सुप्रीम कोर्ट ने कम गंभीर आपराधिक मामलों में समझौते को लेकर अहम बात साफ की है। कोर्ट ने कहा है कि अगर किसी आरोपी को दोषी ठहराए जाने के बाद शिकायतकर्ता या पीड़ित के साथ आपसी समझौता हो जाता है, तो कुछ परिस्थितियों में उसके खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही को रद्द किया जा सकता है। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि हर अपराध में समझौते के आधार पर मामला खत्म हो जाएगा। अदालत को अपराध की प्रकृति, उसकी गंभीरता और समाज पर उसके असर समेत कई पहलुओं पर विचार करना होगा।
यह टिप्पणी जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस श्री चंद्रशेखर की पीठ ने की। पीठ ने पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के उस फैसले में दखल देने से इनकार कर दिया, जिसमें समझौते के आधार पर आरोपी के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही रद्द कर दी गई थी।
सजा के बाद हुआ समझौता, फिर हाईकोर्ट ने खत्म किया केस
मामले में आरोपी को गैर-कानूनी तरीके से इकट्ठा होने, अपहरण या अगवा करने और खतरनाक हथियारों के इस्तेमाल जैसे अपराधों में दोषी ठहराया गया था।
दोषसिद्धि के बाद शिकायतकर्ता और पीड़ित पक्ष ने अदालत के सामने बताया कि दोनों पक्षों के बीच समझौता हो गया है। उनके अनुसार, यह समझौता रिश्तेदारों और सम्मानित लोगों की मदद से हुआ था। खास बात यह थी कि पीड़ित ने साफ कहा कि समझौता उसकी अपनी इच्छा से हुआ और उस पर किसी तरह का दबाव या अनुचित प्रभाव नहीं डाला गया।
इसके बाद हाईकोर्ट ने आरोपी के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही रद्द कर दी। पंजाब सरकार ने इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। लेकिन शीर्ष अदालत ने हाईकोर्ट के आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।
हर केस में समझौते से राहत नहीं, सुप्रीम कोर्ट ने बताई सीमा
सुप्रीम कोर्ट ने अपने पुराने फैसलों का भी उल्लेख किया। पीठ ने ‘ज्ञान सिंह बनाम पंजाब राज्य’ (2012) और ‘रामगोपाल एवं अन्य बनाम मध्य प्रदेश राज्य’ (2021) के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि हाईकोर्ट के पास कुछ ऐसे मामलों में भी आपराधिक कार्यवाही खत्म करने की शक्ति है, जो सामान्य तौर पर समझौता योग्य यानी ‘कंपाउंडेबल’ नहीं होते।
लेकिन यह शक्ति बिना सोचे-समझे इस्तेमाल नहीं की जा सकती। अदालत ने साफ किया कि हर मामले के तथ्य अलग होते हैं और उसी आधार पर फैसला लेना होगा।
‘रामगोपाल’ मामले में तय किए गए मानकों के मुताबिक अदालत को मुख्य रूप से चार बातों पर ध्यान देना चाहिए। पहला, अपराध कितना गंभीर है और उसका समाज पर क्या असर पड़ा। दूसरा, अगर किसी को चोट लगी है तो उसकी गंभीरता कितनी है। तीसरा, आरोपी और पीड़ित के बीच हुआ समझौता वास्तव में स्वैच्छिक है या नहीं। चौथा, अपराध से पहले और उसके बाद आरोपी का व्यवहार कैसा रहा।
आम जनता पर असर नहीं, इसलिए हाईकोर्ट के फैसले को सही माना
सुप्रीम कोर्ट ने मौजूदा मामले के तथ्यों को इन मानकों पर परखा। अदालत ने पाया कि घटना कुछ व्यक्तियों के बीच हुई थी। इसमें ऐसा कोई गंभीर तत्व नहीं था, जिससे व्यापक स्तर पर समाज प्रभावित हुआ हो।
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि मामला किसी बड़े आर्थिक अपराध, NDPS Act के तहत प्रतिबंधित पदार्थों के कारोबार या करोड़ों रुपये के घोटाले जैसा नहीं था। यानी अपराध का असर मुख्य रूप से संबंधित पक्षों तक सीमित था।
इसी आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखा। अदालत ने माना कि इस मामले में समझौते के बाद आपराधिक कार्यवाही को रद्द करने का फैसला उचित था।
राज्य की अपील खारिज, लेकिन फैसला सीमित परिस्थितियों के लिए
सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश का सीधा मतलब यह नहीं है कि दोषी ठहराए गए हर आरोपी को समझौते के बाद केस खत्म कराने का अधिकार मिल गया है। अदालत ने जिस शक्ति की बात की है, उसका इस्तेमाल मामले की प्रकृति और परिस्थितियों को देखकर किया जाना है।
खास तौर पर गंभीर अपराधों, व्यापक सार्वजनिक प्रभाव वाले मामलों, आर्थिक अपराधों या NDPS Act से जुड़े मामलों में अदालत को अधिक सावधानी बरतनी होगी।
इस मामले में शीर्ष अदालत ने राज्य की अपील खारिज कर दी और पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।
Cause Title: The State of Punjab Versus Avtar Singh & Ors.


