उत्तर प्रदेश में वोटर लिस्ट से 85,854 मतदाताओं के नाम हटाए जाने को लेकर सोशल मीडिया पर चल रही खबरों पर मुख्य निर्वाचन अधिकारी नवदीप रिणवा ने सफाई दी है। उन्होंने इन खबरों को भ्रामक बताते हुए कहा कि मतदाता सूची के विशेष प्रगाढ़ पुनरीक्षण (SIR) के दौरान निर्धारित कानूनी प्रक्रिया का पालन किया गया। उनके मुताबिक, जिन मतदाताओं के नाम हटाने से संबंधित कार्रवाई हुई, उनके मामलों की जांच निर्वाचन अधिकारियों ने की थी। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि एक व्यक्ति की ओर से बड़ी संख्या में फॉर्म-7 भरकर मतदाताओं के नाम कटवाने की कोशिश वाले जिन मामलों का जिक्र किया गया, उनमें संबंधित फॉर्म निरस्त कर दिए गए थे। ऐसे में वोटर लिस्ट से नाम हटाने को लेकर उठे सवालों पर निर्वाचन विभाग ने अपना पक्ष रखा है।
85,854 वोटरों के नाम हटाने पर क्या बोले मुख्य निर्वाचन अधिकारी?
उत्तर प्रदेश के मुख्य निर्वाचन अधिकारी नवदीप रिणवा ने सोशल मीडिया पर प्रसारित उन दावों का खंडन किया, जिनमें कहा जा रहा था कि SIR-2026 के दौरान निर्वाचन आयोग के सॉफ्टवेयर ने अपने आप फॉर्म-7 तैयार करके 85,854 मतदाताओं के नाम वोटर लिस्ट से हटा दिए।
रिणवा ने कहा कि यह दावा सही नहीं है। उनके अनुसार, किसी भी मतदाता का नाम मनमाने तरीके से नहीं हटाया गया। उन्होंने स्पष्ट किया कि उत्तर प्रदेश में विशेष प्रगाढ़ पुनरीक्षण की प्रक्रिया लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950, निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण नियम, 1960 और निर्वाचन आयोग के 27 अक्टूबर 2025 के निर्देशों के आधार पर पूरी की गई।
निर्वाचन अधिकारी के मुताबिक, संबंधित मामलों में निर्धारित प्रक्रिया के तहत जांच हुई और पात्रता के आधार पर निर्णय लिए गए। उन्होंने आरोपों को गलत धारणाओं पर आधारित बताया।
यह विवाद इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि मतदाता सूची में नाम होना चुनाव में मतदान करने के लिए जरूरी है। ऐसे में नाम हटाने या जोड़ने की प्रक्रिया को लेकर उठने वाले सवाल सीधे मतदाताओं के अधिकारों से जुड़े होते हैं।
12.55 करोड़ मतदाताओं की सूची में 3.26 करोड़ लोगों को नोटिस क्यों मिला?
नवदीप रिणवा ने बताया कि उत्तर प्रदेश की मतदाता सूची में करीब 12.55 करोड़ मतदाता शामिल थे। इनमें से लगभग 3.26 करोड़ मतदाताओं को नो मैपिंग और तार्किक विसंगतियों के कारण नोटिस जारी किए गए थे।
उनके अनुसार, निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण नियम, 1960 के तहत निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारी को मतदाता सूची की जांच करने और जरूरत पड़ने पर किसी मामले का स्वतः संज्ञान लेने का अधिकार है।
नोटिस पाने वाले मतदाताओं से निर्धारित समय के भीतर संबंधित दस्तावेज उपलब्ध कराने को कहा गया था। अधिकारियों को इन दस्तावेजों और मामले की सुनवाई के आधार पर यह तय करना था कि संबंधित व्यक्ति मतदाता सूची में शामिल रहने के लिए पात्र है या नहीं।
रिणवा के मुताबिक, नोटिस से जुड़े मामलों पर निर्णय लेने की अंतिम तारीख 27 मार्च 2026 थी। सुनवाई पूरी होने के बाद निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारी या सहायक निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारी ने पात्र और अपात्र मामलों पर निर्णय लिया।
उन्होंने कहा कि जिन लोगों को पात्र पाया गया, उनके नाम अंतिम मतदाता सूची में शामिल किए गए। वहीं, जिन मामलों में अपात्रता का निर्णय हुआ, उनके नाम अंतिम सूची में शामिल नहीं किए गए।
फॉर्म-7 का इस्तेमाल क्यों हुआ और 85,854 का आंकड़ा कहां से आया?
मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने फॉर्म-7 की प्रक्रिया को लेकर भी स्पष्टीकरण दिया। उनके मुताबिक, जिन मतदाताओं को जांच के बाद अपात्र पाया गया, उनके नाम हटाने की कार्रवाई का रिकॉर्ड रखने के लिए सॉफ्टवेयर में फॉर्म-7 तैयार करने की व्यवस्था की गई थी।
उन्होंने कहा कि इसका उद्देश्य यह रिकॉर्ड सुरक्षित रखना है कि किसी मतदाता का नाम कब और किस वजह से हटाया गया। अगर बिना फॉर्म-7 के नाम सीधे हटा दिए जाएं, तो भविष्य में कार्रवाई का आधार पता लगाने में परेशानी हो सकती है।
रिणवा के मुताबिक, रिपोर्ट में बताए गए 85,854 का आंकड़ा उन मतदाताओं से संबंधित है, जिनके मामलों में निर्वाचन अधिकारियों ने स्वतः संज्ञान लेकर जांच पूरी की और उन्हें अपात्र माना।
यानी निर्वाचन विभाग का कहना है कि यह संख्या कथित तौर पर सॉफ्टवेयर द्वारा बिना जांच के हटाए गए नामों की नहीं, बल्कि जांच के बाद अपात्र पाए गए मामलों से जुड़ी है।
हालांकि, इस स्पष्टीकरण के साथ यह समझना जरूरी है कि किसी व्यक्ति का नाम हटाने के पीछे का आधार और संबंधित प्रक्रिया का रिकॉर्ड मतदाता के लिए अहम है। किसी भी मतदाता को अपने नाम की स्थिति को लेकर संदेह हो, तो उसे आधिकारिक मतदाता सूची में अपना विवरण जांचना चाहिए।
बल्क में फॉर्म-7 भरने की कोशिश पर भी निर्वाचन विभाग की सफाई
रिणवा ने तरबगंज और पीलीभीत विधानसभा क्षेत्रों में बड़ी संख्या में फॉर्म-7 भरे जाने से संबंधित आरोपों पर भी प्रतिक्रिया दी। रिपोर्ट में इन क्षेत्रों के उदाहरणों के आधार पर दावा किया गया था कि SIR-2026 के दौरान एक समुदाय विशेष के मतदाताओं के नाम कटवाने की कोशिश हुई।
मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने कहा कि रिपोर्ट में जिन मामलों का उल्लेख किया गया, उनमें संबंधित फॉर्म-7 निरस्त कर दिए गए थे। उनके अनुसार, इस तरह एक साथ बड़ी संख्या में नाम कटवाने की कोशिशों को सफल नहीं होने दिया गया।
उन्होंने यह भी बताया कि संबंधित रिपोर्ट में उपलब्ध फॉर्म-7 के आंकड़ों का विश्लेषण करने के बाद 198 ऐसे मामले सामने आने की बात कही गई, जिनमें एक ही व्यक्ति ने 10 से अधिक फॉर्म-7 भरे थे। रिपोर्ट के मुताबिक, इन मामलों में कुल 4,740 मतदाताओं के नाम हटाने का प्रयास किया गया था।
रिणवा ने इन आंकड़ों के आधार पर कहा कि उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में लाखों फॉर्म-7 की सूचनाओं के बीच ऐसे 198 मामले सामने आना यह दिखाता है कि बड़े पैमाने पर एक ही व्यक्ति द्वारा फॉर्म-7 दाखिल करना सामान्य स्थिति नहीं थी।
निर्वाचन आयोग की वेबसाइट और रिपोर्ट पर क्या है विवाद?
नवदीप रिणवा ने उन आरोपों को भी खारिज किया, जिनमें कहा गया था कि SIR की प्रक्रिया से संबंधित जानकारी सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं थी। उन्होंने बताया कि निर्वाचन आयोग की आधिकारिक वेबसाइट पर 27 अक्टूबर 2025 को जारी दिशा-निर्देश उपलब्ध हैं। उनके अनुसार, उत्तर प्रदेश में पुनरीक्षण की प्रक्रिया इन्हीं निर्देशों के आधार पर की गई।
उन्होंने रिपोर्ट तैयार करने वाले पक्ष के सवाल भेजने के तरीके पर भी आपत्ति जताई। रिणवा के मुताबिक, 8 अक्टूबर 2026 को दोपहर 3:32 बजे ईमेल के जरिए सवाल भेजे गए और उसी दिन शाम 7 बजे तक विस्तृत जवाब मांगा गया। उन्होंने कहा कि उन तीन सवालों में रिपोर्ट में दिए गए सभी आंकड़ों, तथ्यों और उदाहरणों का उल्लेख नहीं था।
मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने आरोप लगाया कि इतने कम समय में जवाब मांगने के बाद अगले दिन रिपोर्ट प्रकाशित करना निष्पक्ष जांच के उद्देश्य पर सवाल खड़े करता है। उन्होंने पूरी प्रक्रिया को कानूनी और पारदर्शी बताते हुए मतदाता सूची में गड़बड़ी के आरोपों को निराधार करार दिया।
आम मतदाताओं के लिए सबसे अहम बात यह है कि वोटर लिस्ट में अपना नाम और विवरण समय-समय पर जांचते रहें। निर्वाचन विभाग ने प्रक्रिया को नियमों के मुताबिक बताया है, जबकि विवादित रिपोर्ट के दावों का खंडन किया गया है। मतदाता सूची से जुड़े किसी भी मामले में अंतिम स्थिति जानने के लिए निर्वाचन आयोग के आधिकारिक रिकॉर्ड और संबंधित निर्वाचन अधिकारी की जानकारी को प्राथमिकता देना उचित होगा।



