UPI से पेमेंट करना आम जिंदगी का हिस्सा बन चुका है। चाय की दुकान से लेकर बड़े मर्चेंट तक, QR कोड स्कैन करके भुगतान अब रोजमर्रा की आदत है। ऐसे में UPI से जुड़े शुल्क ढांचे में बदलाव का असर सिर्फ पेमेंट कंपनियों तक सीमित नहीं रह सकता। इसका असर बैंकों, फिनटेक कंपनियों और शेयर बाजार पर भी दिखाई दे सकता है। सरकार की ओर से 2,000 रुपये से अधिक के मर्चेंट ट्रांजैक्शन पर 0.4 फीसदी तक MDR का ढांचा लाने के बाद निवेशकों की नजर उन कंपनियों पर टिक गई है, जो डिजिटल पेमेंट इकोसिस्टम में सीधे तौर पर काम करती हैं।
अब तक UPI पर मर्चेंट से शुल्क नहीं लिया जाता था। इसके कारण इस पूरे सिस्टम की लागत का बड़ा हिस्सा बैंकों और सरकार पर रहता था। लेकिन ट्रांजैक्शन का पैमाना लगातार बढ़ने के साथ सर्वर, साइबर सिक्योरिटी और तकनीकी ढांचे पर होने वाला खर्च भी महत्वपूर्ण हो गया है। नए राजस्व मॉडल के बाद बाजार में यह चर्चा तेज है कि पेमेंट कंपनियों और संबंधित बैंकों की कमाई में आगे क्या बदलाव आ सकता है।
नए MDR मॉडल से किन कंपनियों को फायदा मिलने की उम्मीद?
एआर वेल्थ रिसर्च के संस्थापक पार्टनर लोकेश सेठिया के मुताबिक, UPI के नए रेवेन्यू-शेयरिंग मॉडल में बैंक और मर्चेंट से जुड़ी सेवाएं देने वाली कंपनियों की भूमिका अहम होगी। उनके अनुसार Paytm, Yes Bank और Pine Labs जैसी कंपनियां इस बदलाव से लाभ की स्थिति में आ सकती हैं।
तर्क यह है कि बड़े पैमाने पर डिजिटल ट्रांजैक्शन संभालने वाली कंपनियों के लिए अब एक अतिरिक्त आय का रास्ता खुल सकता है। शुरुआत में इसका असर सीमित दिखाई दे सकता है, लेकिन लंबे समय में बड़े ट्रांजैक्शन वॉल्यूम वाली संस्थाओं के लिए यह महत्वपूर्ण बन सकता है।
विशेषज्ञों के अनुमान के मुताबिक, कुछ बैंकों के PBT और PAT में 5 से 10 फीसदी तक की संभावित बढ़ोतरी हो सकती है। हालांकि यह एक अनुमान है और वास्तविक असर ट्रांजैक्शन वॉल्यूम, राजस्व हिस्सेदारी और शुल्क व्यवस्था के लागू होने के तरीके पर निर्भर करेगा।
Paytm में तेजी ने क्यों खींचा निवेशकों का ध्यान?
UPI MDR की घोषणा के बाद Paytm की मूल कंपनी One97 Communications के शेयरों में तेज हलचल देखने को मिली। बुधवार के कारोबार में शेयर 7 फीसदी से ज्यादा चढ़ा और 52 हफ्तों के नए उच्च स्तर पर पहुंच गया।
कारोबार के दौरान शेयर 7.2 फीसदी उछलकर 1,856.50 रुपये तक पहुंचा। दिए गए आंकड़ों के मुताबिक, मार्च 2026 में दर्ज 52 हफ्तों के निचले स्तर 947.10 रुपये की तुलना में यह करीब 96 फीसदी ऊपर था।
बाजार में यह तेजी इस उम्मीद से जोड़ी जा रही है कि MDR व्यवस्था से Paytm के मर्चेंट कारोबार के लिए अतिरिक्त राजस्व का रास्ता खुल सकता है। Pine Labs को लेकर भी विश्लेषकों का रुख सकारात्मक बताया गया है, हालांकि उसके शेयर में कुछ मुनाफावसूली देखने को मिली।
सेबी रजिस्टर्ड रिसर्च एनालिस्ट मुदित गोयल के अनुसार, फिनटेक कंपनियों में खास तौर पर Paytm को लेकर बाजार की धारणा सकारात्मक हुई है। उनका कहना है कि मर्चेंट बिजनेस से अतिरिक्त आय की संभावना कंपनी के बिजनेस मॉडल को मजबूत कर सकती है।
पेमेंट एग्रीगेटर्स के लिए बन सकता है बड़ा राजस्व पूल
इस बदलाव का एक बड़ा असर उन कंपनियों पर पड़ सकता है जो Point-of-Sale यानी POS और QR आधारित पेमेंट इकोसिस्टम में काम करती हैं। सेबी रजिस्टर्ड रिसर्च एनालिस्ट राजेश शर्मा के मुताबिक, ऐसी कंपनियों को MDR व्यवस्था से फायदा मिल सकता है।
इसी दिशा में Jefferies और Bernstein जैसी ब्रोकरेज फर्मों के अनुमान का भी जिक्र किया गया है। इनके मुताबिक, नए शुल्क ढांचे से पेमेंट इंडस्ट्री के लिए सालाना करीब 22,000 करोड़ रुपये तक का अतिरिक्त राजस्व पूल तैयार हो सकता है।
हालांकि यह अनुमान पूरे पेमेंट उद्योग के संभावित राजस्व पूल से जुड़ा है। इसका मतलब यह नहीं है कि पूरी रकम किसी एक कंपनी की कमाई बनेगी। अलग-अलग कंपनियों को मिलने वाला फायदा उनके कारोबार, बाजार हिस्सेदारी और राजस्व-साझेदारी की व्यवस्था पर निर्भर करेगा।
आम UPI यूजर पर क्या होगा असर?
सबसे अहम बात यह है कि MDR का प्रस्तावित ढांचा मुख्य रूप से मर्चेंट ट्रांजैक्शन से जुड़ा है। इसलिए इसका सीधा मतलब यह नहीं है कि हर बार UPI से भुगतान करने वाले ग्राहक से अलग से शुल्क लिया जाएगा। आम यूजर के लिए UPI की लागत और मर्चेंट पक्ष पर लागू शुल्क को अलग-अलग समझना जरूरी है।
बाजार के नजरिए से देखें तो असली बदलाव उन कंपनियों के लिए हो सकता है जिनका कारोबार डिजिटल पेमेंट के बड़े नेटवर्क पर निर्भर है। अगर MDR से स्थायी राजस्व मॉडल बनता है, तो इससे पेमेंट कंपनियों और संबंधित वित्तीय संस्थानों की कमाई की संरचना बदल सकती है।
फिलहाल शेयर बाजार में Paytm, Pine Labs और संबंधित बैंकिंग एवं पेमेंट कंपनियों को लेकर उम्मीदें बढ़ी हैं। लेकिन किसी शेयर में निवेश का फैसला केवल MDR की खबर के आधार पर करना पर्याप्त नहीं होगा। कंपनी की वैल्यूएशन, कमाई, नकदी प्रवाह, प्रतिस्पर्धा और बाजार की स्थिति जैसे दूसरे पहलुओं को भी देखना जरूरी है।



