनामे ने पुलिस की भूमिका और प्रदर्शन में कथित हिंसक तत्वों की मौजूदगी को फिर बहस के केंद्र में ला दिया है।

यह जवाबी हलफनामा वकील चांद कुरैशी के माध्यम से दाखिल किया गया है। मामला Shailendra Mani Tripathi v. Union of India & Ors., Diary No. 44078/2026 और इससे जुड़े मामलों का है।

आगे की सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट यह देखेगा कि याचिकाकर्ता की ओर से लगाए गए आरोप और उनके समर्थन में दिए गए दावे किस तरह मामले के कानूनी पहलुओं को प्रभावित करते हैं। फिलहाल, इस मामले में पुलिस की कार्रवाई, प्रदर्शनकारियों की भूमिका और सादे कपड़ों में पुलिस की तैनाती—तीनों मुद्दे अदालत के सामने महत्वपूर्ण बने हुए हैं।