लापता होते ही FIR जरूरी! उम्र या जेंडर नहीं बनेगा बहाना, सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस को दी सख्त चेतावनी

लापता होते ही FIR जरूरी! उम्र या जेंडर नहीं बनेगा बहाना, सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस को दी सख्त चेतावनी

किसी व्यक्ति के अचानक लापता होने पर अब पुलिस के लिए उम्र या जेंडर का आधार बनाकर FIR टालना मुश्किल होगा। सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया है कि लापता व्यक्ति की सूचना मिलते ही तुरंत FIR दर्ज करनी होगी, चाहे वह बच्चा हो या वयस्क, पुरुष हो या महिला। कोर्ट ने कहा कि उसके पुराने आदेश में इस्तेमाल किया गया शब्द “person” सिर्फ बच्चों तक सीमित नहीं है, बल्कि हर व्यक्ति पर लागू होता है। साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को चेतावनी दी है कि अगर किसी ने इस निर्देश का पालन नहीं किया तो संबंधित मुख्य सचिव और पुलिस महानिदेशक के खिलाफ अवमानना की कार्रवाई हो सकती है।

यह निर्देश जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने मानव तस्करी रोकने और लापता लोगों को तलाशने से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान दिया। मामला G. Ganesh बनाम State of Tamil Nadu & Ors से जुड़ा है।

सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया नियम, बच्चे ही नहीं हर व्यक्ति के लिए FIR

सुप्रीम कोर्ट ने 22 मई 2026 के अपने पुराने आदेश का जिक्र करते हुए कहा कि सभी राज्यों को किसी भी व्यक्ति के लापता होने की सूचना मिलने पर FIR दर्ज करने का निर्देश दिया गया था। लेकिन अदालत को बताया गया कि कुछ राज्य “person” शब्द की व्याख्या केवल बच्चों के तौर पर कर रहे हैं।

कोर्ट ने इस दलील को सिरे से खारिज कर दिया। पीठ ने कहा कि पहले के आदेश की भाषा स्पष्ट थी और इसमें किसी तरह की अस्पष्टता नहीं थी। “Person” का मतलब हर व्यक्ति, यानी उम्र या जेंडर की किसी सीमा के बिना है।

कोर्ट ने राज्यों की इस व्याख्या को गंभीरता से लेते हुए इसे जानबूझकर की गई गलत व्याख्या बताया। संदेश साफ है—किसी वयस्क के लापता होने की शिकायत को भी उसी गंभीरता से लिया जाना चाहिए, जिस तरह किसी बच्चे के गायब होने की सूचना पर कार्रवाई की जाती है।

‘गोल्डन ऑवर्स’ में कार्रवाई जरूरी, जांच का इंतजार नहीं

सुप्रीम कोर्ट ने अपने 22 मई के निर्देशों में यह भी स्पष्ट किया था कि पुलिस को FIR दर्ज करने से पहले किसी प्रारंभिक जांच का इंतजार नहीं करना चाहिए। परिवार या अभिभावकों से पहले खुद तलाश शुरू करने की उम्मीद करना भी उचित नहीं है।

किसी व्यक्ति के लापता होने के बाद शुरुआती कुछ घंटे बेहद महत्वपूर्ण माने गए हैं। अदालत ने इन्हें ‘गोल्डन ऑवर्स’ बताया था। इसी अवधि में सुरक्षित बरामदगी की संभावना सबसे अधिक रहती है। इसलिए पुलिस तंत्र को सूचना मिलते ही सक्रिय होना चाहिए।

FIR में भारतीय न्याय संहिता, 2023 और मामले के अनुसार अपहरण, किडनैपिंग या मानव तस्करी से जुड़े लागू कानूनी प्रावधान शामिल करने के निर्देश भी दिए गए हैं।

अगर जांच के दौरान पुलिस को पर्याप्त कारण मिलता है कि मामला मानव तस्करी से जुड़ा है, तो केस को संबंधित विशेषज्ञ इकाई को ट्रांसफर करना होगा। इसके लिए चार महीने की अवधि पूरी होने का इंतजार नहीं किया जा सकता।

राज्यों की लापरवाही पर अब सीधे कार्रवाई का खतरा

सुप्रीम कोर्ट ने 5 अगस्त के अपने ताजा आदेश में यह भी नोट किया कि कई राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों ने पहले दिए गए निर्देशों के पालन को लेकर अब तक हलफनामा दाखिल नहीं किया है। अदालत ने ऐसे मामलों में प्रथम दृष्टया अवमानना का मामला माना है।

कोर्ट ने निर्देश दिया है कि संबंधित राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के मुख्य सचिव और DGP को अवमानना नोटिस जारी किया जाए। उन्हें व्यक्तिगत रूप से अदालत में उपस्थित होकर यह बताना होगा कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का पालन न करने पर उनके खिलाफ अवमानना की कार्रवाई क्यों न शुरू की जाए।

लद्दाख ने भी अपना जवाब दाखिल नहीं किया था। ऐसे में वहां के मुख्य सचिव और DGP को व्यक्तिगत रूप से सत्यापित हलफनामा दाखिल कर गैर-अनुपालन की वजह बताने को कहा गया है।

बरामद व्यक्ति की सुरक्षा से लेकर पोर्टल तक, कोर्ट ने तय की पूरी व्यवस्था

सुप्रीम कोर्ट ने केवल FIR तक बात सीमित नहीं रखी है। पहले के निर्देशों में कहा गया था कि किसी लापता व्यक्ति के मिलने या बचाए जाने के बाद उसकी पहचान और सही अभिभावक का सत्यापन करके उसे बिना अनावश्यक देरी के परिवार को सौंपा जाए।

हालांकि, अगर यह सामने आता है कि व्यक्ति की तस्करी में परिवार या अभिभावक की भूमिका थी, तो उसे उसी परिवार को वापस नहीं किया जाएगा। ऐसे मामलों में देखभाल और सुरक्षा की जिम्मेदारी राज्य की संबंधित एजेंसियों और चाइल्ड वेलफेयर कमेटी जैसी संस्थाओं की होगी।

अदालत ने बरामद या बचाए गए व्यक्ति के आधार सत्यापन या जरूरत पड़ने पर आधार कार्ड जारी करने के निर्देश भी दिए हैं। साथ ही जन्म स्थान पर ही आधार कार्ड जारी करने की संभावना पर विचार करने को कहा गया है, बशर्ते माता-पिता या अभिभावक की स्वैच्छिक सहमति हो।

इसके अलावा केंद्र सरकार को देशभर के संबंधित पोर्टलों को छह सप्ताह के भीतर एकीकृत करने का निर्देश दिया गया है। एंटी-ह्यूमन ट्रैफिकिंग यूनिट्स यानी AHTUs को भी पूरी तरह सक्रिय और काम करने की स्थिति में लाने के लिए पहले ही निर्देश दिए जा चुके हैं।

अब इस मामले की अगली सुनवाई 5 अक्टूबर 2026 को दोपहर 2 बजे होगी। सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश उन परिवारों के लिए महत्वपूर्ण है, जिनका कोई सदस्य अचानक लापता हो जाता है। अदालत ने पुलिस कार्रवाई की शुरुआत को ही स्पष्ट कर दिया है—लापता व्यक्ति की सूचना मिलते ही FIR दर्ज हो और तलाश में देरी न हो।