देश की सबसे बड़ी अदालत में अब मुकदमों के पहाड़ को कम करने की तैयारी तेज हो गई है। अक्सर हम सुनते हैं कि ‘न्याय में देरी, न्याय न मिलने के बराबर है’। इसी देरी को खत्म करने और आम आदमी तक न्याय की पहुंच को सुगम बनाने के लिए केंद्र सरकार ने एक बड़ा कदम उठाया है। मंगलवार को केंद्रीय मंत्रिमंडल ने सुप्रीम कोर्ट में न्यायाधीशों की कुल संख्या 34 से बढ़ाकर 38 करने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी। यह फैसला एक ऐसे समय में आया है जब न्यायपालिका पर लंबित मामलों का बोझ लगातार बढ़ता जा रहा है और जनता को इंसाफ के लिए लंबा इंतजार करना पड़ता है। सरकार का मानना है कि जजों की संख्या में इस इजाफे से न केवल सुनवाई की रफ्तार बढ़ेगी, बल्कि न्यायिक ढांचा भी पहले से कहीं अधिक मजबूत होगा।
92 हजार मुकदमों का बोझ और न्याय की नई उम्मीद
केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने कैबिनेट के इस अहम फैसले की जानकारी देते हुए बताया कि वर्तमान में सुप्रीम कोर्ट में एक मुख्य न्यायाधीश और 33 अन्य न्यायाधीशों के पद स्वीकृत हैं। हालांकि, मुकदमों की पेंडेंसी को देखते हुए यह संख्या नाकाफी महसूस की जा रही थी। आंकड़ों की मानें तो फिलहाल सुप्रीम कोर्ट में 92 हजार से ज्यादा मामले लंबित हैं।
आम आदमी के नजरिए से देखें तो सुप्रीम कोर्ट में जजों की संख्या बढ़ना सिर्फ एक प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह करोड़ों लोगों की उम्मीदों से जुड़ा विषय है। जब अदालतों में जजों की कमी होती है, तो जरूरी मामलों की सुनवाई में सालों लग जाते हैं। अब सरकार संसद के आगामी सत्र में इस संबंध में एक नया विधेयक पेश करेगी। इस बिल के कानून बनने के बाद मुख्य न्यायाधीश सहित जजों की कुल संख्या 38 हो जाएगी, जिससे उम्मीद है कि मुकदमों के निस्तारण में तेजी आएगी।
छह साल बाद बड़ा फैसला: क्या कहती है संविधान की धारा?
सुप्रीम कोर्ट में जजों की संख्या बढ़ाने का यह फैसला लगभग छह साल के अंतराल के बाद लिया गया है। इससे पहले साल 2019 में जजों की संख्या 31 से बढ़ाकर 34 की गई थी। दरअसल, भारत के संविधान में सुप्रीम कोर्ट के जजों की कोई एक निश्चित संख्या तय नहीं की गई है। संविधान के अनुच्छेद 124(1) के तहत यह संसद का विशेषाधिकार है कि वह समय-समय पर चीफ जस्टिस के अलावा अन्य जजों की संख्या तय करे। जैसे-जैसे देश की जनसंख्या और मुकदमों की जटिलता बढ़ी है, संसद ने इस शक्ति का उपयोग करते हुए जजों की संख्या में बढ़ोतरी की है।
1956 से 2026 तक: कैसे बदलता गया सुप्रीम कोर्ट का स्वरूप
सुप्रीम कोर्ट के इतिहास पर नजर डालें तो जजों की संख्या बढ़ाने का सिलसिला काफी पुराना है। सुप्रीम कोर्ट (न्यायाधीशों की संख्या) अधिनियम 1956 में जब पहली बार प्रावधान किया गया था, तब मुख्य न्यायाधीश को छोड़कर केवल 10 न्यायाधीश हुआ करते थे। वक्त के साथ यह जरूरत बढ़ती गई और 1960 में संख्या 13, फिर 17 और 1986 के संशोधन के बाद 25 कर दी गई। साल 2009 में जजों की संख्या 30 तक पहुंची और 2019 के बाद से अब तक यह 34 पर टिकी थी। अब 38 की संख्या तक पहुंचने का यह सफर बताता है कि देश की न्याय प्रणाली को आधुनिक और प्रभावी बनाने के लिए संसाधनों का विस्तार कितना अनिवार्य है।
क्या जजों की संख्या बढ़ाना ही है हर समस्या का समाधान?
भले ही कैबिनेट ने संख्या बढ़ाने की मंजूरी दे दी हो, लेकिन कानूनी जगत के कई विशेषज्ञ मानते हैं कि न्याय की राह में सिर्फ जजों की गिनती बढ़ा देना ही काफी नहीं है। उनके मुताबिक, न्याय में होने वाली देरी को पूरी तरह खत्म करने के लिए न्यायिक प्रक्रिया में तकनीक का समावेश और बुनियादी ढांचे में सुधार भी उतना ही जरूरी है। हालांकि, यह भी सच है कि जजों की पर्याप्त संख्या के बिना किसी भी सुधार को जमीन पर उतारना मुमकिन नहीं है। कैबिनेट का यह फैसला निश्चित रूप से न्यायपालिका को वह ऑक्सीजन देगा, जिसकी उसे 92 हजार फाइलों के नीचे दबे होने के कारण सख्त जरूरत थी।


