बीजेपी का सबसे बड़ा दोस्त बनने की होड़ में शिवपाल और राजा भइया, कौन पड़ेगा भारी

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समाजवादी शिवपाल सिंह यादव अब प्रगतिशील समाजवादी हो गए हैं। एकला चलने के आदी ‘राजा’ अपना नया गढ़ ” जन सत्ता दल (लोकतांत्रिक)” बनाकर व्यूह रचना कर रहे हैं। दोनों को सत्तारूढ़ दल का साया होने का दावा किया जा रहा है।

अगर ये बात रत्ती भर भी सच है, तो सवाल खड़ा होता है, कि आखिर इन दोनों में सबसे ज्यादा सत्तारूढ़ दल के लिए फायदेमंद कौन होगा। जो मोदी को दोबारा किंग बनने में अपनी बड़ी भूमिका निभाएगा. जिसके लिए बीजेपी ने दोनों पर मेहरबानी दिखाकर पहले से ही जाल डाल रखा है।

शिवपाल, राजा भइया ने बदले समीकरण

यूपी जैसे बड़े प्रदेश में इसबार 2019 लोकसभा चुनाव का समीकरण बेहद पेंचीदा हो गए है। एकतरफ जहां सपा से शिवपाल अलग हो गए हैं। वहीं निर्दलीय विधायक राजा भइया नई पार्टी बनाकर चुनावी मैदान में उतरने की तैयारी में है। शिवपाल अपनी शर्तों में महागठबंधन के साथ जाने को तैयार है। जिनको लेना कांग्रेस समेत दूसरी पार्टियों को संभव नहीं है। क्योंकि उनके आने से सपा और बसपा दोनों को दिक्कत हो सकती है। ऐसे में शिवपाल के पास अकेले चुनाव लड़ने के अलावा कोई चारा नहीं है।

खुद को बड़ा साबित करने में जुटे दोनों

वहीं राजा भइया ने अपने विकल्प खुले रखे हैं। अब बीजेपी का शिवपाल की राजनीतिक हैसियत को नापने में जोर है। जिसका पहला प्रदर्शन लखनऊ में होने वाली 9 दिसंबर को रैली से होगा। प्रगतिशील समाजवादी पार्टी (लोहिया) की लोकसभा चुनाव में भूमिका और उनके असर का भी पता चलेगा। क्योंकि राजा भइया ने जिसतरह से रमाबाई मैदान में भीड़ जुटाई थी। उससे उन्हें हल्के में नहीं लिया जा सकता। जबकि शिवपाल को अभी खुद को साबित करना है.

बीजेपी दोनों पर मेहरबान

क्योंकि आंकडों और हालिया सर्वे पर नजर डाले तो विपक्ष के महागठबंधन होने से बीजेपी को नुकसान हो सकता है। ऐसे में शिवपाल और राजा भइया का विकल्प बीजेपी को पहले से ही लेकर चलना बेहतर होगा। जिसके आसार भी दिखने लगे हैं। पहले बीजेपी ने शिवपाल को पार्टी कार्यालय के लिए माया का बड़ा बंगला देकर बड़ी चाल चल दी है। वहीं राजा भइया ने पार्टी बनाने से पहले सीएम योगी के साथ हुई आधे घंटे की मुलाकात के सियासी मायने निकाले जा रहे हैं।

बीजेपी का दोस्ताना रवैया

2019 में बीजेपी को मात देने के लिए विपक्ष महागठबंधन बनाने की तैयारी में है, तो बीजेपी भी  उनकी तैयारी को लेकर चौकन्ना है। महागठबंधन की चाल और समीकरण से किसी खतरे को भांपकर अभी से ही अपनी गोलबंदी कर रही है। चाहे वो सपा से टूटकर आए शिवपाल हों, या फिर राजा भइया।

शिवपाल, राजा हो सकते हैं विकल्प

2014 में बीजेपी और सहयोगियों की सीटों की संख्या कुल 73 थी। जो उपचुनाव हारने के बाद घटकर 70 हो गई है। ऐसे में बीजेपी 2019 में सत्ता वापसी के लिए विकल्पों पर भी नजर बनाए हुए है। चुनावी गणित के मुताबिक शिवपाल और राजा भइया के असर का भी पूरा ध्यान रखा जा रहा है। ताकि चुनाव परिणाम के अनुसार उनका उपयोग किया जा सके।

राजा भइया का सियासी रुतबा

राजा भइया की सियासी पकड़ की बात करें, तो अभी से सोशल मीडिया में युवाओं का समर्थन जोर शोर से मिल रहा है। वहीं दूसरी तरफ प्रदेश में ठाकुर वोट बैंक में भी उनकी ठीकठाक पकड़ है। जबकि प्रतापगढ़ और कौशांबी जैसे जिले में उनका अच्छा खासा रुतबा और दबदबा है। दोनों ही सीटों पर बड़ी संख्या में ठाकुरों के साथ सवर्ण वोट बैंक उनके साथ आ सकता है।

शिवपाल करेंगे सपा पर चोट

शिवपाल यादव को भी उनके विरोधी खासकर सपा के नेताओं और प्रवक्ताओं ने बीजेपी की बी टीम कहा है। हालांकि सियासी पंडितों की माने तो शिवपाल यादव सपा को उनके गढ़ इटावा, फिरोजाबाद, कन्नौज, मैनपुरी के साथ कुछ दूसरे जिलों में नुकसान पहुंचा सकते हैं। अगर शिवपाल की पार्टी लोकसभा में कुछ सीटें पा गई। साथ ही सपा को कमजोर करने में कामयाब हुए तो बीजेपी को इसका सीधा फायदा मिल सकता है।

देश की राजनीति के जानकर प्रदीप सिंह बताते हैं कि.. राजा भइया की सवर्णों में पकड़ है। बिना किसी से गठबंधन किए उनका ज्यादा असर प्रदेश में नहीं दिखता। कुछ सीटों पर उनका प्रभाव किसी को जिताने में जरूर कामयाब हो सकता है। वहीं शिवपाल की राजनीतिक जमीन को लेकर कहते हैं, शिवपाल अकेले कुछ नहीं कर सकते। वो बीजेपी को उतना ही फायदा देंगे, जितना ज्यादा से ज्यादा सपा का नुकसान करेंगे.

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