पिछड़ों के आरक्षण को तोड़कर, आगे निकलने की होड़ में बीजेपी

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‘सबका साथ, सबका विकास’ का नारा देने वाली बीजेपी अब ‘पिछड़ों का आरक्षण, सबका उत्थान’ करने की ओर बढ़ रही है. जिसके निशाने पर 2019 के साथ वो नेता भी हैं जो खुद को पिछड़ों का मसीहा बताते हैं। ये फार्मूला बिहार से चलकर यूपी आया है, वहां नीतीश को सफल बनाने के बाद अब यूपी में बीजेपी का भी उद्धार करेगा।

कोटे में कोटे का बंटवारा कहने के लिए तो अति पिछड़ों के उद्धार के लिए है। लेकिन इससे सियासी समीकरणों को भी साधने की पूरी कोशिश हैं. जिससे एक साथ कई मोर्चों पर बीजेपी विरोधियों को वोटरों से दूर, और खुद को उनके पास कर लेगी।

यानी अबतक जो संपन्न पिछड़े आरक्षण पर कब्जा करके बैठे थे, उनका एकाधिकार समाप्त कर, सबमें बांटने का प्रावधान किया जाएगा। साथ ही दशकों से चली आ रही जातिगत राजनीति के पुरोधाओं के बड़े वोट बैंक का बड़ा हिस्सा अपने खाते में करने में बीजेपी कामयाब होगी।

भासपा, अपना दल की मांग पूरी

जिसकी मांग बीजेपी के सहयोगी अपना दल और सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी शुुरु से करते आ रहे थे। हद तो तब हो गई जब सुहेलदेव पार्टी के अध्यक्ष ओम प्रकाश राजभर बीजेपी के खिलाफ ही हो गए थे। आरक्षण के टुकड़े करने के लिए बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह से भी मिल चुके थे। अब उनके हाथ ये मुद्दा बीजेपी ने छिन लिया है। जिसको वो 2019 के चुनाव में भुनाने से पीछे नहीं हटेगी। अपना दल भी आरक्षण में आरक्षण की मांग लंबे समय से कर रहा था।

राजनाथ सिंह ने  किया था प्रयास

ऐसा नहीं है कि कोटा में कोटा करने का प्रयास पहली बार हुआ है।  ऐसी कोशिश तब भी की गई थी, जब साल 2002 में राजनाथ सिंह यूपी के मुख्यमंत्री थे और असफलता हाथ लगी थी. उससे पहले 1976 में डॉ.छेदी लाल साथी की अध्यक्षता में कमेटी बनी थी, जिसमें पिछड़ी जातियों को तीन हिस्सों में बांटने की सिफारिश की गई थी, जो आज तक लागू नहीं हो पाई.

क्रीमी लेयर को लगेगा झटका

पिछड़ा समाजिक न्याय समिति ने अपनी रिपोर्ट में पिछड़े वर्ग में सबसे कम जातियों को रखने की सिफारिश की है. समिति ने पिछड़े वर्ग में यादव, कुर्मी जैसी संपन्न जातियों को रखा है. अति पिछड़े में वे जातियां हैं जो कृषक या दस्तकार हैं और सर्वाधिक पिछड़े में उन जातियों को रखा गया है, जो पूर्णरुपेण भूमिहीन,गैरदस्तकार, अकुशल श्रमिक हैं. समिति की रिपोर्ट में पिछड़ा वर्ग में 12 जातियां, 59 जातियों को अति पिछड़ा और 79 जातियां सर्वाधिक पिछड़ों की श्रेणी में रखी गई हैं.

महादलित हो सकते हैं लामबंद

समिति ने एससी/एसटी में दलित, अति दलित और महा दलित श्रेणी बनाकर इसे भी तीन हिस्से में बांटने की सिफारिश की है. समिति ने एससी/एसटी वर्ग में 87 जातियों को शामिल करने का प्रस्ताव भी दिया है. दलित वर्ग में चार, अति दलित में 37 व महादलित में 46 जातियों को शामिल करने की सिफारिश की गई है. अपने प्रस्ताव में समिति ने 22 फ़ीसदी एससी/एसटी आरक्षण में दलित जातियों को 7 फीसदी, अतिदलित जातियों को 7 फीसदी और महादलित जातियों को 8 फीसदी आरक्षण देने की सिफारिश की गई है.

बीजेपी को हो सकता है फायदा

योगी सरकार अगर इस रिपोर्ट को मान लेती है तो वो ऐसा होने के उसे नुकसान कम फायदा ज्यादा होता दिख रहा है. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पिछड़ा और दलित बीजेपी के खिलाफ हो जाएंगे क्योंकि इनका आरक्षण सीमित हो जाएगा. वहीं अति पिछड़ा, सर्वाधिक पिछड़ा सरकार के साथ आ सकते हैं। साथ ही दलितों में क्रीमी लेयर को छोड़कर अति दलित, महा दलित सरकार के साथ आ सकते हैं। जैसा की बिहार में नीतीश कुमार को फायदा मिला था।

ये कोटा में कोटा की मांग अतिपिछड़ा, सर्वाधिक पिछड़ा, अति दलित और महा दलित काफी समय से कर रहे थे। नेताओं ने इसको भुनाया है. अब बीजेपी के लिए ये मुद्दा नया नहीं है, एससीएसटी एक्ट के बाद बीजेपी का ये बड़ा दांव हैं, जिसका असर होगा। अब जातिगत राजनीति करने वाली पार्टियों को नुकसान कितना होगा इसका आंकलन बाद में होगा।

                                               (ब्रजेश शुक्ल, वरिष्ठ पत्रकार)

पिछड़ा समाजिक न्याय समिति की रिपोर्ट सरकार को जल्द से जल्द लागू करना चाहिए. सरकार ने सिफारिशों को लागू न किया तो मैं धरने पर बैठूंगा।

(ओम प्रकाश राजभर, अध्यक्ष, सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी)

 

अभी समिति की सिफारिशों का अध्ययन हो रहा है. जिसमें सबका उत्थान हो, सबका विकास हो और सर्वसमाज को सम्मान मिले उसके लिए केंद्र सरकार ने कमेटी गठित की थी. उसकी रिपोर्ट आ गई है. यह सिफारिश स्वागत योग्य है. अभी इस पर अध्ययन चल रहा है जो भी सरकार फैसला लेगी उससे मीडिया                                                 को अवगत कराया जाएगा.

                                              (केशव प्रसाद मौर्य, डिप्टी सीएम, यूपी सरकार)

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