जजों की रिटायरमेंट उम्र बढ़ाने पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, राज्यों से कहा- खर्च का बहाना नहीं चलेगा

जजों की रिटायरमेंट उम्र बढ़ाने पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, राज्यों से कहा- खर्च का बहाना नहीं चलेगा

जिला न्यायपालिका में कार्यरत न्यायिक अधिकारियों की रिटायरमेंट उम्र बढ़ाने को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों को बड़ा संदेश दिया है। शीर्ष अदालत ने साफ कहा है कि केवल अतिरिक्त वित्तीय बोझ या सरकारी कर्मचारियों की अलग सेवानिवृत्ति आयु का हवाला देकर न्यायिक अधिकारियों की रिटायरमेंट उम्र 60 से बढ़ाकर 62 वर्ष करने का विरोध नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने इन दोनों कारणों को असंगत बताते हुए उन सभी राज्यों को दो सप्ताह के भीतर इस मुद्दे पर दोबारा विचार करने का निर्देश दिया है, जिन्होंने अब तक इसका विरोध किया है। अदालत का यह रुख इसलिए भी अहम माना जा रहा है क्योंकि यह मामला देशभर की जिला न्यायपालिका और न्यायिक व्यवस्था की कार्यक्षमता से सीधे जुड़ा हुआ है।

सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों की दलीलों को क्यों ठुकराया?

भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहन की पीठ ने ऑल इंडिया जजेज एसोसिएशन बनाम भारत संघ मामले की सुनवाई के दौरान यह टिप्पणी की।

इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्यों और संबंधित हाईकोर्ट से पूछा था कि क्या जिला न्यायाधीशों और अन्य न्यायिक अधिकारियों की सेवानिवृत्ति आयु 60 वर्ष से बढ़ाकर 62 वर्ष की जा सकती है। कई राज्यों ने इसका विरोध करते हुए दो प्रमुख तर्क दिए। पहला, इससे सरकारी खजाने पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ेगा। दूसरा, यदि न्यायिक अधिकारियों की रिटायरमेंट उम्र बढ़ाई गई तो सरकारी कर्मचारियों और न्यायिक अधिकारियों की सेवानिवृत्ति आयु में अंतर पैदा हो जाएगा।

सुप्रीम कोर्ट ने दोनों तर्कों को स्वीकार करने से इनकार कर दिया और कहा कि ये आधार रिटायरमेंट उम्र बढ़ाने का विरोध करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं।

अनुभवी जजों को बनाए रखना ज्यादा फायदेमंद: कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अनुभवी न्यायिक अधिकारी न्याय व्यवस्था की महत्वपूर्ण संपत्ति होते हैं। यदि उन्हें दो वर्ष और सेवा में रखा जाता है तो इससे तत्काल नई भर्तियों की आवश्यकता कम होगी। साथ ही चयन प्रक्रिया, प्रशिक्षण और नए अधिकारियों की नियुक्ति पर होने वाला खर्च भी घटेगा।

अदालत ने स्पष्ट किया कि राज्यों की यह आशंका सही नहीं है कि रिटायरमेंट उम्र बढ़ाने से केवल वित्तीय बोझ बढ़ेगा। इसके उलट, अनुभवी अधिकारियों को सेवा में बनाए रखना कई मामलों में अधिक व्यावहारिक और आर्थिक रूप से लाभकारी साबित हो सकता है।

कोर्ट ने यह भी माना कि न्यायपालिका में अनुभव का सीधा असर मामलों के निपटारे और न्यायिक दक्षता पर पड़ता है। इसलिए इस पहलू को भी निर्णय लेते समय नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

जज सरकारी कर्मचारी नहीं, अलग संवैधानिक वर्ग

सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में यह भी स्पष्ट किया कि न्यायिक अधिकारी और सामान्य सरकारी कर्मचारी एक समान नहीं हैं। अदालत ने कहा कि भले ही न्यायिक अधिकारियों की नियुक्ति राज्य सरकार के माध्यम से होती हो, लेकिन उनका संवैधानिक दर्जा अलग है और वे स्वतंत्र न्यायपालिका का हिस्सा हैं।

इसी आधार पर अदालत ने राज्यों की उस दलील को भी खारिज कर दिया जिसमें कहा गया था कि यदि सरकारी कर्मचारियों की रिटायरमेंट उम्र अलग है तो न्यायिक अधिकारियों की उम्र भी वही रहनी चाहिए। कोर्ट ने कहा कि दोनों की तुलना करना उचित नहीं है क्योंकि दोनों की संवैधानिक भूमिका और जिम्मेदारियां अलग-अलग हैं।

दो सप्ताह में दोबारा फैसला लेने का निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने सभी संबंधित राज्यों से कहा है कि वे इस पूरे मुद्दे पर स्वतंत्र रूप से दोबारा विचार करें और दो सप्ताह के भीतर व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाते हुए नया निर्णय लें। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि किसी राज्य के अधिकार क्षेत्र वाले हाईकोर्ट ने रिटायरमेंट उम्र बढ़ाने का समर्थन नहीं किया है, तब भी राज्य सरकार सकारात्मक फैसला लेने के लिए स्वतंत्र होगी। हाईकोर्ट के विचारों पर सुप्रीम कोर्ट बाद में अलग से विचार करेगा।

अब सभी की नजर राज्यों की अगली कार्रवाई पर रहेगी। यदि अधिकांश राज्य सकारात्मक निर्णय लेते हैं तो देशभर में जिला न्यायपालिका के न्यायिक अधिकारियों की रिटायरमेंट उम्र 60 से बढ़ाकर 62 वर्ष किए जाने का रास्ता और मजबूत हो सकता है। इससे न्यायिक अनुभव का बेहतर उपयोग होने के साथ-साथ लंबित मामलों के निपटारे की प्रक्रिया को भी गति मिलने की उम्मीद जताई जा रही है।