उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव को लेकर अनिश्चितता के बीच इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने राज्य निर्वाचन आयोग से सीधा सवाल पूछा है कि आखिर पंचायत चुनाव कब कराए जाएंगे। अदालत ने साफ शब्दों में आयोग से चुनाव की संभावित तारीख बताने को कहा है। साथ ही ग्राम प्रधानों का कार्यकाल छह महीने बढ़ाने के राज्य सरकार के फैसले पर भी सवाल उठाए हैं। हाईकोर्ट की इस सख्ती के बाद प्रदेश की राजनीति और प्रशासनिक हलकों में पंचायत चुनाव को लेकर चर्चा तेज हो गई है।
दरअसल, उत्तर प्रदेश में त्रिस्तरीय पंचायतों का मौजूदा कार्यकाल 26 मई 2026 को खत्म हो रहा है। लेकिन ओबीसी आरक्षण और आयोग की रिपोर्ट की प्रक्रिया पूरी न होने की वजह से चुनाव समय पर होना मुश्किल माना जा रहा है। ऐसे में अदालत अब सरकार और राज्य निर्वाचन आयोग दोनों से स्पष्ट जवाब चाहती है।
हाईकोर्ट ने पूछा- चुनाव टालने की वजह क्या है?
इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच पंचायत चुनाव में हो रही देरी को लेकर पहले से गंभीर रुख अपनाए हुए है। अदालत ने राज्य निर्वाचन आयोग से पूछा है कि चुनाव कराने का रोडमैप क्या है और संभावित तारीख क्या होगी। इसके साथ ही कोर्ट ने राज्य सरकार को समर्पित अन्य पिछड़ा वर्ग आयोग की रिपोर्ट 10 जुलाई तक पेश करने का निर्देश दिया है।
असल में पंचायत चुनाव में ओबीसी आरक्षण तय करने के लिए राज्य सरकार ने समर्पित ओबीसी आयोग के गठन को मंजूरी दी है। आयोग की सिफारिशों के आधार पर ही पंचायत सीटों का आरक्षण तय होगा। लेकिन आयोग का कार्यकाल ही छह महीने का रखा गया है। ऐसे में चुनाव प्रक्रिया में लंबा समय लगने की संभावना जताई जा रही है।
यही वजह है कि अब यह माना जा रहा है कि पंचायत चुनाव इस साल कराना मुश्किल हो सकता है।
ग्राम प्रधानों का कार्यकाल बढ़ाने पर भी उठे सवाल
राज्य सरकार ने ग्राम प्रधानों का कार्यकाल छह महीने बढ़ाने का फैसला लिया था। हाईकोर्ट ने इस निर्णय पर भी सवाल खड़े किए हैं। अदालत जानना चाहती है कि जब पंचायतों का कार्यकाल तय है, तो चुनाव समय पर क्यों नहीं कराए जा रहे।
प्रदेश में पिछले कई महीनों से ग्राम प्रधान संगठन लगातार समय पर चुनाव कराने की मांग उठा रहे थे। इस मुद्दे को लेकर धरना-प्रदर्शन और ज्ञापन देने का सिलसिला भी जारी था। अप्रैल के अंतिम सप्ताह में हाईकोर्ट ने पंचायती राज विभाग के प्रधान सचिव को अवमानना नोटिस भी जारी किया था। अदालत ने पूछा था कि ओबीसी आयोग के गठन में देरी क्यों हुई।
इसके बाद अगली सुनवाई से ठीक पहले राज्य सरकार ने आयोग के गठन को मंजूरी दी थी।
लाखों प्रतिनिधियों का चुनाव दांव पर, प्रशासनिक तैयारी भी चुनौती
उत्तर प्रदेश में पंचायत व्यवस्था देश की सबसे बड़ी स्थानीय प्रशासनिक व्यवस्थाओं में गिनी जाती है। प्रदेश में 75 जिला पंचायतें, 826 क्षेत्र पंचायतें और 57 हजार 695 ग्राम पंचायतें हैं। इनके साथ जिला पंचायत सदस्यों, बीडीसी सदस्यों और ग्राम प्रधानों के लाखों पदों पर चुनाव होना है।
जिला पंचायतों के 3051 सदस्य, क्षेत्र पंचायतों के 75 हजार 855 सदस्य और हजारों ग्राम प्रधानों का चुनाव एक साथ कराया जाता है। ऐसे में आरक्षण प्रक्रिया पूरी होने में समय लगना स्वाभाविक माना जा रहा है।
इसके अलावा चुनाव कराने वाले कर्मचारी फिलहाल जनगणना से जुड़े कामों में भी लगे हुए हैं। यही वजह है कि प्रशासनिक स्तर पर भी पंचायत चुनाव की तैयारी फिलहाल धीमी दिखाई दे रही है।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या पंचायत चुनाव विधानसभा चुनाव से पहले हो पाएंगे या फिर यह प्रक्रिया अगले साल तक खिंच जाएगी। फिलहाल हाईकोर्ट की सख्ती ने राज्य निर्वाचन आयोग और सरकार दोनों पर जवाब देने का दबाव जरूर बढ़ा दिया है।
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