सुप्रीम कोर्ट ने बिजली से जुड़े मामलों की सुनवाई करने वाले अपीलीय ट्रिब्यूनल APTEL को कड़ी फटकार लगाई है। अदालत ने कहा कि ट्रिब्यूनल ने अपने ही पुराने फैसले की समीक्षा करते समय सुप्रीम कोर्ट के बाध्यकारी निर्णय को नजरअंदाज किया। इस पर नाराजगी जताते हुए शीर्ष अदालत ने टिप्पणी की कि APTEL पूरी तरह से भटक गया है। इतना ही नहीं, सुप्रीम कोर्ट ने ट्रिब्यूनल के समीक्षा आदेश को रद्द कर दिया और इस मामले में याचिका दायर करने वाली मैथन अलॉयज लिमिटेड पर 2 लाख रुपये तथा स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड (SAIL) पर 1.5 लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया। यह मामला बिजली टैरिफ और दामोदर वैली कॉरपोरेशन (DVC) के सिंकिंग फंड से जुड़ा है।
सुप्रीम कोर्ट ने APTEL को क्यों लगाई फटकार?
शुक्रवार, 30 अक्टूबर 2026 को जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने इस मामले में सुनवाई की। अदालत ने पाया कि APTEL ने 2019 में दिए गए अपने फैसले की समीक्षा करते हुए उस कानूनी आधार को ही नजरअंदाज कर दिया, जिस पर सुप्रीम कोर्ट पहले फैसला सुना चुका था।
सुनवाई के दौरान पीठ ने अपनी नाराजगी जाहिर करते हुए कहा कि उसे यह कहने में संकोच नहीं है कि ट्रिब्यूनल पूरी तरह से भटक गया है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी ट्रिब्यूनल को सुप्रीम कोर्ट के बाध्यकारी फैसले के विपरीत जाकर निर्णय लेने की छूट नहीं दी जा सकती।
सुप्रीम कोर्ट ने APTEL के समीक्षा आदेश को रद्द करते हुए इसे न्यायिक अनुशासन का गंभीर उल्लंघन बताया। अदालत के मुताबिक, निचली न्यायिक संस्थाओं और ट्रिब्यूनल को शीर्ष अदालत के फैसलों का सम्मान करना जरूरी है।
क्या है DVC और बिजली टैरिफ से जुड़ा पूरा विवाद?
इस विवाद की शुरुआत साल 2009 से 2014 के बीच दामोदर वैली कॉरपोरेशन (DVC) के बिजली टैरिफ निर्धारण से हुई थी। दरअसल, DVC ने बॉन्ड के भुगतान की व्यवस्था के लिए एक सिंकिंग फंड बनाया था। इस फंड में किए जाने वाले योगदान को लेकर विवाद खड़ा हुआ।
सेंट्रल इलेक्ट्रिसिटी रेगुलेटरी कमीशन (CERC) ने DVC को इस फंड में किए गए योगदान को खर्च के तौर पर मान्यता दी थी। इसका मतलब था कि DVC इस रकम को बिजली टैरिफ के जरिए उपभोक्ताओं से वसूल सकता था।
इसके बाद मामला APTEL पहुंचा। साल 2019 में ट्रिब्यूनल ने सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसले ‘भास्कर श्राची अलॉयज लिमिटेड बनाम दामोदर वैली कॉरपोरेशन’ (2018) का हवाला देते हुए DVC के पक्ष में फैसला दिया था।
लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई। साल 2024 में मैथन अलॉयज लिमिटेड ने इस फैसले की समीक्षा की मांग कर दी। खास बात यह थी कि समीक्षा याचिका मूल फैसले के पांच साल से भी ज्यादा समय बाद दाखिल की गई थी।
2024 में ट्रिब्यूनल ने बदला अपना रुख, क्या था दोहरे फायदे का तर्क?
मैथन अलॉयज की समीक्षा याचिका स्वीकार करते हुए APTEL ने अपने पुराने फैसले में बदलाव कर दिया। ट्रिब्यूनल का तर्क था कि जिस रकम से बॉन्ड के जरिए संपत्तियां बनाई गईं, उन संपत्तियों पर डेप्रिसिएशन यानी मूल्यह्रास का लाभ भी लिया जा रहा है। ऐसे में उसी व्यवस्था के तहत सिंकिंग फंड में योगदान को भी टैरिफ के जरिए वसूलने की अनुमति देना दोहरा लाभ देने जैसा होगा।
APTEL के इस फैसले का स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड (SAIL) ने भी समर्थन किया था। हालांकि, DVC ने ट्रिब्यूनल के इस कदम को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।
सुप्रीम कोर्ट ने DVC की दलीलों को स्वीकार करते हुए कहा कि APTEL की समीक्षा कानूनी रूप से सही नहीं थी। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि समीक्षा का अधिकार असीमित नहीं होता। किसी फैसले में ऐसी स्पष्ट गलती होनी चाहिए, जो रिकॉर्ड देखने मात्र से सामने आ जाए। ऐसी गलती को साबित करने के लिए लंबी कानूनी बहस या विस्तृत जांच की जरूरत नहीं होनी चाहिए।
अनुच्छेद 141 का उल्लंघन बताया, दोनों कंपनियों पर जुर्माना
जस्टिस के. विनोद चंद्रन द्वारा लिखे गए फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि APTEL ने न केवल अपने अधिकार क्षेत्र से आगे बढ़कर काम किया, बल्कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 141 का भी गंभीर उल्लंघन किया।
संविधान का अनुच्छेद 141 कहता है कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा घोषित कानून देश की सभी अदालतों पर बाध्यकारी होगा। इसका उद्देश्य न्यायिक व्यवस्था में एकरूपता बनाए रखना और यह सुनिश्चित करना है कि अलग-अलग अदालतें एक ही कानूनी मुद्दे पर मनमाने तरीके से अलग-अलग फैसले न दें।
पीठ ने चेतावनी दी कि अगर निचली अदालतें और ट्रिब्यूनल सुप्रीम कोर्ट के फैसलों को मानना बंद कर दें, तो पूरी न्यायिक व्यवस्था में अव्यवस्था पैदा हो सकती है।
अदालत ने APTEL के समीक्षा आदेश को स्पष्ट रूप से अवैध और न्यायिक अनुशासन के खिलाफ माना। इसके साथ ही मैथन अलॉयज लिमिटेड पर 2 लाख रुपये और SAIL पर 1.5 लाख रुपये का जुर्माना लगाया गया। DVC की अपील स्वीकार करते हुए उसे मुकदमे का खर्च देने का आदेश भी दिया गया।
आम लोगों और बिजली उपभोक्ताओं के लिए इस फैसले का क्या मतलब है?
यह मामला केवल दो कंपनियों और एक बिजली निगम के बीच टैरिफ विवाद तक सीमित नहीं है। बिजली की दरें तय करने वाली व्यवस्था में कानूनी स्पष्टता और नियामकीय फैसलों की स्थिरता भी अहम भूमिका निभाती है। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से यह स्पष्ट संदेश गया है कि बिजली क्षेत्र के ट्रिब्यूनल भी शीर्ष अदालत के बाध्यकारी फैसलों से अलग हटकर निर्णय नहीं ले सकते। हालांकि, इस फैसले से आम उपभोक्ताओं के बिजली बिल में तत्काल किसी बदलाव का आदेश नहीं दिया गया है।
Case Title: Damodar Valley Corporation v. Maithan Alloys Limited & Ors.

