सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार 25 मई को NEET-UG 2026 परीक्षा को लेकर दायर याचिकाओं पर सुनवाई की। फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया मेडिकल एसोसिएशन (FAIMA) और यूनाइटेड डॉक्टर्स फ्रंट की याचिका पर कोर्ट ने केंद्र सरकार, राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (NTA) और CBI को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।
यह सुनवाई उन लाखों छात्रों और उनके परिवारों के लिए महत्वपूर्ण है जिनकी मेहनत परीक्षा की निष्पक्षता पर निर्भर करती है। आम अभिभावक अब उम्मीद कर रहे हैं कि कोर्ट का हस्तक्षेप परीक्षा प्रक्रिया को पारदर्शी और विश्वसनीय बनाने में मदद करेगा।
न्यायिक निगरानी और हाई-पावर्ड कमेटी की मांग
याचिकाकर्ताओं की तरफ से अधिवक्ता तन्वी दुबे ने कोर्ट के समक्ष परीक्षा संचालन से जुड़ी शिकायतें रखीं। याचिका में मांग की गई है कि NEET-UG 2026 की दोबारा परीक्षा की पूरी प्रक्रिया न्यायिक निगरानी में हो।
इसके लिए एक हाई-पावर्ड कमेटी गठित की जाए, जिसकी अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त जज करें। कमेटी में साइबर सिक्योरिटी विशेषज्ञ और फॉरेंसिक वैज्ञानिक भी शामिल हों। याचिका में केंद्र से यह भी कहा गया है कि जब तक नई स्वतंत्र परीक्षा संस्था (NEIC) का गठन नहीं हो जाता, तब तक NEET परीक्षा इसी समिति की निगरानी में आयोजित की जाए। साथ ही सेंटर-वार रिजल्ट सार्वजनिक करने की मांग भी की गई है।
कोर्ट की सख्त टिप्पणी, NTA पर उठाए सवाल
सुनवाई के दौरान जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की बेंच ने परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता पर गहरी चिंता जताई। कोर्ट ने सख्त शब्दों में कहा कि संबंधित संस्थाएं पिछले विवादों से अभी भी कोई सबक नहीं ले पाई हैं।
बेंच ने याद दिलाया कि 2024 के NEET विवाद के बाद मॉनिटरिंग कमेटी बनाई गई थी, लेकिन उसकी सिफारिशों को जमीन पर लागू करने में NTA की भूमिका संदिग्ध है। कोर्ट ने NTA को तीन दिनों के अंदर विस्तृत काउंटर एफिडेविट दाखिल करने का निर्देश दिया है। अगली सुनवाई 29 मई को होगी।
पेपर लीक आरोपी मनीषा हवलदार को CBI कस्टडी
इस बीच NEET पेपर लीक मामले में दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट ने आरोपी मनीषा हवलदार को 30 मई तक 6 दिन की CBI कस्टडी में भेज दिया। CBI का आरोप है कि मनीषा ने फिजिक्स का पेपर लीक किया और उसे फैलाया।
CBI ने कोर्ट से अन्य आरोपियों से आमना-सामना कराने और मामले से जुड़े बाकी लोगों की पहचान के लिए रिमांड मांगी थी।
सुप्रीम कोर्ट का यह सक्रिय रुख परीक्षा व्यवस्था में सुधार की दिशा में एक सकारात्मक कदम है। छात्रों के भविष्य से जुड़े इस मुद्दे पर न्यायपालिका का सख्त रवैया आम नागरिकों को भरोसा दिलाता है कि उनकी मेहनत को किसी भी तरह की गड़बड़ी से नहीं बचाया जाएगा। आने वाली सुनवाई में इस मामले पर और स्पष्टता आने की उम्मीद है।


