पत्थरबाजों के हमले में उत्तराखंड का जवान शहीद

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uttarakhand soldier martyred in J&K

पिथौरागढ़: जिले की गंगोलीहाट, तहसील के बुंगली क्षेत्र का एक जवान राजेंद्र सिंह जम्मू कश्मीर में शहीद हो गए. शहीद राजेंद्र परिवार के इकलौते पुत्र थे. उनका पार्थिव शरीर शनिवार को गांव पहुंचने की उम्मीद है. राजेंद्र को इसी दीवाली पर छुट्टी आना था लेकिन काल को कुछ और मंजूर था. शुक्रवार को उसकी शहादत की खबर ने परिजनों, दोस्तों एवं क्षेत्रवासियों को स्तब्ध कर दिया.

बुंगली क्षेत्र के बडेनाकुंड गांव के राजेंद्र सिंह बुंगला शुक्रवार को अनंतनाग जिले के काजीकुंडाताल में 25 अक्टूबर को पेट्रोलिंग पर थे इसी दौरान पत्थरबाजों का हमला हो गया. हमले में उनके सिर में चोट लगी इसी चोट से 23 वर्ष के राजेंद्र के सीमा पर शहीद होने की जानकारी मिलते ही बुंगली क्षेत्र में शोक की लहर दौड़ गई. शहीद के पिता चंद्र सिंह गांव में ही खेतीबाड़ी कर आजीविका चलाते हैं. मां मोहिनी देवी गृहणी हैं. तीन बहनों के इकलौते अविवाहित भाई राजेंद्र की बड़ी बहन रेखा की शादी हो चुकी है. दो छोटी बहन खीमा और पूजा की जिम्मेदारी राजेंद्र के कंधों पर ही थी. राजेंद्र तीन वर्ष पूर्व ही जाट रेजीमेंट में भर्ती हुआ थे. इकलौते पुत्र की शहीद होने सूचना से मां-पिता सदमे में हैं. मां बार-बार बेहोश हो रही हैं. छोटी बहनों का रो-रोकर बुरा हाल है.

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दो दिन पूर्व दोस्त से हुई थी बात

शहीद राजेंद्र सिंह ने दो रोज पूर्व ही जिला मुख्यालय में पढ़ाई कर रहे अपने दोस्त पंकज सिंह बोरा से फोन पर बात की थी. क्षेत्र का हालचाल लेने के बाद राजेंद्र ने कहा था कि वह दीपावली पर घर आएंगे , लेकिन शुक्रवार को उसके शहीद होने की सूचना आ गई. पंकज ने बताया कि राजेंद्र काफी होनहार थे. विज्ञान वर्ग से इंटरमीडिएट की परीक्षा पास करने के बाद उन्होंने सेना में जाने लक्ष्य तय किया था और इसमें सफल रहा. एक माह पूर्व तक वह बरेली में पोस्टेड थे इसके बाद उसकी तैनाती जम्मू कश्मीर में हो गई. 15 दिन पूर्व ही वह जम्मू कश्मीर पहुंचा थे.

एथलेटिक्स के जीते थे कई पुरस्कार

शहीद राजेंद्र एथलेटिक्स का खिलाड़ी थे. उन्होंने विद्यालयी खेल कूद प्रतियोगिता में शानदार प्रदर्शन कर कई पुरस्कार जीते.

नहीं देख पाए नया घर

राजेंद्र सिंह ने हाल ही में अपने गांव में नया मकान बनाने का काम शुरू किया था. शहीद के दोस्त पंकज ने बताया कि सेना में भर्ती होने से पहले राजेंद्र के परिवार की आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी नहीं थी. परिवार के पास पुराना मकान था. राजेंद्र ने गांव में ही नया घर बनाना शुरू किया था, लेकिन राजेंद्र अपने सपनों का घर नहीं देख पाया.

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