देशभर के पुलिस बलों को आधुनिक बनाने की दिशा में केंद्र सरकार ने एक नई पहल की है। सरकार ने पुलिस आधुनिकीकरण के लिए एक नई अम्ब्रेला योजना तैयार की है और इसे सैद्धांतिक मंजूरी दिलाने के लिए वित्त मंत्रालय के व्यय विभाग के पास भेजा है। केंद्र ने बुधवार को सुप्रीम कोर्ट को बताया कि इस योजना का प्रस्ताव 8 जुलाई को भेजा गया था और फिलहाल उस पर विचार चल रहा है। इसी सुनवाई में सरकार ने पुलिस थानों में CCTV कैमरों को लेकर भी बड़ा अपडेट दिया। CCTV लगाने के लिए चल रही वित्तीय सहायता योजना की अवधि अब 31 मार्च 2027 तक बढ़ा दी गई है।
पुलिस आधुनिकीकरण पर केंद्र का नया प्लान, सुप्रीम कोर्ट में दी जानकारी
मामले की सुनवाई जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ कर रही थी। केंद्र सरकार की ओर से अपर सॉलिसिटर जनरल राजकुमार भास्कर ठाकरे ने अदालत को नई अम्ब्रेला योजना की जानकारी दी।
सरकार ने बताया कि पुलिस बलों को आधुनिक जरूरतों के मुताबिक मजबूत करने के लिए तैयार किए गए प्रस्ताव को वित्त मंत्रालय के व्यय विभाग के सामने रखा गया है। सुप्रीम कोर्ट ने भी इस योजना से जुड़े दस्तावेज रिकॉर्ड पर रखने का निर्देश दिया है।
अदालत ने केंद्र को अतिरिक्त दस्तावेज दाखिल करने के लिए दो सप्ताह का समय दिया है। अब मामले की अगली सुनवाई 1 सितंबर को होगी।
CCTV पर भी बड़ा अपडेट, मार्च 2027 तक बढ़ी योजना
इस मामले का दूसरा अहम हिस्सा पुलिस थानों में CCTV कैमरों की व्यवस्था से जुड़ा है। सुप्रीम कोर्ट लंबे समय से इस बात की निगरानी कर रहा है कि पुलिस स्टेशनों में कैमरे लगाए जाएं और वे सही तरीके से काम भी करें।
केंद्र ने अदालत को बताया कि CCTV लगाने के लिए वित्तीय सहायता देने वाली योजना की अवधि बढ़ाकर 31 मार्च 2027 कर दी गई है। इसका मतलब है कि राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को पुलिस थानों में CCTV व्यवस्था पूरी करने के लिए अतिरिक्त समय और वित्तीय सहायता का ढांचा उपलब्ध रहेगा।
22 जुलाई की पिछली सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने CCTV लगाने की स्थिति में सुधार पर संतोष जताया था। अदालत की मदद कर रहे एमिकस क्यूरी और वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ दवे ने भी बताया था कि कई राज्यों में कैमरे लगाने का काम तेजी से आगे बढ़ रहा है।
हर थाने में सिर्फ कैमरा नहीं, ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग भी जरूरी
CCTV व्यवस्था को लेकर सुप्रीम कोर्ट के निर्देश काफी व्यापक हैं। पुलिस थानों के सिर्फ मुख्य हिस्से में कैमरा लगाना पर्याप्त नहीं है। कैमरों की पहुंच प्रवेश और निकास द्वार, मुख्य गेट, हवालात, गलियारों, लॉबी, रिसेप्शन और हवालात के बाहर के क्षेत्र तक होनी चाहिए।
इन कैमरों में नाइट विजन के साथ ऑडियो और वीडियो रिकॉर्डिंग की सुविधा भी जरूरी है। रिकॉर्ड किए गए डेटा को कम से कम एक साल तक सुरक्षित रखने का निर्देश है।
इस व्यवस्था का मकसद पुलिस हिरासत में मानवाधिकारों के उल्लंघन की शिकायतों की स्थिति में रिकॉर्ड उपलब्ध कराना है। यानी किसी व्यक्ति की पुलिस थाने में मौजूदगी के दौरान क्या हुआ, इसकी जांच के लिए रिकॉर्डिंग महत्वपूर्ण सबूत बन सकती है।
CCTV का खर्च कैसे उठाया जाता है?
केंद्र सरकार ने CCTV स्थापना के लिए राज्यों और केंद्र के बीच वित्तीय हिस्सेदारी का ढांचा भी तय किया है।
केंद्र शासित प्रदेशों में CCTV लगाने का पूरा खर्च केंद्र सरकार उठाती है। वहीं पहाड़ी राज्यों में 90 फीसदी राशि केंद्र और 10 फीसदी राज्य सरकार देती है। बाकी राज्यों के लिए केंद्र की हिस्सेदारी 60 फीसदी और राज्य सरकार की हिस्सेदारी 40 फीसदी है।
पुलिस थानों में CCTV लगाने की व्यवस्था को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने पहली बार 2018 में निर्देश दिए थे। इसका उद्देश्य पुलिस हिरासत में मानवाधिकारों के उल्लंघन को रोकना और जवाबदेही बढ़ाना था।
बाद में पुलिस थानों में लगे कैमरों के खराब होने की खबरों पर सुप्रीम कोर्ट ने मामले का स्वतः संज्ञान लिया। दिसंबर 2020 में अदालत ने CCTV से जुड़े निर्देशों का दायरा बढ़ाते हुए CBI, ED और NIA जैसी केंद्रीय जांच एजेंसियों के कार्यालयों में भी CCTV और रिकॉर्डिंग सिस्टम लगाने को जरूरी कर दिया था।
अब नई अम्ब्रेला योजना और CCTV सहायता योजना की अवधि बढ़ाए जाने से पुलिस व्यवस्था के आधुनिकीकरण और निगरानी तंत्र को आगे बढ़ाने की कोशिश साफ दिखाई देती है। आम नागरिक के लिए इसका सीधा मतलब यही है कि पुलिस व्यवस्था में तकनीक और रिकॉर्डिंग की भूमिका आने वाले समय में और बढ़ सकती है।


