परमानेंट लोक अदालत के सदस्यों की सैलरी पर सुप्रीम कोर्ट की दो टूक, CJI बोले- ‘स्वैच्छिक सेवा है तो वेतन की बराबरी कैसे?’

परमानेंट लोक अदालत के सदस्यों की सैलरी पर सुप्रीम कोर्ट की दो टूक, CJI बोले- ‘स्वैच्छिक सेवा है तो वेतन की बराबरी कैसे?’

परमानेंट लोक अदालत के सदस्यों के बेहतर पे-स्केल की मांग पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्य कांत ने महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। कोर्ट ने कहा कि परमानेंट लोक अदालत के सदस्य कानूनी सहायता व्यवस्था का हिस्सा हैं और उनकी सेवा का स्वरूप स्वैच्छिक है। ऐसे में अन्य न्यायिक मंचों के सदस्यों के बराबर वेतन या सेवा शर्तों की मांग सीधे तौर पर लागू नहीं की जा सकती। हालांकि, कोर्ट ने मामले को पूरी तरह खारिज नहीं किया। सुप्रीम कोर्ट ने याचिका की कॉपी NALSA को भेजने और इस पर विचार करने का निर्देश दिया है।

CJI सूर्य कांत ने क्यों कहा- सेवा का स्वरूप अलग है?

CJI सूर्य कांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने सुनवाई के दौरान परमानेंट लोक अदालत की भूमिका और वहां काम करने वाले सदस्यों की स्थिति पर टिप्पणी की। CJI ने कहा कि यह व्यवस्था कानूनी सहायता योजना का हिस्सा है। इसमें रिटायर्ड जज और वकील अपनी सेवाएं देते हैं।

कोर्ट का कहना था कि इस तरह की सेवा को सामान्य सरकारी या नियमित न्यायिक सेवा के समान नहीं माना जा सकता। इसलिए सेवा की शर्तों, समानता और वेतन की तुलना उसी आधार पर करना आसान नहीं है।

CJI ने यह भी कहा कि कानूनी सेवा प्राधिकरणों के पास संसाधन सीमित होते हैं। उन्हें उपलब्ध फंड का इस्तेमाल अलग-अलग प्राथमिकताओं को ध्यान में रखकर करना पड़ता है। अलग-अलग राज्यों में कानूनी प्रावधान और वित्तीय सहायता की व्यवस्था भी अलग हो सकती है।

याचिकाकर्ताओं ने बताया, काम बढ़ा लेकिन मानदेय वहीं रहा

याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता करुणा नंदी ने कोर्ट के सामने दूसरा पक्ष रखा। उन्होंने बताया कि परमानेंट लोक अदालतों का काम पहले मुख्य रूप से सार्वजनिक उपयोगिता सेवाओं से जुड़े मामलों तक सीमित था। अब इसका दायरा काफी बढ़ चुका है।

बैंकिंग, NBFC, हाउसिंग और शिक्षा जैसे क्षेत्रों से जुड़े विवाद भी इनके सामने आ रहे हैं। यानी काम का क्षेत्र और मामलों की प्रकृति दोनों में विस्तार हुआ है।

नंदी ने बताया कि पिछले साल परमानेंट लोक अदालतों ने करीब 660 करोड़ रुपये मूल्य के मामलों का निपटारा किया। उनका कहना था कि जिस व्यवस्था के जरिए इतनी बड़ी आर्थिक और सार्वजनिक महत्व की समस्याओं का समाधान किया जा रहा है, उसके सदस्यों के लिए सम्मानजनक और व्यवस्थित पे-स्केल की जरूरत है।

हर बैठक के ₹2,500, जबकि दूसरी जगह ₹1.6 लाख का उदाहरण

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से मौजूदा भुगतान व्यवस्था का भी जिक्र किया गया। नंदी ने बताया कि सदस्यों को हर बैठक के लिए करीब ₹2,500 मिलते हैं। उनके मुताबिक कुल मासिक भुगतान लगभग ₹25,000 से ₹50,000 के बीच रहता है।

उन्होंने इसकी तुलना जिला स्तर के दूसरे न्यायिक मंचों के सदस्यों से करते हुए बताया कि एक मामले में कोर्ट के आदेश के बाद जिला फोरम के सदस्य को करीब ₹1.6 लाख का भुगतान मिलता है।

नंदी ने यह भी स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता जरूरी नहीं कि किसी दूसरे पद के सदस्यों के साथ सीधी बराबरी की मांग कर रहे हों। उनकी मांग एक बेहतर, व्यवस्थित और सम्मानजनक पे-स्केल की है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि उन्हें जिला स्तर पर लगातार काम करना पड़ता है और इस जिम्मेदारी के साथ दूसरा काम करना भी संभव नहीं होता।

अब NALSA के सामने मामला, 4 महीने में विचार करने का निर्देश

सुनवाई के दौरान यह भी बताया गया कि इस मुद्दे को पहले कई बार संबंधित अधिकारियों के सामने उठाया जा चुका है। दो मामले हाईकोर्ट तक भी पहुंचे, लेकिन वहां से भी मामलों को संबंधित प्राधिकरणों के पास भेजा जाता रहा।

अंततः सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने एक रास्ता जरूर खोला। CJI सूर्य कांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच ने निर्देश दिया कि रिट याचिका की एक प्रति रजिस्ट्री के माध्यम से NALSA के सदस्य सचिव को भेजी जाए।

कोर्ट ने कहा कि NALSA की गवर्निंग काउंसिल इस याचिका को एक आवेदन के तौर पर देखे और इस पर विचार करे। NALSA को करीब चार महीने का समय दिया गया है।

कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर NALSA इस मामले में जल्द कोई उचित फैसला लेता है, तो यह बेहतर होगा। यानी फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने सीधे पे-स्केल तय नहीं किया है, लेकिन संबंधित प्राधिकरण के सामने इस मांग पर औपचारिक विचार का रास्ता जरूर खोल दिया है।

Case Title: ROONAM KAUSHIK AND ORS. Versus UNION OF INDIA AND ANR.