त्योहारों से पहले महंगी हुई चीनी पर सियासत तेज, खरगे के 3 सवालों पर सरकार ने दिया जवाब

त्योहारों से पहले महंगी हुई चीनी पर सियासत तेज, खरगे के 3 सवालों पर सरकार ने दिया जवाब

त्योहारों का मौसम शुरू होने से पहले चीनी की बढ़ती कीमतों ने रसोई का बजट बिगाड़ना शुरू कर दिया है। इसी मुद्दे को लेकर कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने केंद्र सरकार पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने दावा किया कि देश में चीनी का भंडार नौ साल के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया है और हालात ऐसे बन गए हैं कि 10 लाख टन चीनी शुल्क-मुक्त आयात करनी पड़ रही है। वहीं, सरकार का कहना है कि कीमतों में बढ़ोतरी की वजह केवल इथेनॉल नीति नहीं है और इसके पीछे कई दूसरे कारण जिम्मेदार हैं।

यह बहस ऐसे समय में तेज हुई है जब आने वाले महीनों में मिठाइयों और घरेलू इस्तेमाल के कारण चीनी की मांग बढ़ने वाली है। ऐसे में कीमतों को लेकर लोगों की चिंता भी स्वाभाविक है।

खरगे ने सरकार से पूछे तीन सीधे सवाल

मल्लिकार्जुन खरगे ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट करते हुए कहा कि देश, जो कभी दुनिया के बड़े चीनी उत्पादकों और निर्यातकों में शामिल रहा है, वहां आज भंडार नौ साल के निचले स्तर पर क्यों पहुंच गया। उन्होंने पूछा कि आखिर ऐसी नौबत क्यों आई कि पहले चीनी का निर्यात रोकना पड़ा और अब 10 लाख टन चीनी का शुल्क-मुक्त आयात करना पड़ रहा है।

उन्होंने दूसरा सवाल कीमतों को लेकर उठाया। खरगे का दावा है कि पिछले तीन महीनों में चीनी करीब 40 प्रतिशत तक महंगी हुई है। उनका कहना है कि त्योहारों से पहले आम लोगों पर महंगाई का अतिरिक्त बोझ पड़ा है और सरकार को इसकी जिम्मेदारी तय करनी चाहिए।

तीसरा सवाल उन्होंने इथेनॉल नीति को लेकर उठाया। खरगे ने कहा कि एक तरफ देश में चीनी का उत्पादन और भंडार घट रहा है, जबकि दूसरी तरफ गन्ने का इस्तेमाल पेट्रोल में इथेनॉल मिश्रण के लिए किया जा रहा है। उन्होंने पूछा कि ऐसी स्थिति में ई20 नीति की समीक्षा क्यों नहीं की जा रही।

सरकार ने कहा- इथेनॉल को जिम्मेदार ठहराना सही नहीं

कांग्रेस के आरोपों के बाद उपभोक्ता मामले, खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण मंत्रालय ने भी अपनी स्थिति स्पष्ट की। मंत्रालय के अनुसार, 20 जुलाई को चीनी की औसत खुदरा कीमत 48.18 रुपये प्रति किलोग्राम थी, जो 20 अगस्त तक बढ़कर 55.70 रुपये प्रति किलोग्राम हो गई।

हालांकि सरकार ने साफ कहा कि इस बढ़ोतरी को केवल इथेनॉल उत्पादन से जोड़ना सही नहीं है। मंत्रालय का कहना है कि कीमतों में वृद्धि के पीछे कई कारण हैं और इथेनॉल के लिए चीनी का इस्तेमाल इसका मुख्य कारण नहीं है।

इथेनॉल के आंकड़ों से सरकार का बचाव

सरकार ने अपने पक्ष में आंकड़े भी पेश किए। मंत्रालय के मुताबिक, इथेनॉल उत्पादन के लिए इस्तेमाल होने वाली चीनी का हिस्सा 2022-23 में करीब 12 प्रतिशत था, जो 2025-26 में घटकर लगभग 9 प्रतिशत रह गया है।

सरकार ने यह भी बताया कि अब देश में बनने वाले इथेनॉल का लगभग तीन-चौथाई हिस्सा अनाज, खासकर मक्के से तैयार किया जा रहा है। मंत्रालय का कहना है कि इसलिए चीनी की मौजूदा कीमतों को सीधे इथेनॉल डायवर्जन से जोड़ना तथ्यात्मक रूप से सही नहीं होगा।

त्योहारों से पहले बढ़ी चिंता, बहस जारी

चीनी की कीमतों में बढ़ोतरी ऐसे समय हुई है जब घरेलू खपत बढ़ने की उम्मीद रहती है। त्योहारों के दौरान मिठाई, प्रसाद और अन्य खाद्य पदार्थों में चीनी की मांग बढ़ जाती है, इसलिए कीमतों का असर सीधे उपभोक्ताओं के खर्च पर पड़ सकता है।

फिलहाल इस मुद्दे पर राजनीतिक बहस तेज है। विपक्ष सरकार की नीतियों पर सवाल उठा रहा है, जबकि सरकार का कहना है कि कीमतों में बढ़ोतरी के कारण बहुआयामी हैं और इथेनॉल नीति को इसका मुख्य कारण बताना उचित नहीं है।