NLSIU का दीक्षांत समारोह रद्द होने पर बढ़ा विवाद, NLU दिल्ली के छात्रों ने कहा- फैसले पर फिर से विचार करे यूनिवर्सिटी

NLSIU का दीक्षांत समारोह रद्द होने पर बढ़ा विवाद, NLU दिल्ली के छात्रों ने कहा- फैसले पर फिर से विचार करे यूनिवर्सिटी

नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी दिल्ली के स्टूडेंट बार काउंसिल की गवर्निंग काउंसिल ने नेशनल लॉ स्कूल ऑफ इंडिया यूनिवर्सिटी (NLSIU), बेंगलुरु के 34वें सालाना दीक्षांत समारोह को रद्द करने के फैसले पर सवाल उठाए हैं। काउंसिल ने 28 अगस्त को जारी बयान में NLSIU प्रशासन से अपने निर्णय पर दोबारा विचार करने की अपील की है। उसका कहना है कि छात्रों की असहमति और उनके विचारों की वजह से पूरे बैच का दीक्षांत समारोह रद्द करना उचित नहीं है।

NLSIU का 34वां दीक्षांत समारोह 12 सितंबर को होना था। यूनिवर्सिटी ने ‘अनिवार्य परिस्थितियों’ का हवाला देते हुए इसे रद्द कर दिया है। अब ग्रेजुएट होने वाले छात्रों को उनकी डिग्री समारोह में बुलाने के बजाय ‘इन एब्सेंटिया’ यानी उनकी गैरमौजूदगी में देने की बात कही गई है। विवाद की पृष्ठभूमि में छात्रों के एक वर्ग का CJI सूर्य कांत की समारोह में मौजूदगी को लेकर विरोध है। छात्रों की आपत्ति उनकी ओर से छात्र प्रदर्शनों को लेकर की गई टिप्पणियों से जुड़ी बताई गई है।

CJI से जुड़ा समारोह, लेकिन छात्रों की राय भी अहम

NLU दिल्ली की काउंसिल ने माना कि इस मामले में CJI की भूमिका सामान्य अतिथि जैसी नहीं है। CJI, NLSIU के पदेन चांसलर होते हैं। इसके बावजूद काउंसिल का कहना है कि छात्रों की चिंताओं को देखते हुए पूरा दीक्षांत समारोह ही रद्द नहीं किया जाना चाहिए था।

काउंसिल के मुताबिक, ग्रेजुएट होने वाले छात्रों को समारोह से जुड़े मामलों में अपनी सामूहिक राय रखने की स्वतंत्रता मिलनी चाहिए। इसमें समारोह में किन लोगों को आमंत्रित किया जाए, जैसे मुद्दे भी शामिल हैं। उसका तर्क है कि प्रशासन के पास समारोह आयोजित करने की जिम्मेदारी जरूर है, लेकिन यह अधिकार छात्रों की सामूहिक अभिव्यक्ति को नियंत्रित करने तक नहीं बढ़ सकता।

यानी विवाद सिर्फ एक समारोह के आयोजन का नहीं है। इसके केंद्र में छात्र स्वायत्तता और संस्थागत निर्णय के बीच संतुलन का सवाल भी है।

‘इन एब्सेंटिया’ डिग्री से पूरी नहीं होगी समारोह की कमी

स्टूडेंट बार काउंसिल ने दीक्षांत समारोह को छात्रों की शैक्षणिक यात्रा का महत्वपूर्ण पड़ाव बताया है। पढ़ाई पूरी होने के बाद होने वाला यह कार्यक्रम सिर्फ डिग्री लेने की औपचारिकता नहीं होता। इसमें छात्र अपने माता-पिता, परिवार, फैकल्टी और उन लोगों के साथ एक मंच पर आते हैं, जिन्होंने उनकी पढ़ाई और करियर के सफर में उनका साथ दिया।

इसी आधार पर काउंसिल ने कहा कि छात्रों को बाद में सिर्फ डिग्री दे देना उस सामूहिक अनुभव की भरपाई नहीं कर सकता। उसके अनुसार, ‘इन एब्सेंटिया’ डिग्री मिलने से ग्रेजुएट होने वाले पूरे बैच के एक साथ इस उपलब्धि को मनाने का अवसर खत्म हो जाता है।

काउंसिल ने NLSIU के देश में कानूनी शिक्षा के क्षेत्र में महत्वपूर्ण स्थान का भी उल्लेख किया। उसका कहना है कि इतने प्रतिष्ठित संस्थान पर शैक्षणिक स्वतंत्रता, छात्र स्वायत्तता और संवैधानिक अभिव्यक्ति के मूल्यों को बनाए रखने की अतिरिक्त जिम्मेदारी भी है।

33वें दीक्षांत समारोह का उदाहरण देकर दिया रास्ता

NLU दिल्ली की काउंसिल ने अपने बयान में NLSIU के पिछले, यानी 33वें सालाना दीक्षांत समारोह का भी उदाहरण दिया। उस कार्यक्रम में चांसलर की जगह सुप्रीम कोर्ट के एक अन्य जज ने हिस्सा लिया था।

काउंसिल का कहना है कि जब पहले ऐसी वैकल्पिक व्यवस्था संभव रही है, तो इस बार भी कोई रास्ता निकाला जा सकता है। उसके मुताबिक, किसी आमंत्रित व्यक्ति को लेकर असहमति की वजह से पूरी ग्रेजुएटिंग क्लास का समारोह रद्द करना जरूरी नहीं होना चाहिए।

इसी आधार पर काउंसिल ने NLSIU प्रशासन से फैसले पर पुनर्विचार करने को कहा है। उसका सुझाव है कि ऐसा समाधान निकाला जाए जिसमें एक तरफ चांसलर के पद की गरिमा बनी रहे और दूसरी तरफ ग्रेजुएट होने वाले छात्रों की सामूहिक राय और अधिकारों का भी सम्मान हो।

मामला अब छात्र स्वायत्तता बनाम प्रशासनिक अधिकार का

NLSIU का यह विवाद कानूनी शिक्षा संस्थानों में छात्र भागीदारी और प्रशासनिक अधिकारों के बीच संतुलन की बहस को सामने लाता है। एक तरफ यूनिवर्सिटी के पास अपने आधिकारिक कार्यक्रमों के संचालन और प्रबंधन की जिम्मेदारी है। दूसरी ओर, छात्रों की अभिव्यक्ति और अपनी राय रखने की स्वतंत्रता का सवाल है।

NLU दिल्ली की स्टूडेंट बार काउंसिल ने इसी संतुलन की ओर ध्यान दिलाते हुए समारोह रद्द करने के फैसले पर फिर विचार करने की मांग की है। फिलहाल NLSIU की ओर से इस अपील पर क्या कदम उठाया जाता है, यह देखना महत्वपूर्ण होगा।