Supreme Court का बड़ा फैसला: सजा के 21 साल बाद भी नाबालिग होने का दावा मान्य, अदालतों को JJA लागू करने की दी सख्त हिदायत

Supreme Court का बड़ा फैसला: सजा के 21 साल बाद भी नाबालिग होने का दावा मान्य, अदालतों को JJA लागू करने की दी सख्त हिदायत

किसी आपराधिक मामले में अगर आरोपी यह दावा करे कि अपराध के वक्त उसकी उम्र 18 साल से कम थी, तो सिर्फ इस वजह से उसका दावा खारिज नहीं किया जा सकता कि उसने यह बात मुकदमे के दौरान नहीं उठाई। सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया है कि नाबालिग होने का दावा कार्यवाही के किसी भी चरण में, यहां तक कि मामले के अंतिम निपटारे के बाद भी किया जा सकता है। जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस श्री चंद्रशेखर की पीठ ने ‘महावीर उर्फ अन्विश बनाम मध्य प्रदेश राज्य’ मामले में 2 सितंबर 2026 को यह महत्वपूर्ण फैसला सुनाया। कोर्ट ने 21 साल पुरानी सजा को रद्द कर दिया, क्योंकि रिकॉर्ड से सामने आया कि अपराध के समय आरोपी नाबालिग था।

सुप्रीम कोर्ट ने क्यों जताई चिंता?

पीठ ने कहा कि उसके सामने ऐसे मामलों की संख्या बढ़ रही है, जिनमें आरोपी पहली बार अदालत के सामने नाबालिग होने का दावा कर रहे हैं। कोर्ट के मुताबिक, यह स्थिति बताती है कि Juvenile Justice Act (JJA) को लागू करने और समझने में पुलिस तथा ट्रायल कोर्ट के स्तर पर गंभीर कमी रह गई है।

अदालत ने खास तौर पर जांच प्रक्रिया पर सवाल उठाया। कोर्ट के मुताबिक, जांच अधिकारी अक्सर आरोपी को दोषी साबित कराने पर ज्यादा ध्यान देते हैं। वहीं, जब कोई नाबालिग आरोपी अदालत के सामने पेश होता है, तो उसकी उम्र तय करने पर उतना ध्यान नहीं दिया जाता, जितना कानून के तहत जरूरी है।

इसका सीधा असर बच्चे के अधिकारों पर पड़ता है। अगर कोई व्यक्ति अपराध के समय नाबालिग था, तो उस पर वयस्क अपराधी की तरह कार्रवाई करने के बजाय किशोर न्याय कानून के तहत लागू सुरक्षा और प्रक्रिया पर विचार करना जरूरी है।

21 साल पुरानी सजा क्यों हुई रद्द?

मामले में जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड यानी JJB ने यह पुष्टि कर दी थी कि अपराध के समय अपीलकर्ता नाबालिग था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि एक बार JJB के स्तर पर उम्र की पुष्टि हो गई, तो हाई कोर्ट का यह दायित्व था कि वह संबंधित व्यक्ति के मामले पर किशोर न्याय कानून के प्रावधानों के अनुसार विचार करे।

कोर्ट ने इस आधार पर हाई कोर्ट के आदेश और दोषसिद्धि को रद्द कर दिया। अपीलकर्ता को उसके जमानत बॉन्ड से भी मुक्त कर दिया गया।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी दोहराया कि नाबालिग होने की उम्र तय करते समय महत्वपूर्ण तारीख अपराध किए जाने की तारीख होती है। ट्रायल के समय आरोपी की उम्र या अदालत में पेश किए जाने की तारीख निर्णायक नहीं होती।

दावा देर से आया तो भी अधिकार खत्म नहीं होगा

फैसले का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा यही है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि नाबालिग होने का दावा मामले के किसी भी चरण में उठाया जा सकता है। यहां तक कि आपराधिक मामले का अंतिम निपटारा हो जाने के बाद भी ऐसा दावा सामने आ सकता है।

हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि केवल दावा कर देने से उम्र साबित हो जाएगी। कोर्ट ने साफ किया कि ऐसे दावे के समर्थन में विश्वसनीय सबूत होना जरूरी है। सिर्फ देरी के आधार पर किसी वास्तविक नाबालिग को कानून की सुरक्षा से वंचित नहीं किया जा सकता।

पीठ ने कहा कि अदालतों को कानून की व्याख्या करते समय उसके उद्देश्य और बच्चों के हितों को ध्यान में रखना चाहिए। किशोर न्याय कानून का मकसद बच्चे को हमेशा के लिए अपराधी की पहचान देना नहीं, बल्कि उसे सुधार और समाज में दोबारा शामिल होने का अवसर देना है।

बच्चों को ‘अपराधी’ नहीं, संरक्षण की जरूरत: कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने बच्चों से जुड़े मामलों में राज्य की जिम्मेदारी पर भी जोर दिया। अदालत ने कहा कि बच्चे कई बार सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों, भावनात्मक समस्याओं या मनोवैज्ञानिक कारणों से अपराध की ओर खिंच सकते हैं। ऐसे मामलों में उन्हें हमेशा के लिए अपराधी का ठप्पा लगाने के बजाय समाज की मुख्यधारा में वापस लाने की कोशिश होनी चाहिए।

कोर्ट ने इस संदर्भ में ‘Parens Patriae’ सिद्धांत का उल्लेख किया। इसका मूल विचार यह है कि जो लोग अपनी सुरक्षा खुद नहीं कर सकते, उनकी रक्षा की जिम्मेदारी राज्य की होती है।

पीठ ने बच्चों के अधिकारों की घोषणा 1959, जिनेवा घोषणा और UN Convention on the Rights of the Child, 1989 का भी संदर्भ दिया। संविधान के अनुच्छेद 15(3), 39(e)-(f) और 45 में बच्चों की सुरक्षा और विकास से जुड़े प्रावधानों का उल्लेख करते हुए कोर्ट ने किशोर न्याय व्यवस्था के विकास को भी रेखांकित किया।

अदालत ने कहा कि Juvenile Justice Act 2015 एक व्यापक कानून है, जिसमें बच्चों से जुड़े किशोर न्याय के विभिन्न पहलुओं को समाहित किया गया है। इसलिए पुलिस और अदालतों को इसके प्रावधानों को केवल औपचारिकता के तौर पर नहीं, बल्कि कानून के उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए लागू करना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट ने उमेश चंद्र, गोपीनाथ घोष, भोला भगत, प्रताप सिंह, हरि राम, धर्मबीर और जितेंद्र सिंह उर्फ बब्बू सिंह जैसे पुराने फैसलों का भी हवाला देते हुए इसी कानूनी स्थिति को दोहराया।

इस फैसले का आम लोगों के लिए सबसे अहम संदेश यह है कि किसी व्यक्ति की उम्र, खासकर अपराध के समय उसकी वास्तविक उम्र, किशोर न्याय कानून के तहत उसके अधिकार तय करने में बेहद महत्वपूर्ण है। अगर विश्वसनीय सबूत से यह साबित होता है कि अपराध के वक्त व्यक्ति नाबालिग था, तो सिर्फ देर से दावा सामने आने के कारण उसे कानून में दी गई सुरक्षा से वंचित नहीं किया जा सकता।