पासपोर्ट में शादी के बाद दर्ज हुए पति या पत्नी के नाम को तलाक के बाद हटवाने के लिए अब हर मामले में अदालत की तलाक की डिक्री पेश करना जरूरी नहीं है। केरल हाईकोर्ट ने अहम फैसला देते हुए कहा है कि तलाकशुदा व्यक्ति से केवल पासपोर्ट से पूर्व पति या पत्नी का नाम हटाने के लिए तलाक की डिक्री या न्यायिक पृथक्करण का आदेश मांगना जरूरी नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने साफ किया कि अगर Passport Rules, 1980 में ऐसी शर्त नहीं है, तो महज एक ऑफिस मेमोरेंडम के जरिए इसे अनिवार्य नहीं बनाया जा सकता।
यह फैसला उन लोगों के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है, जिन्हें विवाह समाप्त होने के बाद अपने आधिकारिक दस्तावेजों में पूर्व पति या पत्नी का नाम हटाने के लिए अतिरिक्त कागजी प्रक्रिया का सामना करना पड़ता है। मामले में हाईकोर्ट ने Regional Passport Officer को संबंधित महिला के आवेदन पर नए सिरे से विचार करने और एक महीने के भीतर आदेश पारित करने का निर्देश दिया है।
पासपोर्ट ऑफिस में अटका आवेदन, वजह बनी तलाक की डिक्री
मामला एक महिला का था, जिसकी शादी मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत हुई थी। बाद में दोनों पक्षों की सहमति से तलाक के जरिए विवाह समाप्त हो गया।
इसके बाद महिला ने अपने पासपोर्ट के spouse column से पूर्व पति का नाम हटाने के लिए आवेदन किया। लेकिन पासपोर्ट अधिकारियों ने इस आवेदन पर कार्रवाई नहीं की। वजह बताई गई कि महिला के पास तलाक की अदालत से जारी डिक्री मौजूद नहीं थी।
महिला ने इस कार्रवाई को केरल हाईकोर्ट में चुनौती दी। मामला जस्टिस मुरली पुरुषोत्तमन के सामने आया। अदालत के सामने मुख्य सवाल यही था कि क्या पासपोर्ट से पूर्व पति या पत्नी का नाम हटाने के लिए तलाक की डिक्री को अनिवार्य दस्तावेज बनाया जा सकता है?
1980 के नियमों में ऐसी शर्त नहीं, फिर क्यों मांगी गई डिक्री?
सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने 6 सितंबर 2024 के ऑफिस मेमोरेंडम का हवाला दिया। इस मेमोरेंडम में spouse का नाम हटाने के लिए तलाक का आदेश या डिक्री प्रस्तुत करने की बात कही गई थी।
लेकिन हाईकोर्ट ने Passport Information Booklet के Section IV, Schedule III का अध्ययन किया। अदालत ने पाया कि तलाकशुदा व्यक्ति द्वारा नाम बदलने या पासपोर्ट से spouse का नाम हटाने के लिए विवाह समाप्त होने का कोई विशेष न्यायिक दस्तावेज पेश करना जरूरी नहीं बताया गया है।
यहीं से अदालत का रुख स्पष्ट हो गया।
जस्टिस मुरली पुरुषोत्तमन ने कहा कि जब मूल नियम में ऐसी अनिवार्यता नहीं रखी गई है, तो केवल एक ऑफिस मेमोरेंडम के माध्यम से अतिरिक्त शर्त नहीं जोड़ी जा सकती।
हाईकोर्ट ने पासपोर्ट अधिकारी को दिया साफ निर्देश
अदालत ने इस मामले में Regional Passport Officer को महिला के आवेदन पर दोबारा विचार करने का निर्देश दिया है। खास बात यह है कि इस बार अधिकारी को तलाक की डिक्री मांगे बिना आवेदन पर फैसला करना होगा।
कोर्ट ने इसके लिए एक महीने की समयसीमा भी तय की है।
इस फैसले का सीधा असर पासपोर्ट से जुड़े ऐसे मामलों पर पड़ सकता है, जहां विवाह समाप्त होने के बाद व्यक्ति अपने दस्तावेजों में पूर्व पति या पत्नी की जानकारी अपडेट कराना चाहता है। कोर्ट की टिप्पणी का मूल आधार यही है कि प्रशासनिक प्रक्रिया वही अतिरिक्त दस्तावेज नहीं मांग सकती, जिसकी स्पष्ट आवश्यकता संबंधित नियमों में निर्धारित नहीं है।
फैसला क्यों अहम है?
पासपोर्ट सिर्फ विदेश यात्रा का दस्तावेज नहीं है। इसमें दर्ज व्यक्तिगत जानकारी कई दूसरे आधिकारिक कामों में भी इस्तेमाल होती है। ऐसे में वैवाहिक स्थिति बदलने के बाद रिकॉर्ड अपडेट कराना संबंधित व्यक्ति के लिए व्यावहारिक जरूरत हो सकती है।
केरल हाईकोर्ट ने इस मामले में प्रक्रिया को नियमों के आधार पर देखने पर जोर दिया है। अदालत ने यह नहीं कहा कि हर स्थिति में किसी भी दस्तावेज की जरूरत नहीं होगी। बल्कि फैसला उस खास अतिरिक्त शर्त पर है, जिसमें spouse का नाम हटाने के लिए तलाक की डिक्री को अनिवार्य बनाया गया था।
फिलहाल इस मामले में महिला के आवेदन पर Regional Passport Officer को एक महीने के भीतर फैसला करना है। हाईकोर्ट का संदेश स्पष्ट है—अगर पासपोर्ट नियम किसी दस्तावेज को अनिवार्य नहीं बनाते, तो प्रशासनिक निर्देश के जरिए उसे अनिवार्य शर्त नहीं बनाया जा सकता।


