यमुना फ्लडप्लेन केस में आर्ट ऑफ लिविंग को बड़ी राहत, सुप्रीम कोर्ट ने ₹5 करोड़ का पर्यावरण जुर्माना किया रद्द

यमुना फ्लडप्लेन केस में आर्ट ऑफ लिविंग को बड़ी राहत, सुप्रीम कोर्ट ने ₹5 करोड़ का पर्यावरण जुर्माना किया रद्द

दिल्ली की यमुना और उसके बाढ़ वाले इलाके यानी फ्लडप्लेन से जुड़े करीब एक दशक पुराने मामले में सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने ‘आर्ट ऑफ लिविंग’ से जुड़े व्यक्ति विकास केंद्र इंडिया को राहत देते हुए नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) का वह आदेश रद्द कर दिया, जिसके तहत 2016 में आयोजित वर्ल्ड कल्चर फेस्टिवल से यमुना फ्लडप्लेन को नुकसान पहुंचाने के आरोप में 5 करोड़ रुपये का पर्यावरण मुआवजा जमा कराया गया था। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद यह रकम अब आयोजक को वापस मिलेगी।

2016 के कार्यक्रम से शुरू हुआ था पूरा विवाद

मामला मार्च 2016 में दिल्ली में हुए वर्ल्ड कल्चर फेस्टिवल से जुड़ा है। यह कार्यक्रम 11 से 13 मार्च के बीच DND फ्लाईओवर के अपस्ट्रीम में यमुना के सक्रिय फ्लडप्लेन के करीब 25 हेक्टेयर क्षेत्र में आयोजित किया गया था। कार्यक्रम के लिए संबंधित अधिकारियों से अनुमति ली गई थी।

कार्यक्रम को लेकर ‘यमुना जिये अभियान’ के संयोजक मनोज मिश्रा और अन्य पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने NGT का रुख किया था। उनका आरोप था कि आयोजन की तैयारियों और कार्यक्रम के कारण यमुना के संवेदनशील बाढ़ क्षेत्र को गंभीर नुकसान पहुंचा।

इसके बाद NGT ने आयोजकों पर 5 करोड़ रुपये का पर्यावरण मुआवजा लगाया था। बाद की कार्यवाही में इस राशि को फ्लडप्लेन की बहाली और सुधार के लिए इस्तेमाल करने की बात कही गई। यही आदेश बाद में सुप्रीम कोर्ट में चुनौती का आधार बना।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा- नुकसान का सीधा सबूत नहीं

सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा और जस्टिस एनके सिंह की पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए NGT के निष्कर्षों पर कई सवाल उठाए। कोर्ट ने कहा कि उपलब्ध रिकॉर्ड से यह सीधे तौर पर साबित नहीं होता कि वर्ल्ड कल्चर फेस्टिवल के कारण ही यमुना के इकोसिस्टम को नुकसान पहुंचा था।

कोर्ट के सामने यह तथ्य भी आया कि कार्यक्रम के लिए जगह सौंपे जाने से पहले ही फ्लडप्लेन की स्थिति खराब थी। रिकॉर्ड में पहले से मौजूद मलबे और साइट की स्थिति का भी उल्लेख था। आयोजकों ने खुद DDA को वहां पड़े निर्माण मलबे की जानकारी दी थी और उसे हटाने की अनुमति ली थी।

सुप्रीम कोर्ट ने 5 सितंबर 2015 की सैटेलाइट तस्वीर को लेकर भी सवाल उठाया। अदालत के मुताबिक, यह तस्वीर दूसरी उपलब्ध जानकारियों से पूरी तरह मेल नहीं खाती थी। बाद में सरकारी अधिकारियों की एक समिति ने मौके पर घास और पानी पाए जाने की बात कही, जबकि वहां मलबा नहीं मिला। कोर्ट ने यह भी देखा कि आयोजन से पहले और बाद की तस्वीरों में कोई बड़ा अंतर स्पष्ट नहीं था।

‘रेस्टोरेशन’ और ‘रिहैबिलिटेशन’ को एक मानना NGT की बड़ी गलती?

फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने ‘रेस्टोरेशन’ और ‘रिहैबिलिटेशन’ के बीच अंतर को भी अहम माना। कोर्ट ने समझाया कि रेस्टोरेशन का अर्थ प्रभावित जगह को उसकी मूल स्थिति में वापस लाना है। वहीं रिहैबिलिटेशन का दायरा कहीं व्यापक है। इसमें पूरे इकोसिस्टम को दोबारा इस स्तर तक सक्षम बनाना शामिल है कि वह अपनी पर्यावरणीय सेवाएं बेहतर तरीके से दे सके।

सुप्रीम कोर्ट के अनुसार, NGT ने आयोजकों पर रिहैबिलिटेशन की व्यापक जिम्मेदारी डाल दी, जबकि मूल विवाद कार्यक्रम से हुए कथित नुकसान को लेकर था।

अदालत ने यह भी नोट किया कि विशेषज्ञ समिति खुद मान चुकी थी कि कार्यक्रम से पहले उस स्थान की वास्तविक पारिस्थितिक स्थिति का विश्वसनीय आकलन करना मुश्किल था। इसके बावजूद समिति ने व्यापक पुनर्वास और इकोलॉजिकल रेस्टोरेशन की सिफारिश कर दी। सुप्रीम कोर्ट ने माना कि इस प्रक्रिया में समिति अपने अधिकार क्षेत्र से आगे चली गई और NGT ने उसकी सिफारिशों पर जरूरत से ज्यादा भरोसा किया।

₹5 करोड़ वापस होंगे, लेकिन यमुना की जिम्मेदारी DDA की

सुप्रीम कोर्ट ने NGT के 9 मार्च 2016 के अंतरिम आदेश को लेकर भी टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि शुरुआती स्तर पर उपलब्ध सामग्री के आधार पर जारी अंतरिम आदेश को अंतिम निष्कर्ष की तरह नहीं माना जा सकता। बाद में NGT ने खुद स्पष्ट किया था कि वह आदेश अंतरिम प्रकृति का है और इससे किसी पक्ष के अधिकार प्रभावित नहीं होंगे।

अपने अंतिम फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने व्यक्ति विकास केंद्र इंडिया की ओर से जमा कराए गए 5 करोड़ रुपये DDA को चार सप्ताह के भीतर वापस करने का निर्देश दिया है।

हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि यमुना के फ्लडप्लेन की बहाली का काम रुक जाएगा। कोर्ट ने साफ किया कि DDA को NGT की ओर से पहले से जारी योजनाओं और निर्देशों के मुताबिक फ्लडप्लेन के पुनर्वास का काम जारी रखना होगा।

अदालत ने यह भी कहा कि यमुना के सक्रिय फ्लडप्लेन की सुरक्षा और बड़े पैमाने पर उसके पुनर्वास की जिम्मेदारी DDA की है। ‘पब्लिक ट्रस्ट डॉक्ट्रिन’ के तहत प्राधिकरण को ऐसे संवेदनशील क्षेत्र को आगे नुकसान से बचाने के लिए एहतियाती कदम उठाने चाहिए।

साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि 2016 के कार्यक्रम के लिए DDA की मंजूरी कानूनी थी या नहीं, यह सवाल इस अपील में उसके सामने विचाराधीन नहीं था।

यानी इस फैसले का सीधा असर 5 करोड़ रुपये के पर्यावरण मुआवजे पर पड़ा है, लेकिन यमुना फ्लडप्लेन की पर्यावरणीय सुरक्षा की जिम्मेदारी DDA पर बनी हुई है। करीब दस साल पुराने इस मामले में अदालत ने आयोजकों की जिम्मेदारी तय करने के लिए इस्तेमाल किए गए सबूतों और प्रक्रिया को पर्याप्त नहीं माना।

Case: Vyakti Vikas Kendra India v. Manoj Misra (Dead) and Ors. | C.A. No. 683/2018