उत्तर प्रदेश में 2027 विधानसभा चुनाव अभी दूर जरूर है, लेकिन भारतीय जनता पार्टी ने इसकी तैयारी अभी से तेज कर दी है। लखनऊ में हुई हाई-लेवल बैठकों ने साफ संकेत दे दिए हैं कि पार्टी इस बार चुनाव को हल्के में नहीं ले रही। राष्ट्रीय महासचिव विनोद तावड़े का दो दिवसीय दौरा सिर्फ औपचारिक नहीं था, बल्कि जमीन की सच्चाई समझने और रणनीति को धार देने की कोशिश थी।
इस पूरे अभ्यास का मकसद एक ही था—कैसे चुनाव जीता जाए, कहां सुधार जरूरी है और किन मुद्दों पर पार्टी को नुकसान हो सकता है।
बंद कमरे में मंथन: हर नेता से लिया गया सीधा फीडबैक
लखनऊ में विनोद तावड़े ने एक-एक कर करीब डेढ़ दर्जन नेताओं से मुलाकात की। यह बातचीत सामान्य समीक्षा से अलग थी। हर नेता से व्यक्तिगत तौर पर राय ली गई, ताकि बिना किसी दबाव के वास्तविक फीडबैक सामने आ सके।
सूत्रों के मुताबिक, तावड़े ने हर नेता से तीन सीधे सवाल किए—मंत्रियों के कामकाज का आकलन क्या है, किस मंत्री की छवि सकारात्मक या नकारात्मक है, और क्या नए चेहरों को शामिल कर चुनावी समीकरण बेहतर बनाए जा सकते हैं।
इस प्रक्रिया से साफ है कि पार्टी सिर्फ रिपोर्ट पर निर्भर नहीं रहना चाहती, बल्कि जमीनी संकेतों को समझकर फैसले लेना चाहती है।
सामाजिक समीकरण पर चिंता: ‘छोटे बदलाव से काम नहीं चलेगा’
बैठकों में सबसे अहम मुद्दा सामाजिक संतुलन का रहा। अवध क्षेत्र में पासी और कुर्मी समुदाय की नाराजगी, ब्राह्मण असंतोष और जातीय समीकरण बिगड़ने की शिकायतें खुलकर सामने आईं।
कुछ नेताओं ने साफ कहा कि अब छोटे-छोटे बदलाव से कोई खास फर्क नहीं पड़ेगा। अगर संदेश देना है तो बड़े फैसले लेने होंगे। एक वरिष्ठ नेता ने यह भी संकेत दिया कि बैकवर्ड राजनीति के साथ-साथ सवर्ण वर्ग को साधना भी जरूरी है, वरना 2027 में चुनौती बढ़ सकती है।
विपक्ष पर नजर: ‘अखिलेश को हल्के में न लें’
बैठकों में विपक्ष की रणनीति पर भी विस्तार से चर्चा हुई। खासतौर पर समाजवादी पार्टी और अखिलेश यादव के PDA (पिछड़ा-दलित-अल्पसंख्यक) फॉर्मूले को लेकर नेताओं ने गंभीरता जताई।
फीडबैक में यह बात सामने आई कि 2027 के चुनाव में अखिलेश यादव को हल्के में लेना नुकसानदायक हो सकता है। इसके अलावा, हाल के विवाद—जैसे UGC मुद्दा, शंकराचार्य विवाद और पुलिस भर्ती पेपर को लेकर उठे सवाल—भी चर्चा में रहे।
दलित और ओबीसी वोटबैंक की स्थिति को लेकर भी जमीनी रिपोर्ट ली गई, ताकि आगे की रणनीति उसी हिसाब से तैयार की जा सके।
बंगाल चुनाव के बाद ‘बड़ी सर्जरी’ के संकेत
विनोद तावड़े ने सभी फीडबैक को नोट कर लिया है और इसे राष्ट्रीय नेतृत्व को सौंपेंगे। अब अंतिम फैसला दिल्ली स्तर पर होगा।
सूत्रों की मानें तो उत्तर प्रदेश में सरकार और संगठन दोनों स्तर पर बड़े बदलाव की तैयारी है, लेकिन यह कदम पश्चिम बंगाल चुनाव के बाद उठाया जा सकता है। इस बार सिर्फ प्रतीकात्मक बदलाव नहीं, बल्कि व्यापक फेरबदल की संभावना जताई जा रही है।
तावड़े ने जिस तरह अलग-अलग नेताओं से व्यक्तिगत बातचीत की, उससे एक संदेश साफ गया—पार्टी में हर आवाज महत्वपूर्ण है और 2027 की रणनीति सामूहिक फीडबैक के आधार पर तय होगी।
उत्तर प्रदेश की राजनीति में यह हलचल सिर्फ संगठनात्मक गतिविधि नहीं है, बल्कि आने वाले चुनाव की दिशा तय करने वाला चरण भी है। अब देखना होगा कि इन बैठकों से निकली रणनीति जमीन पर किस तरह लागू होती है और क्या यह BJP को 2027 में बढ़त दिला पाती है।


