Shiv Sena Row: सुप्रीम कोर्ट का बड़ा सवाल- क्या आज ही एकनाथ शिंदे को अयोग्य ठहरा सकते हैं? UBT गुट से पूछा अहम सवाल

Shiv Sena Row: सुप्रीम कोर्ट का बड़ा सवाल- क्या आज ही एकनाथ शिंदे को अयोग्य ठहरा सकते हैं? UBT गुट से पूछा अहम सवाल

शिवसेना के भीतर हुए विभाजन और दलबदल विवाद पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान बुधवार को एक ऐसा सवाल उठा, जिसने पूरे मामले को नया मोड़ दे दिया। अदालत ने उद्धव ठाकरे गुट से पूछा कि अगर महाराष्ट्र विधानसभा अध्यक्ष का फैसला रद्द भी कर दिया जाए, तो क्या सुप्रीम कोर्ट खुद एकनाथ शिंदे और उनके साथ गए विधायकों को अयोग्य घोषित कर सकती है?

यह सवाल इसलिए अहम माना जा रहा है क्योंकि मामला केवल बागी विधायकों की सदस्यता तक सीमित नहीं है। इससे शिवसेना की वैधता, चुनाव चिह्न और दलबदल कानून की व्याख्या पर भी असर पड़ सकता है।

चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच सुनील प्रभु बनाम एकनाथ शिंदे मामले की सुनवाई कर रही है। इस याचिका में महाराष्ट्र विधानसभा अध्यक्ष के उस फैसले को चुनौती दी गई है, जिसमें शिंदे गुट के विधायकों को दसवीं अनुसूची के तहत अयोग्य ठहराने से इनकार किया गया था।

सुप्रीम कोर्ट ने क्यों पूछा यह सवाल?

सुनवाई के दौरान जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने वरिष्ठ अधिवक्ता देवदत्त कामत से पूछा कि क्या अदालत आज ऐसा आदेश दे सकती है, जिससे एकनाथ शिंदे सीधे अयोग्य हो जाएं।

उन्होंने कहा कि सवाल यह है कि क्या सुप्रीम कोर्ट विधानसभा अध्यक्ष की भूमिका निभा सकती है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि यदि किसी अधिकारी का फैसला गलत हो, तो अदालत उसे रद्द कर सकती है। लेकिन क्या अदालत खुद वही फैसला लागू भी कर सकती है या मामला सक्षम प्राधिकारी के पास वापस भेजना होगा?

जस्टिस बागची ने यह भी कहा कि इस बात पर विवाद नहीं है कि एकनाथ शिंदे के पास विधायी बहुमत था। लेकिन असली सवाल यह है कि बहुमत हासिल करने के समय उनकी पार्टी में संवैधानिक स्थिति क्या थी।

UBT गुट ने क्या दलील दी?

उद्धव ठाकरे गुट की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल और देवदत्त कामत ने विधानसभा अध्यक्ष के फैसले को कानून के खिलाफ बताया।

कामत ने कहा कि यदि स्पीकर का आदेश मनमाना या गलत है, तो सुप्रीम कोर्ट अपनी न्यायिक समीक्षा की शक्ति का इस्तेमाल कर उसे ठीक कर सकता है। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि यदि स्पीकर का आदेश रद्द होता है, तो उसका सीधा असर चुनाव आयोग द्वारा शिंदे गुट को असली शिवसेना मानने वाले फैसले पर भी पड़ेगा।

सुनवाई के दौरान उन्होंने ICOMM, Subhash Desai और अन्य फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि अयोग्यता संबंधी मामलों में अदालत पहले भी हस्तक्षेप कर चुकी है।

कपिल सिब्बल बोले- गैरकानूनी काम से वैधता नहीं मिल सकती

कपिल सिब्बल ने अदालत में कहा कि किसी गैरकानूनी कदम को केवल समय बीत जाने के आधार पर वैध नहीं माना जा सकता।

उन्होंने तर्क दिया कि यदि कोई कार्रवाई शुरुआत से ही कानून के खिलाफ थी, तो बाद की घटनाओं के आधार पर उसे सही नहीं ठहराया जा सकता। उन्होंने इसकी तुलना सरकारी जमीन पर हुए अवैध निर्माण से करते हुए कहा कि लंबे समय तक बने रहने से वह निर्माण वैध नहीं हो जाता।

सिब्बल ने यह भी कहा कि बागी विधायकों ने स्पीकर के सामने दाखिल हलफनामों में 2018 के पार्टी संविधान का हवाला दिया था, जिसे बाद में “वकीलों की गलती” बताया गया।

चुनाव चिह्न और दलबदल कानून भी दांव पर

इस मामले में अदालत के सामने उद्धव ठाकरे की वह याचिका भी लंबित है, जिसमें चुनाव आयोग के उस फैसले को चुनौती दी गई है, जिसके तहत एकनाथ शिंदे गुट को असली शिवसेना के रूप में मान्यता दी गई और ‘धनुष-बाण’ चुनाव चिह्न आवंटित किया गया।

सिब्बल ने राजेंद्र सिंह राणा बनाम स्वामी प्रसाद मौर्य मामले का हवाला देते हुए कहा कि विपक्षी दल के साथ जाकर राज्यपाल से मुलाकात करना भी दलबदल कानून के उल्लंघन के दायरे में आ सकता है। उन्होंने सूरत और गुवाहाटी में बागी विधायकों की गतिविधियों का जिक्र करते हुए इसे दलबदल का स्पष्ट मामला बताया।

फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने कोई अंतिम फैसला नहीं दिया है। अदालत ने सुनवाई गुरुवार दोपहर 2 बजे तक के लिए स्थगित कर दी है। अब सबकी नजर इस बात पर है कि क्या अदालत केवल स्पीकर के आदेश की समीक्षा करेगी या दलबदल कानून की व्याख्या को लेकर कोई बड़ा संवैधानिक सिद्धांत भी तय करेगी।